मगर बनती कहां है?



कुछ भले, भोले लोग घर खड़ा करने की कोशिश करते हैं, पता चलता है कुछ समय बाद उन्‍हें बेदखल कर वह जगह इतिहास ने घर कर लिया है. इतिहास क्‍या है? मुंह खोलकर बतायें कार साहब.. क्‍योंकि पढ़ने के नाम पर तो ताज़ा बरसात बरसी है, मैं उसको तक नहीं पढ़ पा रहा (घबरा रहा हूं).. पढ़ने की ही बन जाती, तक़दीर? क्‍यों नहीं बनती?

ऊपर की तस्‍वीर बीसवीं सदी के शुरुआत में रमल्‍ला के एक किसान परिवार की है, यहां वीकीपीडिया से उठकर आई है..

 
This Post has 7 Comments Add your own!
शायदा - June 14, 2010 8:58 PM

पहली बार आपकी बात एकदम समझ में आई।

Pramod Singh - June 14, 2010 9:06 PM

@सुश्री शाहेदा,
हाईस्‍कूल के मार्कशीट अब तक संभालकर रखे होंगे तो मुझे पूरा यकीन है आगे भी आपकी समझ ऐसे ही ज़हीनी रास्‍तों पर बढ़ती चलेगी.

indli - June 14, 2010 9:53 PM

नमस्ते,

आपका बलोग पढकर अच्चा लगा । आपके चिट्ठों को इंडलि में शामिल करने से अन्य कयी चिट्ठाकारों के सम्पर्क में आने की सम्भावना ज़्यादा हैं । एक बार इंडलि देखने से आपको भी यकीन हो जायेगा ।

शायदा - June 14, 2010 10:22 PM

अगर मार्कशीट संभाली होती तो बात ही क्‍या थी। आपकी सारे पोस्‍टें न समझ आ जातीं।

उन्मुक्त - June 15, 2010 7:27 AM

मुझे इतिहास कभी अच्छा नहीं लगा फिर EH Carr की 'What is History' पढ़ी तब कुछ रुचि हुई।

Shiv - June 15, 2010 9:51 AM

हाईस्कूल की मार्कशीट आज ही खोजता हूँ. उसके बाद पोस्ट पढ़ता हूँ. कल भी समझ न आई तो मान लूंगा कि नागरिक इंटर कालेज, जंघई, जौनपुर से हाईस्कूल...

काफ़ी दिनों के बाद आया----लेकिन सही समय पर आया नहीं तो यह चित्र देखने से वंचित ही रह जाता।

Post a Comment