दौड़ते हाथी की पीठ पर तुम्हें हंसता देखा था
स्टेडियम के गोल मैदान पर खिंचे चॉक की
फांक पर दौड़ता, बीच दौड़ गिरता देखा था
सपने में दीखी हों नीली पहाड़ियां, उसकी
घुमराह रपटीली लाल पगडंडियों पर
अबूझ खुशियों में नहाया, भागते देखा था.
सपनों के ज़रा, एकदम ज़रा बाहर
रात-रात भर धारदार बरखते हैं
दु:ख के कंटीले तार, फिर जाने ऐसा क्याकहां छुपा है, कि सब अंधेरों के बीच
जीवन आता है तुम पर इतना प्यार.
nice
ये मूड भी चकाचक है सर जी ...
बेहतरीन..प्यार आना और ऐसे जताना..
"सपनों के ज़रा, एकदम ज़रा बाहर"
वाह!! शायद यही कविताये छपती हो..
थोड़ी गैर-अज़दकी, लेकिन प्यारी कविता।