Wednesday, June 30, 2010

नींद के फेंस के इधर और उधर..

एक्‍चुअली किस बात से इस पूरे झमेले की शुरुआत हुई कहना मुश्किल है. पत्‍नी के बगल सोता न होता तो शायद यह दुर्दिन सामने न खुलते. लेकिन पत्‍नी को छोड़कर कहीं और सोने जाता तो फिर मेरी आदतों के बदलने का ख़तरा सिर मंड़राता. पीठ पीछे पत्‍नी शिकायत करती कि कहीं और जाकर सो रहे हैं. शायद इसीलिए कहते भी हैं आदतों से बंधा व्‍यक्ति चैन की नींद सोता है. जबकि सच्‍चाई है मैं तो सो भी नहीं रहा था. वह तो पत्‍नी करती थी, मैं छाती पर हाथ बांधे उसकी भारी सांसों का ऊपर-नीचे होना सुनता रहता. सुनते-सुनते उकताहट होने लगती तो गरदन मोड़कर चुपचाप सोती पत्‍नी को गौर से देखता रहता. कितनी रातें मैंने इस तरह सोई पत्‍नी को चुपचाप ताकते हुए गुजारी है. ऐसे मौकों पर बहुत बार कुछ वैसा दीख गया है जिसकी ओर पहले कभी ध्‍यान न गया होता. जैसे दायीं कान और गरदन के बीच पत्‍नी के एक मस्‍सा था मैं जानता नहीं था. या उसकी पसलियों के नीचे माचिस की तीली के आकार का एक कटे का निशान जिसे वह अब तक मुझसे छुपाये हुए थी. एकाएक मुझे विश्‍वास नहीं हुआ था कि माचिस की तीली के आकार के उस कटे के निशान को कमर पर सजाई हुई औरत मेरी पत्‍नी ही है. गहरे जुगुप्‍सा में मैं देर तक उस माचिस की तीली के आकार के कटे के निशान को पढ़ता रहा. पत्‍नी के चेहरे पर झुककर इसकी ताकीद की कि माचिस की तीली के आकार के कटे के निशान वाली वह स्‍त्री मेरी पत्‍नी है.

मुंह पर हाथ धरे मैं भले मुस्‍कराता रहा होऊं मगर बात सचमुच सोचनेवाली थी. सोलह वर्षों से मैं अपनी पत्‍नी के साथ रह रहा था लेकिन अभी तक उसकी प‍सलियों के नीचे माचिस की तीली के आकार का कटे का निशान है से अनजान बना हुआ था. घबराहट भरे ऐसे क्षणों मैं पत्‍नी को नींद से झिंझोड़कर उठा देता कि यह क्‍या तमाशा है. भगवान के लिए तुम अपने कपड़े उतारो, आज मैं तुम्‍हें पहचान लेना चाहता हूं. मैं नहीं चाहता कि किसी दूसरी औरत से तुम्‍हारे घालमेल होने का खतरा बना रहे.

मेरा प्रस्‍ताव सुनकर पत्‍नी हमेशा डर जाती, डरकर तीन कदम मुझसे दूर खड़ी हो जाती. या दूसरे कमरे में भागकर भीतर से सिटकनी चढ़ा लेती. मैं दरवाज़े के बाहर मिन्‍नत करता तुम समझती क्‍यों नहीं इस तरह हमारा एक-दूसरे के साथ अजाने बने रहना खतरे से खाली नहीं! पति-पत्‍नी के बीच कितनी सारी चीज़ें बेपहचानी बनी रहती हैं उसे हम नहीं ठीक करेंगे तो कोई बाहर से आकर नहीं ठीक करेगा. तुम्‍हें डर नहीं लगता कि इतने वर्षों से साथ रहने के बावजूद हम अभी भी एक-दूसरे को पहचानते नहीं? तुम्‍हारा कसूर ही नहीं, खुद मैं अपनी पीठ को कहां पहचानता हूं? मगर तुमने भी कभी इस ओर मेरा ध्‍यान कहां दिलाया? तुम समझ रही हो मैं क्‍या कह रहा हूं? बाहर आओ, प्रिये.

पत्‍नी अंदर से चिल्‍लाकर कहती मेरा दिमाग चल गया है फिर जोर-जोर से रोने लगती जिससे मुझे लगता कि कैसी औरत है सीधी बात इसके दिमाग नहीं घुसती, सचमुच किस पागल औरत के झमेले फंस गया मैं.

काफी देर बाद पत्‍नी धीमे से दरवाज़ा खोलकर बाहर आती तो उसके बाहर आने का इंतज़ार करता-करता मैं कुर्सी पर सोया मिलता. और चूंकि मेरी देह पर कोई कपड़ा न होता पत्‍नी मेरी हालत देखकर फिर एकदम बौखलाने लगती, और उसके बेमतलब के शोर से मेरी आंखें खुल जाती और फिर हम देर तक एक-दूसरे को कोसते रहते और उससे थक चुकने के बाद बेमतलब झगड़ने लगते. पत्‍नी भागकर रसोई में जा छुपती और वहां से हल्‍ला करती मेरे कपड़ों के नजदीक मत आना वर्ना मैं तेल पीकर खुद को खत्‍म कर लूंगी. मैं चीख़कर कहता तेरा दिमाग चल गया है औरत, तेल पीने की बात करती है?

उसके बाद थककर मैं रसोई की दीवार से लगकर जा बैठता और वहीं बैठे-बैठे आंख लग जाती.

रात को बिछौने पर आंख खुलती तो मुझे ध्‍यान आता बगल में पत्‍नी सांसें बजाती सो रही है और मेरी देह पर जब मैं जगा था नहीं थे लेकिन इस वक़्त कपड़े हैं. और तनाव में मेरी आंखों की नींद उड़ी हुई है, छाती पर हाथ बांधे मैं सो नहीं पा रहा, और कुछ देर बाद गरदन मोड़कर पत्‍नी को देखता हूं तो पहले का कुछ अनदीखा फिर एक बार नज़रों में कहीं गड़ जाता और मेरी बेचैनी एकदम से बढ़ने लगती..

Monday, June 28, 2010

वायुचार..

बाबा कुछ देर तत्‍सम में विचार-तीर बांधने की कोशिश करते रहे, और बेचारे बार-बार हारकर हाथ हवा में लहकाने लग रहे थे; वैसे ही जैसे पुराने पतलूनों को पेट पर बटनबंद करने की मासूम हसरतों में बह निकलते ही मैं एकबारगी हिलने लगता हूं.. फिर जल्‍दी लजाने, अपने होने में घबराने लगता हूं. ज़ाहिर है बाबा की व्‍यथा समझ रहा होऊंगा, जभी होंठों पर लरपट मुस्‍की दौड़ने लगी होगी.

मुस्‍की को मलिनयाते बाबा से अभ्‍यर्थना की, ‘बाबा, तत्‍सम में नहीं सपर रहा तो अवधी में ही निकाल दीजिए, हम भोजपुरी में तर्जुमिया लेंगे, सीधे नहीं होगा तो शीर्षासन के अंतर-पाठीय पाठे से अर्थ सुलझा लेंगे. आप एक छोर से दुसरका छोर तक पहिले पहिलका वाक्‍य तो बोलिए!

हम आश्‍वस्‍त हुए कि बाबा अब सीधे साहित्‍य की सींग पर आयेंगे, आस्‍तीन ऊपर चढ़ाकर हमें हमारे अंधारे से पारायेंगे, मगर कहां. बाबा ने हाथ ऊपर लहराकर आस्‍तीन नीचे गिराने की जगह, नीचे ही नीचे एक लघु विस्‍फोटकारी वायुचार किया.. तत्‍सम को इस तरह अपने भारी नितम्‍बों से बगलियाते, फरियाते हुए अपनी अवधी में महकने लगे. विलास-वन में बाबा के उड़ने से अलग काम की जो साहित्‍य-संघाती बात बबवा ने कही, उसका मंतव्‍य इन छंटाक भर पंक्तियों में बंद है. मन की भोजपुरी से बेमन की हिंदी में उसे उल्‍था कर दे रहा हूं:

चिरई के बिष्‍ठान हथिये के हगान का हम का करें, बाबू? करेजवा फार दे मन तार दे, अंगुरी के पोर लाले लाल कै दे, अइसन ऊ कहनिया कबहूं नजर सजाती है, कहां भेंटाती है?.. गोड़ में नवका जूता के सजाई, गरदन में टाई लिये दवाई के सेल्‍समैनी माफिक धंधा और डेढ़ फंदा बेचते लौंडे भेंटाते हैं, इस सबकन बीच, गदहन के फोद, साहित्त कहां ले आता है?”

बाबा-कथन पर आमतौर से हम हाथ फेंक-फेंककर हंसने लगते हैं, आज नहीं छूटी. लजाहट में चुपाय हम सिर नवाये लिये.

Sunday, June 27, 2010

जंगन के मोर और जीवन..


कस्‍बे के पसराव से बहुत दूर, जाने किस उजाड़ वीराने में ऊंचे तंबुओं के डेरे तने थे, ढलती सांझ के धुंधलके में नीली, पीली, लाल रौशनियों के लट्टू दिखते. देखनेवाली आंखों को भरम होता सपने में दिखी होंगी, नज़दीक जाने पर फटी दरियों और सस्‍ते कैनवास के पैबंद दीखते, मगर समय और समाज से कटे उस सजीले, उजड़े ज़हान यूं भी जाता कौन था? मोर की कर्कश कूक गूंजती और रात की ख़ामोशी में हाथी का चिंहाड़ना सुनाई पड़ता.
फिर जब सब शांत हो जाता तो अपने भारी पिंजड़े में शेरनी ऊबी बायें से दायें और दायें से बायें झल्‍लायी फुफकारती मिलती, ‘इस जीवन का मतलब क्‍या है? है कोई?’
‘वाह! कैसे नहीं है, मैं नहीं हूं? मतलब?’ कोई ख़ास वज़ह होगी कि दिन भर का भूखा जोकर हमेशा हौसले में रहता. हंसते रहने का, जीवन जिये जाने के हौसले. हवा में पैर ऊपर किये, हाथ के पंजों के बल चलता जोकर शेरनी के पिंजड़े तक आया, फिर बड़ी-बड़ी आंखें नीचे से ऊपर को उल्‍टी फाड़े शेरनी को तकता तक़लीफ़ में बोला, ‘इतना प्‍यार करता हूं तुमसे, फिर भी तुम जीवन का मतलब पूछती हो?’
इस बेमतलब सर्कस में एक जोकर ही है जिससे शेरनी मन की बात कह सकती है, बाकी तो सिर्फ़ उसका दहाड़ना समझते हैं. जोकर को इस तरह सिर के बल खड़ा खुद से मिन्‍नत करता देख शेरनी को उस पर तरस हो आया, बोली, ‘जीवन के बारे में सोचकर मन परेशान होता है, उसका क्‍या करूं, उस पर काला कपड़ा खींच लूं, बताओ?’
जोकर हवा में कलाबाजी करता सफाई से वापस अपने पैरों पर खड़ा हो गया, पिंजड़े के भारी सलाखों में चेहरा धंसाकर बोला, ‘और मेरा प्‍यार, वो कुछ भी नहीं?’
शेरनी इस दरमियान अपनी बेकली का टहलना रोककर पिंजड़े के बीचोंबीच बैठ गई थी, पंजों पर मुंह गिराये उदासी से बोली, ‘यहां किसी ने तुम्‍हें कसूरवार ठहराया? मगर जंगल और आसमान के लिए रहम करो, प्‍यार के खयाल को इतना सिर मत चढ़ाओ, यहां जितने जने हैं सबसे ज्यादा उनमें तुम जानते हो प्‍यार की हकीकत क्‍या है, सिर्फ सपना है!
कुछ दूर पर बैठा जाने मुंह में क्‍या लिए बूढ़ा ऊंट जुगाली कर रहा था, वहीं से चिंघाड़कर उसने आवाज़ लगाई, ‘प्‍यार तुम्‍हारे वक्‍तों की ईजाद होगी, या जाने किन वक्‍तों की, मैं हजारों साल से रेत पर लंबी दूरियां दौड़ता रहा हूं, कभी किसी को प्‍यार के पीछे भागते नहीं देखा, अलबत्ता पानी के लिए जाने कितना खून बहते ज़रुर देखा है! प्‍यार को बेचना बंद करो, बरखुरदार, कम से कम एक ऊंट के आगे तो ऐसी बेहयायी मत ही करो!’ फिर अपने घिसे खुर सहलाते बूढ़े ऊंट ने अपनी बात पूरी की, ‘जहां तक शेरनी देवी के सवाल की बात है तो मैं तो कहूंगा मोहतरमा के सवाल में दम है. अब जैसे आप हमीं से पूछ लें क्‍या मतलब है जीवन का, तो जनाब, हम यही दोहरायेंगे रेगिस्‍तानी दुनिया के किसी सरायखाने में इसका जवाब नहीं.’
जोकर इस बेदिली की पेशी से कुछ बेरौनक सा हो गया. शेरनी आह भरकर बोली, ‘अब इस तरह मन छोटा मत करो, जीवन के मतलब में किसी ने तुम्‍हारा हाथ होने की बात नहीं कही, भला कही?’
जगह की तंगी में अपनी जगह अस्थिर होता हाथी ने गुस्‍से में मुंह उठाकर तब शिकायत की, ‘मैं अपनी सुनाऊं, सुनोगे? जीवन नाम की जो चीज है, बड़ी बेहूदा चीज है, मैं अपने हाथ से अपने कान तक नहीं खुजा सकता, फिर इस बड़े जीवन का क्‍या खाकर माला जपूं, बताओ, किसी कीच, गड़ही में जाके बूड़ क्‍यों न जाऊं, बोलो?’
चेहरे पर जबरन हंसी पोतकर जोकर ने कहा, ‘मेरे समझदार दोस्‍तो, आपकी समझदार समझ ने मेरा मन भारी कर दिया है!’
इस सभ्‍य समाज से तभी कहीं बाहर की एक चिड़ि‍या चहचहाती इनके बीच उड़ी आई, और हाथी के चिंघाड़ने, शेरनी के दहाड़ने तक का उस पर असर नहीं पड़ा कि वह गंभीर जिरह कर रहे हैं, अपनी चहचहाटों से जिसे वह हल्‍का किये जा रही है, अपनी में खोयी बेशरम चहचहाती रही.
इससे पहले कि फटी आंखों चिड़ि‍या को तकता जोकर कुछ कहता, कह पाता, ऊंट ने अपनी जुगाली रोककर चिड़ि‍या का परिचय दिया, ‘मैं जानता हूं इसे, जाने क्‍या तो नाम है नाचीज़ का, बीस वर्षों तक नींद में डूबी रहने के बाद आंखें खोलती है तो सिर्फ एक गाना गाने के लिए, और उस गाने के खत्‍म होते ही दम तोड़ देती है, बस इतनी भर कहानी है इसकी जिन्‍दगानी की!
जोकर ने ऊंट की बात सुनी तो उसके दिल कट गया. हवा में हाथ फैलाये वह चिड़ि‍या के नज़दीक भागा-भागा पहुंचा, बोला, ‘चिड़ि‍या रानी, मैं नहीं जानता तुम्‍हारा नाम, मगर तुम भी कहां जानती हो मेरा, वैसे भी एक नाम में क्‍या रखा है. मैं तो सिर्फ यह कहने आया हूं कि बहुत प्‍यार करता हूं तुमसे, समझती हो, चिड़ि‍या रानी!’
चिड़ि‍या की आंखें एकदम से भर आईं, चहचहाती हुई उसने कहा, ‘जानती हूं, जभी तो अपने गाने से यहां तक खोजती चली आई!’
जोकर के दिल के और टुकड़े हुए, ‘फिर तुम्‍हारी आंख में ये आंसू कैसे हैं, चिड़ि‍या रानी?
‘खुशी के हैं, क्‍योंकि जीवन इतना लंबा होता है लेकिन नींद का होता है, जगे में प्‍यार की बातों की उम्र तो बड़ी छोटी होती है, नहीं?’
चिड़ि‍या की प्‍यारी बातों से जोकर का चेहरा खिल गया, लेकिन हक़ीक़त दरअसल यह थी कि उसकी आंखों से आंसू टपका आना चाहते थे. शायद जीवन का मतलब ऐसा ही कुछ होता हो..

Wednesday, June 23, 2010

हम जो पागल नहीं हो रहे, क्‍यों नहीं हो रहे?..

बहन खोलेगी, विशुद्ध स्‍वार्थों का बक्‍सा होगा, चहकती पूछेगी कैसा दीखता है, बताओ, मेरी पीठ थपथपाओ ना? भाई हंसता गोड़ फैलायेगा, सुलझी समझदार सामाजिक होशियारियों की बताता, हासिल नई जीतों में मुझे लजवायेगा. भाई की छाती पर चढ़ उसे पीटने लगने की जगह मैं सोचता सन्‍न रहूंगा कि गले में क्‍या दबाकर कहूं एक ही ख़ून से बने हैं हम?

बिना सांस लिये बिना ज़रा प्‍यार दिये, पत्‍नी देर तक सुनाती रहेगी कैसी, कितनी खराबियां हैं मुझमें, फुटबाल की तरह बेचैनियों में दस कोने उछलता हारकर फिर मैं एक कोना पकड़ लूंगा, रिरियाता, अपने से मुंह चुराता अख़बार के सप्‍लीमेंट में सिर धंसाये कि उत्तर-पूर्व में भुत जलोकिया की मिर्चे की नई किस्‍म 'खुज' गईं, कि मुंह में सटाते ही दुनिया आग पर दौड़ने लगती है, कि हिंदुस्‍तान टाइम्‍स का मिंट बताता है कि कैसे तो फक़त दस वर्षों में इडिया आर एंड डी के क्षेत्र में घनघोर दौड़ने लग पड़ी, लगभग यूएस के पीछे-पीछे समूची दुनिया को पीछे छोड़ती जाने कितना तो आगे उड़ी जाती है.

शहर की बरसाती सड़कों पर गुंडई की एक और अन्‍य ख़बर होगी, हमारी बेहयायी आत्‍मा की पिटाई का एक दूसरा बजर, मैं सिर झुकाये चुपचाप रोटी कुतरता हूंगा, खिड़की पर देह भिगाये कौवा हावं-हावं चीख़ता होगा, हम कोई कुछ भी नहीं सुन पाते होंगे, ख़ामोशी का एक शोरीला मैटेलिक रॉक घन्‍न्-घन्‍न् समूचे दिन दहलता होगा.

Monday, June 21, 2010

भेड़कथा: एक सीक्‍वेंस.. दूसरे फिर बहुत सारे.. मेरे, हमारे हैं..

पहाड़ी की ढलान पर भेड़ों का झुंड अच्‍छा-खासा दौड़ रहा था, मतलब दो पेट से थीं, एक की कमर की हड्डी सरकी हुई, और चौथी एक के जाने कब का ऐब ठहरा, ज़रा लंगड़ाकर, कुछ फुदकती-सी उसका हमेशा का दौड़ना रहा, तो उसी लंगड़ाहटी लय में ही सही मगर सब दौड़ रही थीं.. मतलब दो दिन की लगातार की झड़ी के बाद आज आसमान ज़रा खुला था, एक भेड़ थी कुछ दिनों पहले एक बड़े पत्‍थर के पीछे घास का टुकड़ा देखा था, और इसके पहले कि सबकी नज़र बचाकर उसे संभालकर पेट में उतार सके, वहां तक पहुंचने का रास्‍ता भूल गई थी, इन दो दिनों की बरसात में छाती में पैर धंसाये उस रास्‍ते को खोज निकालने का सपना देखती रही थी, आज धुंधलके धूप के उजाले में कैसे भी करके अपने उस सजीले घास को खोज निकालेगी ही का प्रण करके दौड़ती बैठी थी कि.. जैसेकि एक दूसरी ममता की मारी थी जिसका दुलारा, फटेहाल बाड़े की लीद माथे पर रगड़ता ज़ि‍द ठाने बैठा था कि कैसे भी करके उसे गरदन पर चढ़ाने के लिए लाल ऊनी पट्टा चाहिए ही! मां बेचारी हारी घबराई बुदबुदाने लगती कि कैसी बात करते हो, बाबू? किसी भेड़ को देह पर ऊन चढ़ाते सुना है कभी? मां के नेह में बिगड़ा बच्‍चा भेड़ की कमर में अपना भारी सिर भिड़ाकर पिनपिनाता, नहीं सुना तो मुझसे सुन, बुढ़ि‍या! आसमान काट या पहाड़ खोद, कहीं से भी लाके दे नहीं तो ये बाड़ा फूंक डालूंगा, तेरा पेट चीर डालूंगा! भोली, बुढ़ि‍या भेड़ घबराई सोचती बैठती कि इतना प्‍यारा सा बच्‍चा था, पहाड़ी छोड़कर दो गांव दूर तक कभी गया नहीं, कहां से ऐसी घनघोर बातें सीख आया मेरा लाल? मगर ऊन की जिद करता है तो कहीं से भी लाके दूंगी, पूछूंगी मनोहर भेड़ से, वह गया है तराई के मेले, एक नदी भी देखी हुई, शायद जानता हो कि भेड़ भी लगाते हैं गले में ऊन का पट्टा, और जतन करके बच्‍चे की खुराफात से बचा लेगी बाड़ा के ख़याल सोचती दौड़ी जाती थी मनोहारी की ओर कि..

मनोहारी का मन उम्र में अपनी बेटी-सी लगनेवाली हुई एक भेड़ पर आया हुआ. धूप की दौड़ में मन में उत्‍साही कुलांचे भरते वह उसी को खोजते, भागते हुए, मन ही मन ‘तीन देवियां’ का ‘ऐसे तो न मुझे देखो’ गुनगुनाते, थोड़ा अपनी चढ़ती उम्र का लिहाज करके लजाते. जबकि उम्र में बेटी लगनेवाली जो भेड़ हुई, वह मेंहदी के तीन पौधे खोज रही थी जो उसकी एक नई-नई बनी सखी ने बताई थी. एक दूसरा भेड़ था जिसने कामू का ‘अजनबी’ पढ़ रखा था न बेकेट की ‘गोदो का इंतज़ार’ का मंचन देखा था, कुलांचे भरता अस्तित्‍ववादी चिंताओं में चिंतित हो रहा था कि ‘जाने क्‍या चिरकुटों का दल है, दौड़ा चला जाता, मगर कोई मुझे बतायेगा मैं क्‍यों दौड़ रहा हूं?' जलती झाड़ी में पूंछ झुलस गई हो की गरमी में सुलगता अस्तित्‍ववादी उबलता सोचता अगले क्षण मेरे पैर आगे नहीं बढ़ेंगे, भीड़ की भेंड़धंसान का मैं स्‍वयं हिस्‍सा नहीं होऊंगा!’ सोचता और सोच की अदबदाहट में उलझा दौड़ता चला जाता, जभी..

एक विचारवान भेड़ था, बुढ़ाता, बेचारा, सबकी थू-थू का पात्र हुआ, क्‍योंकि घास का सपना देख-देखकर ऊबे, हारे भेड़ घबराकर जब कभी किसी दूसरे विषय की चर्चा शुरु करते तो बात घूम-फिरकर विचारवान पर चली ही आती, और फिर कोई चिढ़कर थूथने उठाये धुआं निकालता कहने से बाज नहीं ही आता कि, ‘बुड्ढा सटकेला है, अपने साथ हम सभी को डुबोयेगा! अबे, भेड़ विचार से दोस्‍ती करेगा तो घास कब खायेगा, किसी के अकल में ये बात घुसती है?’ जबकि विचारवान की अकल में घास नहीं घुसती, ऐसे टेढ़े-मेढ़े विचार ही घूमते होते कि हम भेड़ कब तक सिर्फ़ अपने-अपने घासों की सोचते रहेंगे? क्‍या ऐसा कोई उपाय नहीं कि कभी हम विचार की भी सोचें? भेड़दल की बुद्धि को एक बल किसी तरह ऊपर ले जाने की सामूहिक होशियारी का जतन हमारा पिछड़ा समाज कभी नहीं करेगा? करेगा तो किस सधी भेड़बुद्धि के नेतृत्‍व में करेगा? विचारवान माथे में विचारों की ऐसी और वैसी उलझी जलेबियां छानता भाग रहा था कि..

जभी पहाड़ी में खनिज खोजने पहुंचे मानवबल की डायनामाइट का पहला धमाका हुआ!

(यह खा़स बेला.. बेला की बायें अदाओं के लिए..)

Sunday, June 20, 2010

क्‍लैरिनेट्स..

ऐ क्लैरिनेट, सुनो, सुनो, भई, इस तरह मत बजो, कि हम अपनी सांसों का बजना सुनने लगें? समझते हो, मगर कहां, तुम तो आंख मूंदे गाल फुलाये, अपनी हाय लगाये हो, नहीं, क्लैरिनेट?

ऐ साथी, सुने, इस तरह मत हंसो कि हमारा मन भीज जाये, हम महकने लगें, आईने में देखकर चमकने कि इस उमर हम यह क्या बेहूदगी में बहकते, सुनते हो, साथी?

बरखा रानी, हमारे छाते में तीन सूराख है, डंडी ज़रा लचीली है, यही वज़ह होगी कि तुम छाती फुलाये आती हो तो हम तनिक लजाते हैं, कपड़ा खींचने लगते हैं, चोरी से नज़र चुराते हैं, मगर नेह हमारा तुमसे कैसे भी कमतर नहीं, समझती हो, बरखा रानी?

“To you, I’m a just a fox like any other fox. But if you tame me, we’ll need each other. You’ll be unique in the world for me. And I’ll be unique in the world for you.”

- सांएक्‍जूपेरी के 'छुटके राजकुमार' से.


नीचे पिपिहरी-पिनक पाट्रिस लेकां की फ़ि‍ल्‍म 'हमरे दुलारे दोस्‍त' से उड़ाई गई है.

Saturday, June 19, 2010

बिछिलाहटें..

खाली तीन दिन की बारिश हुई है, एतने में कंप्‍लीट रामलीला का शो देख लीजिए!

मतलब सोमारु का मंझलका छौंड़ा था, बछिया को जाने कौन उंगली कर रहा था कि डंडी, बछिया का मम्‍मी देखत रही, देखत रही, फिर छिनकके अइसा दौड़ी है छौंड़वा का पीछे, कि अंगना का बिछिलाहट में फिसिल के पिछलका गोड़ तोड़वा ली है! केस नम्‍मर टू: सगीना महतो के खपरे पर तैयार, बतिया जेतनो लवकी था, सब मालूम नहीं केकरा घर का चोर-पाल्‍टी रहा, बरसाती का अंधारा में जाने कब लुकाके कवन जतन कब खपरा पे चढ़ा, खपरे का टोटल लवकी खजाना खलास. नंगा दिन-दहाड़े का डकैती! अब केस नम्‍मर थीरी पूछिये? डेढ़ हफ्ता से जोत्‍सना दीदी जीवन-लीला खतम कै लेंगी का बात सोच-सोच के अपना एक जगह अस्थिर बैठना-ठाड़ा होना तक मोहाल किये थीं, फिर आखिरकार जब तै कर लिया कि शनिच्‍चर की रात फैसले की रात होगी तो बियफे से जो बिजली कड़कना चालू हुआ और मुसलाधारी का खपड़ा और टीना और दुआरी और अंगना में भहरना, जोत्‍सना दीदी सुसैडी का आइडिया पिछवाड़ा का दीवार का पीछे- प्राइबेट कपड़ा का माफिक- फिलहाल के लिए फेंक आई हैं. अइसा कीचर-कादो का बीच अंगना का जमीन पर अपने को जीवन-सून्‍य देखने का खयाल जोत्‍सना दीदी को बेहद अश्‍लील लगता है!

खाली तीन दिन का बारिश है!

सुबह से चौथी बार है मालती फुआ अंगना का पानी झाड़ू से हटा रही हैं, ‘अकेले हम ही इस घर में अंग फोड़ते रहें, अऊर सबके जांगर पे त्s चमेली का फूल चढ़ा हुआ है!’

‘तs तूको कौन बोला है साड़ी खोंसके अंगना में जाके झांसी का रानी बने का? पनिया बहरा जायेगा त घंटा भर में फिर दुबारा हुंआ इकट्ठा नै होगा?’ सारस की तरह बरामदे के अंधेरे में खटिया पर उठंगे लेटे, मुंह उठाकर फूफा एकदम से बोलना चाहते हैं, मगर फिर चुपाकर दीपा के कोंचने पर लुडो की अपनी चाल चलते हैं, लड़की से शिकायत करते हैं, ‘तू चाह बना रही थी न, रे?’

दीपा मुंह तरेरकर विजयी नज़रों से पिता को ख़बरदार करती है कि हार रहे हैं तो अभी फिर चाय याद आने लगा? बाप-बेटी दोनों को ख़बर नहीं कि उनके सर के ठीक ऊपर, छत के खंभे से धीरे-धीरे सरकता एक बगेसर सांप चला जा रहा है, दीपा जानती होती तो वहीं लुडो के गत्ते पर बेहोश हो जाती, फिलहाल ठोड़ी में उंगली लगाये अपना चाल खेलकर ठिठोली कर रही थी, ‘सूजी का हलवो बना दें, पप्‍पा? कि कचौड़ी खाइयेगा?’

‘तू हमरे हाथ का छनौटा खाओगी, पप्‍पा की बेटी?’ घुटने में साड़ी फंसाते हुए मालती फुआ दीपा को झाड़ू दीखाकर बोलीं, ‘घर में तरकारी नहीं है ऊ किसी को सूझ रहा है? छाता लेके फट से तरकारी खरीद लायें, ऊ हियां किसी को नै सूझेगा, लुड्डो और लड्डू का बेमतलब कहानी बनायेंगी! जइसन बाप वइसन बच्‍चन सब!’

पिंटू जंगले के लोहे में चेहरा धंसाये मां का सिपाही होने का ईनाम लेने की गरज में बोला, ‘हम चल जायें, मां? मगर बुलू वाला छाता जाम हो गया है?’

फूफा ने कुरते की जेब से चुनौटी बाहर करते हुए बेटे की तरफ देखा, ‘भेजें तुमको बाहर? खतम हो गया तुमरा अलजेबरा?’

दो घर दूर मंजु बड़ि‍यों को एक सूखे डिब्‍बे में खलिया रही थी. बाहरवाले कमरे में पड़ोस की ताप्ती अपने बाल काढ़ रही थी, उसने मंजु को सुनाते हुए कहा, ‘जोत्‍सना दीदी के परस से परदीप कुमार का फोटो निकला है!’

मंजु चौंककर बोली, ‘परदीप कुमार?’

‘परदीप कुमार कि परबोध कुमार.. हमको क्‍या मालूम, हम फोटो लेके थोड़ी घूमते हैं!’

बाहर बारिश होती रही. तीन दिन से हो रही थी.

Friday, June 18, 2010

ऐसे नचनियाये, पिल्‍लाये समय में..

कुत्ते भौंकते रहते हैं. मैं सोचता रहता हूं. और इसी में ‘रावण’ रिलीज़ भी हो जाती है. पोस्‍टर पहले रिलीज़ हुई थी, तब कुत्ते शांत थे, मगर मैं तब भी सन्‍न हुआ था कि कागज़ पर ये लाल, पीले, नीले की अलग-अलग शोभा तो ठीक है, मगर जिस चेहरे के आसरे ये रंग मुखरित, मर्मावस्‍थी हो रहे हैं, उस चेहरे के विविध(?)-भावों को ‘जुवेनाइल’ के खांचे में रखा जाये या मानसिक-व्‍याधि की परिधि में? धन्‍य होगा वह मणि रतन जो ऐसे विविध-भावी, अभिनय-स्‍पर्शी प्रतिभा के बूते अपने ‘रावण’ की इमारत खड़ी करे. मगर खड़ी तो की है. सब तरफ चित्र-वितान चीख़-चीख़कर इसकी घोषणा कर ही रहे हैं कि लो, हम खड़े हो गए! ‘गाइड’ में देवानंद तक को दर्शकों ने एक्‍टर मान लिया था, ‘आनंद’ में राजेश खन्‍ना हो माना ही था, ‘गुरु’ में फिर इन गुणकारी तक को मानने लगे थे, फिर ‘रावण’ से ही ऐसी रार क्‍यों हो? हे दीन, मल्‍टीप्‍लेक्‍स घेटआइज़्ड दलिद्दर, अभिनय का दसरूप न देखोगे, मणि के कैमराकारी जतनों के दस रंग देखने का सौभाग्‍य तो बनेगा?

कुत्ते भौंकते रहते हैं. मैं सोचता रहता हूं. उस ऐश्‍वर्यधारी के सोचकर भी दंग होता रहता हूं जो प्रतिभा के ऐसे दशावतार धनी की संगत में मंडप का क़रारनामा लिखवाकर बाकी का जीवन संवारने एक चिरकुटई से दूसरे में पहुंच गई! इससे पहले भी प्रतिभाओं के ऐसे ही नामचीन दो अभिनय-कुसुमकुमारों के आगे-पीछे हंसती, और बाद में हंसी का पात्र बनती दिखती ही रही थी. और तब जबकि लड़की पढ़ी-लिखी है. मगर देखिए, फिर भी ऐसी होनहारी दीखाने से बाज़ नहीं आई. इसीलिए बाज मर्तबा हैरत नहीं होती कि हिंदुस्‍तानी लड़कियां सचमुच अपने जीवन के क्रांतिकारी रुपान्‍तरण की दिशा में कैसे सधे कदम धर रही हैं. वैसे ही धर रही हैं जैसे ‘हम आपके हैं कौन’ बनाकर हिन्‍दी सिनेमा ने स्‍वयं को साधना, डॉलर्स में बांधना शुरू कर दिया था.

कुत्ते भौंकते रहते हैं. मैं सोचता रहता हूं. देश में दस भोपाल गैस कांड हो जायेंगे, त्रासदी के भोक्‍ताओं को न्‍याय कमोबेश सब कहीं एक-सा मिलेगा, मगर हम शहरातियों, महानगरीय बरातियों को ज़रा मौका मिलेगा नहीं कि हम तपाक से फिर दशावतारी, दसरंगी गानों के चिलमन में डूबने लगेंगे. जैसे कि हिन्‍दी का अनोखा सिरजनहार, रचनाकार अपनी अनोखी, तत्‍समधर्मी, रचनाशीलता के इश्‍क में डूबा रहता है! कुछ अनोखी राष्‍ट्रीय ‘डेस्टिनी’ हम अपनी किस्‍मत की झोली में लेकर आये होंगे कि रावणलला के इतने सारे समानांतर नाच हमारे गिर्द चलते रहते हैं, मगर हमारे नामवर साहित्‍य का उस विद्रूप यथार्थ में घेले भर का हस्‍तक्षेप नहीं होता. हो सकता. लिखनेवाले मगर मिनट भर को नहीं चौंकते. एक लंबी कविता के बाद दूसरा महाउपन्‍यास लिखने रचने का ख़्वाब सिलने लगते हैं. लिखनेवाले साहित्‍य-रतन जितना भी अभिषेकी-अकल वाली मुस्‍की काटते रहें, रेल की खिड़की पर एक हाथ से मूंगफली तोड़ते और दूसरे से किताब का पन्‍ना पलटते पाठक पढ़ अभी भी वही सुरेंद्र मोहन संसार रहे हैं. जैसे इस देश में इतिहास रचनेवाला बड़े शहरों का अंग्रेजीदां संसार सन्‍न रहा होगा जब तिरानबे में राम जन्‍मभूमि के सिपाही उसके रचे सारे इतिहास को मूंगफली का ठोंगा बनाकर एक तरफ फेंक गये थे, और फिर हंसते-हंसते अपने लुगदी पंप्‍लेटी इतिहास का लाऊडस्‍पीकरी उद्घघोषणओं के चित्‍कार में रामलला के उद्धार के लिए अजोध्‍या पहुंच गए थे!

कुत्ते भौंकते रहते हैं. मैं सोचता रहता हूं. जो मानसिक-व्‍याधि है, समूचे मुल्‍क की है, और बहुत सारी भूमिका भले हो मगर सिर्फ़ मीडिया का क्रियेशन नहीं है, तो सोचनेवालों को सोचते रहना चाहिए कि इस दुश्‍कर रावणलीला समय में वह कूल-कैट दीखने के मोह अपने-अपने कुष्‍ठ कोटरों में सहूलियत का दूध सड़पते रहेंगे, या बड़े सामाजिक फलक के कॉमन-सेंस में फेर-बदल लाने के किसी वृहत उद्यम में स्‍वयं को झोंकने की तरकीबें भिड़ायेंगे? भले वह कुत्ते का भदेस भौंकना ही दीखे? राष्‍ट्रीय निर्माण का अभी इतना पुराना भी नहीं हुआ वह एक दौर था समाज में व्‍यक्ति का योगदान उसके डॉक्‍टर, इंजीनियर, मास्‍टर होने में आंका जाता था, अब डॉक्‍टर, इंजीनियर, मास्‍टर तक सिर्फ़ कॉरपोरेट गुरु होना चाहते हैं, चैनल्‍स चीख़-चीख़कर ऐलान करते रहते हैं, ‘लुक, लुक, रावण इज़ सो कूल!’ और हम हंसते, पुलकित होते हैं. होते रहते हैं.

गनीमत है कुत्ते का जीवट है जो अभी भी भौंकता रहता है.

Thursday, June 17, 2010

आसान नहीं होता, होना.. लेखक..



तुम्हारे लिए तो पैरिस ‘अ मूवेबल फीस्ट’ नहीं होगा, फिर फटेहाल क्यों घूमते होगे, ढूंढ़ते क्या लंदन में, लेखक? सैंतालीस साल के संक्षिप्त जीवन में जीवन से कैसा जी लगाया होगा, भाषा को सर के बल खड़ा करके बस इतनी ज़रा उम्र, अपनों की ही नहीं, स्पेन के सपनों की भी घुमाई की, ‘घोर-घर’ औ’ ‘चौरासी’ की रचाई, मुल्क के बबर शेर का तुमने क्या बेहया ढेर किया, लेखक को लेखक की तरह खड़ा होने का क्या शुऊर दिया, जॉर्ज?

Monday, June 14, 2010

तस्‍वीर बनाता हूं..

मगर बनती कहां है?



कुछ भले, भोले लोग घर खड़ा करने की कोशिश करते हैं, पता चलता है कुछ समय बाद उन्‍हें बेदखल कर वह जगह इतिहास ने घर कर लिया है. इतिहास क्‍या है? मुंह खोलकर बतायें कार साहब.. क्‍योंकि पढ़ने के नाम पर तो ताज़ा बरसात बरसी है, मैं उसको तक नहीं पढ़ पा रहा (घबरा रहा हूं).. पढ़ने की ही बन जाती, तक़दीर? क्‍यों नहीं बनती?

ऊपर की तस्‍वीर बीसवीं सदी के शुरुआत में रमल्‍ला के एक किसान परिवार की है, यहां वीकीपीडिया से उठकर आई है..

Friday, June 11, 2010

सारंगा तेरी याद में..

हंसी-मज़ाक की बतकही देखते-देखते तीखे झगड़े में बदल गई थी. ऑडिसियस (किताब उसी के हाथ में थी) ऊपर हवा में किताब लहराता भावुक होकर चीख रहा था, ‘आप भूलिए मत, अदम ग़ुलाम नहीं थे! उनकी तबियत हुई, चीन गए. लोकतंत्र व्‍यक्ति के विचार को ही नहीं, उसकी भौतिक गति का भी उसे हक़ देता है!’

अपने सिर के घुंघराले बालों का सस्‍ता विग दुरुस्‍त करता नियोपॉलिमियस ने चिढ़कर जवाब दिया, ‘श्रीमान ऑ. चार क्‍लासिक आपने क्‍या पढ़ लिया, आपकी बुद्धि सटक गई है. इतिहास समय-स्‍वतंत्र अमूर्तन नहीं होता, समय और समाज उसकी सीमाएं खींचती हैं, और एक नागरिक उसके ज़द में ही अपना मत रखता है, अपना और अपने समाज के हित की बात करता है!’

बुज़ूर्ग लिनोस ने अपनी दाढ़ी खुजाते हुए नियोपॉलिमियस के समर्थन में सिर हिलाया (उनका फर्ज़ बनता था, क्‍योंकि अभी कुछ महीनों पहले ही नियोपॉलिमियस ने उनके बेरोज़गार दामाद बोवालिस की खातिर एक भ्रष्‍ट व्‍यवसाई से डेढ़ सौ भेड़ों का एक सौदा पटाया था), ‘जनाब ऑडिसियस, नियोपॉलिमियस वही कह रहे हैं जिसकी इतिहास बार-बार गवाही देगा. बीसवीं सदी में आप देखिएगा, चीन में एक-दो नहीं, चार बार इतिहास का पुनर्लेखन होगा, क्‍यों? राष्‍ट्रवादी, कम्‍यूनिस्‍ट, सांस्‍कृतिक क्रांति और उसके बाद बाज़ार फ्रेंडली सोशलिज़्म- राष्‍ट्र की कंटिन्‍यूटि एक रुमानी अमूर्तन है, अलग-अलग दौर में उसे अलग-अलग तरह की लंगियां लगती रहती हैं, और फिर हमेशा यही होता है कि विजेता अपने पक्ष में साक्ष्‍य रचवाकर, समय और समाज से उसपर मुहर दिलवाकर उसे इतिहास बुलाने लगता है.’

इतनी देर तक मुंह सिये ऑडिसियस ने पिनककर कहा, ‘सत्‍ता के साथ सौदों में भ्रष्‍ट बुलाते रहें ऐसे लोग कल्‍पनाओं को इतिहास, मैं स्‍वयं इस तरह के किसी जैकोबिन षडयंत्र का हिस्‍सा नहीं बनूंगा! माओवादियों को बार-बार याद दिलाता रहूंगा कि मत भूलो, भदेसो, फ्रांसिसी क्रांति के मूल नारे क्‍या थे!

लेतो, जो सारी उम्र चित्रकार होने का एक नाक़ामयाब संघर्ष करते रहने के बाद कवि होने की नियति स्‍वीकार ली थी और अब किसी भी तरह के अतिवाद से घबराहट महसूस करता था, ऊबी आवाज़ में कहा, ‘मिस्‍टर ऑडिसियस, देन डोंट कंप्‍लेन व्‍हेन यू सी द गिलोटिन. समाज, और हम सभी अंतत: जीवन में शांति चाहते हैं, पहाड़ों के जलने की, या एडम स्मिथ के चीन जाने की, हम क्‍यों चिंता करें? भूलिये मत, रूसो का अंत वेर्साइ में हुआ और देनी दिदेरो का इनसिक्‍लोपिदिया..’

कसियोपिया, जो कभी लेतो की प्रेयसी रही थी और बाद में उससे ऊबकर एक रोटी बनानेवाले के प्रेम में पड़ गई थी, उसने एकदम से मुंह खोलकर लेतो की बात काटी, ‘सैमुएल टेलर कॉलरिज़ और वर्ड्सवर्थ, रौमैंटिक मूवमेंट, सबको भूलकर पी जाओगे, लेतो? अभी और कितना नीचे जाओगे!’

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विद्यालय के नोटिस बोर्ड के गजर-मजर के बीच छिपा एक छोटा पोस्‍टर था; उसपर दर्ज़ मज़मून सवाल पूछता था: ‘साहित्‍य सवाल पूछता है या सस्‍ते जवाब ठिलवाने का माध्‍यम है? शहरों की बनावट हमारे आगे कैसे सवाल खोलती है?’

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सच्‍चाई थी गजी गलियों में चचाजान तालेब घर का रास्‍ता भूल गए थे, चूंकि साथ के बच्‍चों के आगे बेवकूफ़ी ज़ाहिर करना अच्‍छी मिसाल न होता, सो पिछले डेढ़ घंटे से तीन जनों का छोटा काफ़ि‍ला इस गली और उस गली की धूल फांक रहा था, जंतर-मंतर से बाहर निकलने की सुध भूल गई थी.

अलग-अगल किस्‍म के छोटे झरोखों और किवाड़ के रंगों में उलझी तेरह वर्ष की मल्‍ली इस बात तक का होश खोये बैठी थी कि जाने कितनी देर से उसके माथे का चादर सरककर उसके कंधे पर लहरा रहा है और त्‍यूनिस मोहल्‍ले में गली के मुहाने ऊकडू बैठे तीन बूढ़े अपनी ज़बान में जो गंदी गालियां बक रहे थे, वह किसी और की ख़ातिर नहीं, मल्‍ली की बेहयायी की शान में ही कहा गया था, और मल्‍ली ही नहीं चचा तालेब तक उस भिन्‍नाई नाराज़गी को नज़रअंदाज़ किये दो कंधोवाले एक ऊंट की सवारी का तमाशा देखने में मशरूफ थे, और उससे अभी पूरी तौर पर फारिग हुए भी न थे कि लाल कपड़ा ओढ़े एक फक़ीर के गाने पर नज़र गई, जिसकी एक आंख मुंदी थी और दूसरा बिना पलक झपकाये इस कदर बाहर आ रहा था मानो अभी कोया छूटकर सामने ज़मीन पर आन गिरेगा!

मन कड़ा किये सख़्ती से एक बार भरपूर फक़ीर के चेहरे को तकने के बाद मल्‍ली ने एकदम से नज़र फेर लिया, छोटे भाई से बोली, ‘उधर भूले से भी देखना नहीं!’

आठ वर्ष के मुन्‍ने की नज़र तब से बहन के हाथ में किरमानियों के बाज़ार से खरीदे आम के झोले पर थी, वहीं गड़ी रही, मुंह से निकला, ‘दीदीजान, मैं एक बार में कितने आम खा सकता हूं?’

भाई के इरादों पर मल्‍ली की नज़र गई तो उसने हिक़ारत से कहा, ‘एक भी नहीं, क्‍योंकि मैं तुम्‍हें इन्‍हें देनेवाली नहीं! तुम्‍हें मालूम है कहां से आये हैं, इनकी कीमत क्‍या है?’

सिमोन द फुआ भले बहुत सदियों बाद ‘द प्राइम ऑफ़ लाइफ़’[1] लिखतीं, तेरह वर्ष की मल्‍ली ने उस प्राइम को पाने के पहले ही अपने लिए जीवन का वह मर्म समझ लिया था. अलबत्‍ता बहन के जवाब की सख़्ती से मुन्‍ने का मिजाज़ उखड़ गया, वह भागा-भागा आगे गया और चाचा का कुरता खींचता शिकायत की, ‘तालेबचा, तालेबचा, क्‍या मैं आम नहीं खाऊंगा?’

तालेब ऊरुब ने बच्‍चे को खींचकर गोद में कर लिया और शहर के जंतर-मंतर का हिसाब समझते रहे.

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What kind of towns were they all, really?

Their streets were narrow and generally slopping, so as to be washed automatically by the rain. A hadit of the Prophet’s prescribed that streets should be seven cubits wide, permitting two laden asses to pass each-other. But this was impossible: houses encroached on the street despite the letter of the law, and very often had an overhanging upper floor, like medieval houses in the West.

A Frenchman, Volney, would describe these narrow streets in 1782 as follows:

“Since they are not paved, the masses of people, camels, asses and dogs which crowd into them kick up a disagreeable dust. Frequently, people throw water in front of their doors, and the dust gives way to mud and malodorous fumes. Contrary to normal custom in the East, the houses are two to three storeys tall, topped by a paved or loamed terrace. Most of them are built of mud or badly fired brick.. All of them look like prisons, because they have no windows on the street.”

Narrow as it was, the street in any Muslim country was always very lively – a permanent meeting place for people who enjoyed open-air display. It was ‘the essential artery, the rendezvous for story-tellers, singers, snake-charmers, mountebanks, healers, charlatans, barbers and all those professionals who are so suspect in the eyes of Islam’s moralists and canon lawyers. Add to that the children and their often violent games.’ And as well as the streets, the terraces were inter-communicating, although they were reserved for the women.

Such teeming disorder, however, never excluded an overall plan- especially since this was based on the very structure of the town and the life of its inhabitants. At its centre was the Great Mosque for the weekly sermon. ‘To it and from it everything flows, as if it were a heart.’ Nearby was the bazaar and its caravanserais or warehouses, as well as the public baths which were established and maintained despite frequent condemnations. Artisans were grouped concentrically, starting from the Great Mosque: first, the makers and sellers of perfumes and incense, then the shop selling fabrics and rugs, the jewelers and food stores and finally the humblest traders—curriers, cobblers, blacksmiths, potters, saddlers, dyers. Their shops marked the edges of the town.

In principle, each of these trades had its location fixed for all time. Similarly, the Prince’s quarter was in principle located on the outskirts of the city, well away from riots or popular revolts. Next to it, and under its protection, was the mellah or Jewish quarter. The mosaic was completed by a very great variety of residential districts, divided by race and religion: there were forty-five in Antioch alone. ‘The town was a cluster of different quarters, all living in fear of massacre.’ So western colonists nowhere began racial segregation – although they nowhere suppressed it.


[1]. “We were not ascetics, far from it; but now as before (and in this Sartre and I were alike) only those things within my reach, in particular those I could actually touch, had any true weight of realty for me. I gave myself up so completely to present desires and pleasures that I had no energy to waste on mere wishful thinking.”

Tuesday, June 8, 2010

इतना देखो कि आंखें जलने लगें..



"ऊब के रेगिस्‍तान में वीभत्‍स एक नख़लिस्‍तान"
- बाबू बॉदेलेयर

"Cervantes, who wasn't dyslexic but who was left crippled by the exercise of arms, knew perfectly well what he was saying. Literature is a dangerous occupation."

यह एक दूसरे बाबू ने कहा. था. और साहित्‍य के तथाकथित नख़लिस्‍तान में खड़े होकर ही कह रहे थे..

Monday, June 7, 2010

जैसा जीवन है..

शायद अपने यहां बहुत सारी कला जीने का मतलब बहुत सारे दु:ख जीने की तैयारी को न्‍यौता देना होता हो? जैसे मोबाइल फ़ोन के टावरों को सिर पर सजाते रहने की सुखनसाज कलावंती में रेडियेशन के हौज में बूड़ जाने की होशियारी बनती जाती हो.. पता नहीं किस तरह का शासन है कि नीति को लेकर फौजवाले के पास भी लंबी शिकायते हैं.. जबकि फौज की कुछ दूसरी लड़कियां हैं अपने शर्म को ढंकने के लिए कुछ ज़्यादा ही हंस रही हैं. यह जैसी भी दुनिया है, अमरीका का लगभग दो-तिहाई अंतर्राष्‍ट्रीय सहयोग इस बाहुबली की झोली में जाता है, और जो खिलाफत में मुंह खोलते दीखते हैं, उन्‍हें पटरी पर ले आया जाता है, मगर बहकनेवालों को पटरी पर लाने की महारत तो हमारे यहां भी कहां कम है..