Saturday, May 29, 2010

आता है प्‍यार

दौड़ते हाथी की पीठ पर तुम्‍हें हंसता देखा था

स्‍टेडियम के गोल मैदान पर खिंचे चॉक की

फांक पर दौड़ता, बीच दौड़ गिरता देखा था

सपने में दीखी हों नीली पहाड़ि‍यां, उसकी

घुमराह रपटीली लाल पगडंडियों पर

अबूझ खुशियों में नहाया, भागते देखा था.


सपनों के ज़रा, एकदम ज़रा बाहर

रात-रात भर धारदार बरखते हैं

दु:ख के कंटीले तार, फिर जाने ऐसा क्‍या

कहां छुपा है, कि सब अंधेरों के बीच

जीवन आता है तुम पर इतना प्‍यार.

5 comments:

  1. ये मूड भी चकाचक है सर जी ...

    ReplyDelete
  2. बेहतरीन..प्यार आना और ऐसे जताना..

    ReplyDelete
  3. "सपनों के ज़रा, एकदम ज़रा बाहर"
    वाह!! शायद यही कविताये छपती हो..

    ReplyDelete
  4. थोड़ी गैर-अज़दकी, लेकिन प्यारी कविता।

    ReplyDelete