Thursday, June 17, 2010

आसान नहीं होता, होना.. लेखक..



तुम्हारे लिए तो पैरिस ‘अ मूवेबल फीस्ट’ नहीं होगा, फिर फटेहाल क्यों घूमते होगे, ढूंढ़ते क्या लंदन में, लेखक? सैंतालीस साल के संक्षिप्त जीवन में जीवन से कैसा जी लगाया होगा, भाषा को सर के बल खड़ा करके बस इतनी ज़रा उम्र, अपनों की ही नहीं, स्पेन के सपनों की भी घुमाई की, ‘घोर-घर’ औ’ ‘चौरासी’ की रचाई, मुल्क के बबर शेर का तुमने क्या बेहया ढेर किया, लेखक को लेखक की तरह खड़ा होने का क्या शुऊर दिया, जॉर्ज?

2 comments:

  1. अरे, बाप रे ! इतने सारे लिंक पर कोई बात नहीं आपकी ये पोस्ट भी सम्भाल कर पढ़ी और रखी जाएगी........"

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  2. "अद्भुत है...."

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