अचक्‍के

11 कमेंट - लजाइये नहीं, टिपियाइये

रोज़-रोज़ हंसता, बेमतलब

जाया होता दीखूंगा, अपने

शरम में मुंह चुराता, इस गली

उस सड़क यूं ही आता-जाता

फिर देखोगे एक दिन अचक्‍के

में ही मिलूंगा कभी


जैसे खुद को भी तुम पाओगे

ऐसे ही कभी गोपन क्षणों

अप्रत्‍याशित, अचकचाये हुए

धीमे स्‍वयं के करीब आते, दुलराते

भूले थे ज़माने से कुछ इस तरह

खुद को याद आते, उनींदे की उम्‍मीद

में मेरा नाम बुदबुदाते


रेशमी हवाओं के बीच सुरीली थपकियों

के गीत रचता, बहुत बार होगा

खुद तक को नहीं दीखूंगा मगर

तुम देखना तुमसे मिलूंगा.

 
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दिलीप - May 7, 2010 10:02 PM

waah bahut sundar...

मानव - May 7, 2010 10:28 PM

सुंदर है बहुत!!!

पारूल - May 7, 2010 10:42 PM

खुद तक को नहीं दीखूंगा मगर

तुम देखना तुमसे मिलूंगा.

sundar hai ye baat...umeed bhi

सतीश पंचम - May 7, 2010 11:06 PM

hmm...nice one.

सुंदर।

ravikumarswarnkar - May 7, 2010 11:21 PM

यहां से गुजरना
जैसे माथे को खुजाना
और खुजाते चले जाना...लगातार...

काफ़ी खुराक पेश करते हैं आप...

अनूप शुक्ल - May 8, 2010 1:09 AM

बहुत खूब! खासकर ये :
खुद तक को नहीं दीखूंगा मगर
तुम देखना तुमसे मिलूंगा.

अनिल कान्त : - May 8, 2010 1:44 AM

ये भी खूब....

"खुद तक को नहीं दीखूंगा
मगर तुम देखना तुमसे मिलूंगा."

वाह, बहुत सुन्दर...

कभी अपने टैग्स (लेबलो) के बारे मे भी कुछ लिखिये.. एक अज़ीब सी क्यूरियोसिटी होती है उन्हे देखना.. जैसे ये मन की गांठ हमारे मन मे भी एक गांठ सा बना गयी...

Amitraghat - May 8, 2010 1:10 PM

"अच्चके में किसी मिलना हैरानगी पैदा कर देता है आनन्ददायक हैरानगी...."

जोशिम - May 8, 2010 6:52 PM

ऐसे ही सुरीली थपकियों के गीत मिलते रहें प्रभु - जब तक मिलें नहीं

डॉ .अनुराग - May 8, 2010 7:52 PM

वाह.....पहले तो शीर्षक ही दिलचस्प है .......अचक्के !!

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