शायद अपने यहां बहुत सारी कला जीने का मतलब बहुत सारे दु:ख जीने की तैयारी को न्‍यौता देना होता हो? जैसे मोबाइल फ़ोन के टावरों को सिर पर सजाते रहने की सुखनसाज कलावंती में रेडियेशन के हौज में बूड़ जाने की होशियारी बनती जाती हो.. पता नहीं किस तरह का शासन है कि नीति को लेकर फौजवाले के पास भी लंबी शिकायते हैं.. जबकि फौज की कुछ दूसरी लड़कियां हैं अपने शर्म को ढंकने के लिए कुछ ज़्यादा ही हंस रही हैं. यह जैसी भी दुनिया है, अमरीका का लगभग दो-तिहाई अंतर्राष्‍ट्रीय सहयोग इस बाहुबली की झोली में जाता है, और जो खिलाफत में मुंह खोलते दीखते हैं, उन्‍हें पटरी पर ले आया जाता है, मगर बहकनेवालों को पटरी पर लाने की महारत तो हमारे यहां भी कहां कम है..

 
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स्वप्नदर्शी - June 7, 2010 10:16 PM

इतने सारे लीन्कन !
अब दुनिया जैसी भी हो उससे आप बदलने वाले नही है.

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