Friday, June 11, 2010

सारंगा तेरी याद में..

हंसी-मज़ाक की बतकही देखते-देखते तीखे झगड़े में बदल गई थी. ऑडिसियस (किताब उसी के हाथ में थी) ऊपर हवा में किताब लहराता भावुक होकर चीख रहा था, ‘आप भूलिए मत, अदम ग़ुलाम नहीं थे! उनकी तबियत हुई, चीन गए. लोकतंत्र व्‍यक्ति के विचार को ही नहीं, उसकी भौतिक गति का भी उसे हक़ देता है!’

अपने सिर के घुंघराले बालों का सस्‍ता विग दुरुस्‍त करता नियोपॉलिमियस ने चिढ़कर जवाब दिया, ‘श्रीमान ऑ. चार क्‍लासिक आपने क्‍या पढ़ लिया, आपकी बुद्धि सटक गई है. इतिहास समय-स्‍वतंत्र अमूर्तन नहीं होता, समय और समाज उसकी सीमाएं खींचती हैं, और एक नागरिक उसके ज़द में ही अपना मत रखता है, अपना और अपने समाज के हित की बात करता है!’

बुज़ूर्ग लिनोस ने अपनी दाढ़ी खुजाते हुए नियोपॉलिमियस के समर्थन में सिर हिलाया (उनका फर्ज़ बनता था, क्‍योंकि अभी कुछ महीनों पहले ही नियोपॉलिमियस ने उनके बेरोज़गार दामाद बोवालिस की खातिर एक भ्रष्‍ट व्‍यवसाई से डेढ़ सौ भेड़ों का एक सौदा पटाया था), ‘जनाब ऑडिसियस, नियोपॉलिमियस वही कह रहे हैं जिसकी इतिहास बार-बार गवाही देगा. बीसवीं सदी में आप देखिएगा, चीन में एक-दो नहीं, चार बार इतिहास का पुनर्लेखन होगा, क्‍यों? राष्‍ट्रवादी, कम्‍यूनिस्‍ट, सांस्‍कृतिक क्रांति और उसके बाद बाज़ार फ्रेंडली सोशलिज़्म- राष्‍ट्र की कंटिन्‍यूटि एक रुमानी अमूर्तन है, अलग-अलग दौर में उसे अलग-अलग तरह की लंगियां लगती रहती हैं, और फिर हमेशा यही होता है कि विजेता अपने पक्ष में साक्ष्‍य रचवाकर, समय और समाज से उसपर मुहर दिलवाकर उसे इतिहास बुलाने लगता है.’

इतनी देर तक मुंह सिये ऑडिसियस ने पिनककर कहा, ‘सत्‍ता के साथ सौदों में भ्रष्‍ट बुलाते रहें ऐसे लोग कल्‍पनाओं को इतिहास, मैं स्‍वयं इस तरह के किसी जैकोबिन षडयंत्र का हिस्‍सा नहीं बनूंगा! माओवादियों को बार-बार याद दिलाता रहूंगा कि मत भूलो, भदेसो, फ्रांसिसी क्रांति के मूल नारे क्‍या थे!

लेतो, जो सारी उम्र चित्रकार होने का एक नाक़ामयाब संघर्ष करते रहने के बाद कवि होने की नियति स्‍वीकार ली थी और अब किसी भी तरह के अतिवाद से घबराहट महसूस करता था, ऊबी आवाज़ में कहा, ‘मिस्‍टर ऑडिसियस, देन डोंट कंप्‍लेन व्‍हेन यू सी द गिलोटिन. समाज, और हम सभी अंतत: जीवन में शांति चाहते हैं, पहाड़ों के जलने की, या एडम स्मिथ के चीन जाने की, हम क्‍यों चिंता करें? भूलिये मत, रूसो का अंत वेर्साइ में हुआ और देनी दिदेरो का इनसिक्‍लोपिदिया..’

कसियोपिया, जो कभी लेतो की प्रेयसी रही थी और बाद में उससे ऊबकर एक रोटी बनानेवाले के प्रेम में पड़ गई थी, उसने एकदम से मुंह खोलकर लेतो की बात काटी, ‘सैमुएल टेलर कॉलरिज़ और वर्ड्सवर्थ, रौमैंटिक मूवमेंट, सबको भूलकर पी जाओगे, लेतो? अभी और कितना नीचे जाओगे!’

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विद्यालय के नोटिस बोर्ड के गजर-मजर के बीच छिपा एक छोटा पोस्‍टर था; उसपर दर्ज़ मज़मून सवाल पूछता था: ‘साहित्‍य सवाल पूछता है या सस्‍ते जवाब ठिलवाने का माध्‍यम है? शहरों की बनावट हमारे आगे कैसे सवाल खोलती है?’

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सच्‍चाई थी गजी गलियों में चचाजान तालेब घर का रास्‍ता भूल गए थे, चूंकि साथ के बच्‍चों के आगे बेवकूफ़ी ज़ाहिर करना अच्‍छी मिसाल न होता, सो पिछले डेढ़ घंटे से तीन जनों का छोटा काफ़ि‍ला इस गली और उस गली की धूल फांक रहा था, जंतर-मंतर से बाहर निकलने की सुध भूल गई थी.

अलग-अगल किस्‍म के छोटे झरोखों और किवाड़ के रंगों में उलझी तेरह वर्ष की मल्‍ली इस बात तक का होश खोये बैठी थी कि जाने कितनी देर से उसके माथे का चादर सरककर उसके कंधे पर लहरा रहा है और त्‍यूनिस मोहल्‍ले में गली के मुहाने ऊकडू बैठे तीन बूढ़े अपनी ज़बान में जो गंदी गालियां बक रहे थे, वह किसी और की ख़ातिर नहीं, मल्‍ली की बेहयायी की शान में ही कहा गया था, और मल्‍ली ही नहीं चचा तालेब तक उस भिन्‍नाई नाराज़गी को नज़रअंदाज़ किये दो कंधोवाले एक ऊंट की सवारी का तमाशा देखने में मशरूफ थे, और उससे अभी पूरी तौर पर फारिग हुए भी न थे कि लाल कपड़ा ओढ़े एक फक़ीर के गाने पर नज़र गई, जिसकी एक आंख मुंदी थी और दूसरा बिना पलक झपकाये इस कदर बाहर आ रहा था मानो अभी कोया छूटकर सामने ज़मीन पर आन गिरेगा!

मन कड़ा किये सख़्ती से एक बार भरपूर फक़ीर के चेहरे को तकने के बाद मल्‍ली ने एकदम से नज़र फेर लिया, छोटे भाई से बोली, ‘उधर भूले से भी देखना नहीं!’

आठ वर्ष के मुन्‍ने की नज़र तब से बहन के हाथ में किरमानियों के बाज़ार से खरीदे आम के झोले पर थी, वहीं गड़ी रही, मुंह से निकला, ‘दीदीजान, मैं एक बार में कितने आम खा सकता हूं?’

भाई के इरादों पर मल्‍ली की नज़र गई तो उसने हिक़ारत से कहा, ‘एक भी नहीं, क्‍योंकि मैं तुम्‍हें इन्‍हें देनेवाली नहीं! तुम्‍हें मालूम है कहां से आये हैं, इनकी कीमत क्‍या है?’

सिमोन द फुआ भले बहुत सदियों बाद ‘द प्राइम ऑफ़ लाइफ़’[1] लिखतीं, तेरह वर्ष की मल्‍ली ने उस प्राइम को पाने के पहले ही अपने लिए जीवन का वह मर्म समझ लिया था. अलबत्‍ता बहन के जवाब की सख़्ती से मुन्‍ने का मिजाज़ उखड़ गया, वह भागा-भागा आगे गया और चाचा का कुरता खींचता शिकायत की, ‘तालेबचा, तालेबचा, क्‍या मैं आम नहीं खाऊंगा?’

तालेब ऊरुब ने बच्‍चे को खींचकर गोद में कर लिया और शहर के जंतर-मंतर का हिसाब समझते रहे.

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What kind of towns were they all, really?

Their streets were narrow and generally slopping, so as to be washed automatically by the rain. A hadit of the Prophet’s prescribed that streets should be seven cubits wide, permitting two laden asses to pass each-other. But this was impossible: houses encroached on the street despite the letter of the law, and very often had an overhanging upper floor, like medieval houses in the West.

A Frenchman, Volney, would describe these narrow streets in 1782 as follows:

“Since they are not paved, the masses of people, camels, asses and dogs which crowd into them kick up a disagreeable dust. Frequently, people throw water in front of their doors, and the dust gives way to mud and malodorous fumes. Contrary to normal custom in the East, the houses are two to three storeys tall, topped by a paved or loamed terrace. Most of them are built of mud or badly fired brick.. All of them look like prisons, because they have no windows on the street.”

Narrow as it was, the street in any Muslim country was always very lively – a permanent meeting place for people who enjoyed open-air display. It was ‘the essential artery, the rendezvous for story-tellers, singers, snake-charmers, mountebanks, healers, charlatans, barbers and all those professionals who are so suspect in the eyes of Islam’s moralists and canon lawyers. Add to that the children and their often violent games.’ And as well as the streets, the terraces were inter-communicating, although they were reserved for the women.

Such teeming disorder, however, never excluded an overall plan- especially since this was based on the very structure of the town and the life of its inhabitants. At its centre was the Great Mosque for the weekly sermon. ‘To it and from it everything flows, as if it were a heart.’ Nearby was the bazaar and its caravanserais or warehouses, as well as the public baths which were established and maintained despite frequent condemnations. Artisans were grouped concentrically, starting from the Great Mosque: first, the makers and sellers of perfumes and incense, then the shop selling fabrics and rugs, the jewelers and food stores and finally the humblest traders—curriers, cobblers, blacksmiths, potters, saddlers, dyers. Their shops marked the edges of the town.

In principle, each of these trades had its location fixed for all time. Similarly, the Prince’s quarter was in principle located on the outskirts of the city, well away from riots or popular revolts. Next to it, and under its protection, was the mellah or Jewish quarter. The mosaic was completed by a very great variety of residential districts, divided by race and religion: there were forty-five in Antioch alone. ‘The town was a cluster of different quarters, all living in fear of massacre.’ So western colonists nowhere began racial segregation – although they nowhere suppressed it.


[1]. “We were not ascetics, far from it; but now as before (and in this Sartre and I were alike) only those things within my reach, in particular those I could actually touch, had any true weight of realty for me. I gave myself up so completely to present desires and pleasures that I had no energy to waste on mere wishful thinking.”

5 comments:

  1. सुंदर पोस्ट

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  2. आभार


    .अच्छी पोस्ट!

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  3. बहुत बढ़िया प्रस्तुति

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  4. बेहतरीन लेख के लिए मिले अनेक तारीफों में एक तारीफ मेरी भी शामिल कर लीजिए.

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  5. It is really nice to read your site. I'll be visiting it more often. By the way, even I am a Hindi writer and a published poet. You can read some of my poems here- http://souravroy.com/poems/

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