Thursday, May 27, 2010

माने, जाने जिनकी सहूलियत के लिए गिना जाता होगा, देश..

इतनी हड़बड़ी में मां को समझाना मुश्‍कि‍ल था कि गड़बड़ी होनी नहीं चाहिए. हड़बड़ी न होती तब भी मां को समझाना मुश्किल होता. गड़बड़ी हुई मतलब गई चीज़ें हाथ से. जैसाकि देवराज चाचा पूरे आत्‍मविश्‍वास से कहा करते थे. ‘इट इज़ लाइक ड्राइविंग ऑन द हाइवे’, चाचा कहते, ‘वन्‍स यू स्‍टार्ट थिंकिंग अबाउट गड़बड़ी, यू सी इट एवरीवेयर, और फिर सवाल ही नहीं उठता कि तुम गाड़ी ठोंकोंगे नहीं!’ चाचा के समर्थन में गोविंद भी ज़ोर-ज़ोर से सिर हिलाता. जबकि सच्‍चाई थी कि जिस दुनिया में हम और देवराज चाचा रहते थे वहां दूर-दूर तक कोई हाइवे नहीं था और गाड़ी के ठुकने का तो सवाल ही नहीं था क्‍योंकि गाड़ी थी ही नहीं. गाड़ी क्‍या- जैसाकि मिलिंद आह भरकर कहा करता- ‘यहां कुछ भी नहीं है!’

जबकि मिलिंद का ऐसा कहना सच नहीं था. क्‍योंकि कुछ भी कैसे नहीं था. हम सारे लोग थे ही. फिर बीच में रह-रहकर जंगले के लोहे से फिसलता वह भारी सांप भद् करके रसोई में आता ही रहता था. शुरु में सांप की बात निकलते ही सुनैना दीदी के चेहरे पर ‘अभी बेहोश हो जाऊंगी’ वाला भाव चला आता, मगर अब तो सांप रसोई में जांत के बाजू से सरकता पुराने घड़े के ठंडे के पीछे जाने क्‍या-क्‍या की टोह लिये टहलता रहता है और दीदी लापरवाही से मैगज़ि‍न से स्‍वेटर के डिज़ाइन की अपने कापी में नक़ल लिखती रहती हैं, या गोपू से इंटरनेट की बातें सुनती रहती हैं और उनके चेहरे पर शिकन तक नहीं आती. लेकिन एक तरह से कहें तो इस तरह का लापरवाह आचरण सुनैना दीदी की गड़बड़ी ही थी. सांप की भी थी. क्‍योंकि क्‍या ज़रुरत थी उसे इस तरह रसोई में आकर पालतू होने की. मगर फिर चुन्‍नी मौसी लंबी सांस भरकर कहतीं कि क्‍या मालूम, जगन की अम्‍मां, हो सकता है बेचारे का दुनिया में ओर कोई न हो!

सांप के पक्ष में चुन्‍नी मौसी के जवाबों से जगन की अम्‍मां को हमेशा कोफ्त होती, अपना सुपाड़ी काटना रोककर वह हैरान हुई कहतीं, ‘ऐसे आप क्‍यों कहती हैं, चुन्‍नी मौसी? दुनिया में सांप ही अकेला है? हम और आप अकेली नहीं हो?’

पता नहीं खपड़े के छत पर प्‍लास और पेचकस लिये देवराज चाचा क्‍या कर रहे होते, वहीं से अपनी मां को डाक्‍टर के यहां से दिखाकर लौट रहे चंद्रमा को सुनाते हुए कहते, ‘औरतों के जिरह में एकदम्‍मे मत पड़ो. उनके चिकचिक में पड़े माने गड़बड़ी हुई!’

यह भी मज़ेदार है कि मैं जो हमेशा देवराज चाचा की बातों पर जिम्‍मेदारी से कान दिये रहता रहा हूं, वैसे ही जैसे कभी कंप्‍यूटर को हाथ न लगाये वाला गोपू कंप्‍यूटर संबंधी हर नई सूचना जिम्‍मेदारी से अपनी कापी में टीपता रहता है, ऐन ज़रुरत के मौके पर- जबकि मैंने पैर में जूते तक पहन लिये थे, और न केवल पहन लिये थे, सफ़र में निकलने से पहले उनके गड़ने से परेशान भी होने लगा था- मेरी सब तैयारियां धरी रह गईं और गड़बड़ी में उलझने से मैं खुद को बचा न सका!

माने अभी घर से बाहर पैर निकाले भी न होंगे कि मां ने हल्‍ला मचाना शुरू कर दिया कि क्‍या मतलब है, ऐसे हड़बड़ में तुम जा कहां रहे हो? मैंने चिढ़कर हाथ झटकते हुए जवाब दिया कि तुम देख नहीं रही हो मुझे कितनी देर हो रही है, मां? जो बताना होगा मैं बाद में बताऊंगा, अभी तुम अपना मुंह बंद रखो!

लेकिन मां से ऐसी मांग भी कुछ असंभव-सी ही मांग थी, क्‍योंकि मुंह बंद करने की जगह वह जोर-जोर से रोने लगी.

दीप्ति जिस लड़की को जाने किस बेवक़ूफी की सनक में रूसी और जाने कहां की कविताओं से भरे कुछ प्रेम-पत्र लिखे थे, वह भागी-भागी मेरे पीछे आई कि मेरे लिए कविताएं खोजने जा रहे हो?

मैं एकदम गुस्‍से में सिहरकर रह गया. क्‍या सवाल है? कविताओं से भरे कुछ पत्र क्‍या लिख दिये, यह लड़की मुझे रूस भेजना चाहती है? या वे जाने और कौन से देश जहां कविताएं लिखी जाती हैं? क्‍या कभी ऐसे देश सचमुच जाया जा भी सकता है जहां लोग टीवी देखते होंगे, ठीक है, सांप के साथ रहने की आदत पाल ली हो, यह बात भी समझ आती है, मगर कविताएं लिखते हों, या जहां सचमुच ऐसी किताबें छपती हों? मैं क्‍यों, कोई भी- जा सकता है कोई? किसी ने देखा है कभी कविताएं जहां छपती हैं? देवराज चाचा जो पता नहीं कहां-कहां की बातों में सिर घुसाये रहते हैं, उन्‍होंने भी नहीं देखी. उनके सामने कभी कविता पढ़ो तो वह हंसने लगते हैं. बहुत बार मैंने देवराज चाचा को हंसते देखा है और मैं डरने लगा हूं. माने इसका मतलब क्‍या है जिस तरह देवराज चाचा हंसते रहते हैं. या दीप्‍ति‍ मुझे रूस या जाने जिस भी कौन से दूर देश जो भेज देना चाहती है? शायद मेरी ही ग़लती थी कि मैंने उससे प्‍यार किया और कविताओं की नक़ल लिखी.

हलदार परिवार के तीनों लड़के उम्र में मुझसे काफी बड़े हैं, और उनमें से किसी ने भी कभी प्‍यार नहीं किया. किसी लड़की को कविता भेजने का तो सवाल ही नहीं उठता, क्‍योंकि कविता उन्‍होंने कभी देखी ही नहीं. क्‍योंकि जबसे मैं देखता रहा हूं हलदार परिवार को हमेशा से पेड़ पर ही रहते देखा है और मझले से पूछो तो छोटा आंख मारकर जवाब देता है कि तुमने कभी देखा है पेड़ पर कविताएं उगती हैं, बोलो, बोलो?

नहीं देखा है. सच्‍चाई है. पेड़ पर अजीबो-गरीब हलदार परिवार ही उग सकता है! या जंगले के लोहे में लिपटा सांप (सांप ने देखी है कभी कविता? पूछने को कहता तो सांप से जवाब पा लेतीं सुनैना दीदी?), या दीप्‍ति‍ जो कहती है मुझसे दुनिया की हर चीज़ से ज़्यादा प्‍यार करती है और फिर अपने लंबें बालों पर दुलार से हाथ फेरती रहती है!

मुझे देखते ही हलदार का बड़ा बेटा पेड़ की ऊंची डाल से चीख़कर कहता है रूस या जिस भी देश जा रहे हो, हमारे लिए एक अच्‍छा सा पेड़ देखकर आना?

मुझे हलदार के बड़े बेटे के सवाल को सुनकर बड़ी तक़लीफ़ होती है. सचमुच इस हलदार परिवार को मैं कुछ भी करके जानता हूं? या दीप्‍ति‍ को ही जो मुझसे प्‍यार करती है और रूस और जाने किस देश मुझे भेज देने के खेल में उलझी हुई है? और रूस या किसी देश मैं सचमुच जो पहुंच भी गया तो भी इसकी क्‍या गारंटी है कि उसे भी मैं पहचान ही लूंगा?

मुझे जलाने के लिए मां कितनी मर्तबा बोली है कि ‘अपनी कोख से जना है, लेकिन तुझे पहचानती नहीं हूं, हां!

कभी-कभी देवराज चाचा के साथ भी होता है कि बीच बहस में डांटकर सबको चुप करा देंगे, काठ के पुराने बक्‍से से बांसुरी निकालकर जाने क्‍या बहकी धुन बजाने लगेंगे, फिर थोड़ी देर बाद डबडबायी आंख पोंछते हुए फुसफुसाकर कहेंगे, ‘मैं अपने को पहचानता नहीं, सच्‍ची जगन!

चाचा हमेशा ऐसा करते, मुझे मेरे नाम से बुलाने की जगह मुझे जगन कहकर बोलते. थोड़ी देर के लिए घबराता मैं भी असमंजस में बना रहता कि मैं कौन हूं, खुद को जानता हूं? माने यह जो अपना-हमारा की हमारी कहानियां हैं उस ‘हमारे’ में कितना सारा ‘अपहचाना’ है, नहीं?

अब जैसे यही, दीप्‍ति‍ को कविता की नक़ल देने की ग़लतफ़हमी में जो बेमतलब की ये किताबी कागज़ उठायी मैंने, क्‍या मतलब है इसका? है?

“After the (French) Revolution, almost a third of the population (about ten million people) lived in isolated farms and cottages or in hamlets with fewer than thirty-five inhabitants and often no more than eight. A peasant girl who went to work in Paris, when looking through the scullery window at the street, see more people at a glance than she had known in her entire previous life. Many recruits from the Dordogne in 1830 were unable to give the recruiting sergeant their surnames because they had never had to use them. Until the invention of cheap bicycles, the known universe, for many people, had a radius of less than fifteen miles and a population that could easily fit into a small barn.”

यूं ही अपने आपे से बाहर हो रहे तब मुझे और परेशानी हुई, जब मैंने देखा कहानी से बाहर खड़ा जुसेप्‍पे जाने क्‍यों मेरे भदेस में अपने मार्मिक आग्रह घुसेड़ रहा है. चूंकि कुकर्म उसने कर ही लिया, तो आप भी (जो जाने इस अमूर्तन में किधर मृत खड़े हैं) अंग्रेजी में उसकी एक झलक ले लीजिए. बाबू जुसेप्‍पे बोल रहे थे:

"You know what, as far as French anthropology is concerned, prehistory did not end until the Revolution. Before then, the state took no interest in the cultural and ethnic diversity of the masses. Statistics are scarce until Napoleon and unreliable even then. Sciences that made it possible to analyse populations according to physical and cultural traits evolved only when the tribes they hoped to study were turning into modern French citizens. But that's just an idea, for some administrative convenience, and a certain handle to it, beyond that their always remains the same detached darkness, not bothering a damn for who these people are, isn't it?"

4 comments:

  1. कहाँ से लाते है इतनी उर्जा सर जी !!!!!!
    again one of your style...

    ReplyDelete
  2. कहानी मां से शुरु होकर पात्रो की एक चेन बनाती जाती है.. शुरआत के तीन पैराग्राफ़्स मे तो पाठक को दिमाग खोलके पढना होता है नही तो पात्र उलझते जाते है.. उसके बाद बडी मासूमियत से किया गया ये सवाल - "किसी ने देखा है कभी कविताएं जहां छपती हैं? " जैसे दो मिनट के लिये रोककर पूछता है..और पाठक चला जाता है कहानी के भीतर.. ढूढने लगता है छापाखाना.. मिलने पर पता चलता है कि कविताये वहा तो नही बनती है फ़िर कहा बनती है... एक सवाल उलझा सा रह जाता है और अन्त मे लेखक खुद कहानी मे उतर जाता है फ़िर जुसेप्पे साहेब भी...

    बहुत बहुत कुछ सीखना है मुझे आपसे... आप कहानी पर ब्रश मारते जाते है और तस्वीरे बनती जाती है...कहानी बुनती जाती है..

    अमेजिग..

    ReplyDelete
  3. अमेजिंगै है जी। जय हो!

    ReplyDelete
  4. अथाह, अपार, अद्भुत!

    अनचीन्हा कितना कुछ है भीतर....

    ReplyDelete