कुत्ते भौंकते रहते हैं. मैं सोचता रहता हूं. और इसी में ‘रावण’ रिलीज़ भी हो जाती है. पोस्‍टर पहले रिलीज़ हुई थी, तब कुत्ते शांत थे, मगर मैं तब भी सन्‍न हुआ था कि कागज़ पर ये लाल, पीले, नीले की अलग-अलग शोभा तो ठीक है, मगर जिस चेहरे के आसरे ये रंग मुखरित, मर्मावस्‍थी हो रहे हैं, उस चेहरे के विविध(?)-भावों को ‘जुवेनाइल’ के खांचे में रखा जाये या मानसिक-व्‍याधि की परिधि में? धन्‍य होगा वह मणि रतन जो ऐसे विविध-भावी, अभिनय-स्‍पर्शी प्रतिभा के बूते अपने ‘रावण’ की इमारत खड़ी करे. मगर खड़ी तो की है. सब तरफ चित्र-वितान चीख़-चीख़कर इसकी घोषणा कर ही रहे हैं कि लो, हम खड़े हो गए! ‘गाइड’ में देवानंद तक को दर्शकों ने एक्‍टर मान लिया था, ‘आनंद’ में राजेश खन्‍ना हो माना ही था, ‘गुरु’ में फिर इन गुणकारी तक को मानने लगे थे, फिर ‘रावण’ से ही ऐसी रार क्‍यों हो? हे दीन, मल्‍टीप्‍लेक्‍स घेटआइज़्ड दलिद्दर, अभिनय का दसरूप न देखोगे, मणि के कैमराकारी जतनों के दस रंग देखने का सौभाग्‍य तो बनेगा?

कुत्ते भौंकते रहते हैं. मैं सोचता रहता हूं. उस ऐश्‍वर्यधारी के सोचकर भी दंग होता रहता हूं जो प्रतिभा के ऐसे दशावतार धनी की संगत में मंडप का क़रारनामा लिखवाकर बाकी का जीवन संवारने एक चिरकुटई से दूसरे में पहुंच गई! इससे पहले भी प्रतिभाओं के ऐसे ही नामचीन दो अभिनय-कुसुमकुमारों के आगे-पीछे हंसती, और बाद में हंसी का पात्र बनती दिखती ही रही थी. और तब जबकि लड़की पढ़ी-लिखी है. मगर देखिए, फिर भी ऐसी होनहारी दीखाने से बाज़ नहीं आई. इसीलिए बाज मर्तबा हैरत नहीं होती कि हिंदुस्‍तानी लड़कियां सचमुच अपने जीवन के क्रांतिकारी रुपान्‍तरण की दिशा में कैसे सधे कदम धर रही हैं. वैसे ही धर रही हैं जैसे ‘हम आपके हैं कौन’ बनाकर हिन्‍दी सिनेमा ने स्‍वयं को साधना, डॉलर्स में बांधना शुरू कर दिया था.

कुत्ते भौंकते रहते हैं. मैं सोचता रहता हूं. देश में दस भोपाल गैस कांड हो जायेंगे, त्रासदी के भोक्‍ताओं को न्‍याय कमोबेश सब कहीं एक-सा मिलेगा, मगर हम शहरातियों, महानगरीय बरातियों को ज़रा मौका मिलेगा नहीं कि हम तपाक से फिर दशावतारी, दसरंगी गानों के चिलमन में डूबने लगेंगे. जैसे कि हिन्‍दी का अनोखा सिरजनहार, रचनाकार अपनी अनोखी, तत्‍समधर्मी, रचनाशीलता के इश्‍क में डूबा रहता है! कुछ अनोखी राष्‍ट्रीय ‘डेस्टिनी’ हम अपनी किस्‍मत की झोली में लेकर आये होंगे कि रावणलला के इतने सारे समानांतर नाच हमारे गिर्द चलते रहते हैं, मगर हमारे नामवर साहित्‍य का उस विद्रूप यथार्थ में घेले भर का हस्‍तक्षेप नहीं होता. हो सकता. लिखनेवाले मगर मिनट भर को नहीं चौंकते. एक लंबी कविता के बाद दूसरा महाउपन्‍यास लिखने रचने का ख़्वाब सिलने लगते हैं. लिखनेवाले साहित्‍य-रतन जितना भी अभिषेकी-अकल वाली मुस्‍की काटते रहें, रेल की खिड़की पर एक हाथ से मूंगफली तोड़ते और दूसरे से किताब का पन्‍ना पलटते पाठक पढ़ अभी भी वही सुरेंद्र मोहन संसार रहे हैं. जैसे इस देश में इतिहास रचनेवाला बड़े शहरों का अंग्रेजीदां संसार सन्‍न रहा होगा जब तिरानबे में राम जन्‍मभूमि के सिपाही उसके रचे सारे इतिहास को मूंगफली का ठोंगा बनाकर एक तरफ फेंक गये थे, और फिर हंसते-हंसते अपने लुगदी पंप्‍लेटी इतिहास का लाऊडस्‍पीकरी उद्घघोषणओं के चित्‍कार में रामलला के उद्धार के लिए अजोध्‍या पहुंच गए थे!

कुत्ते भौंकते रहते हैं. मैं सोचता रहता हूं. जो मानसिक-व्‍याधि है, समूचे मुल्‍क की है, और बहुत सारी भूमिका भले हो मगर सिर्फ़ मीडिया का क्रियेशन नहीं है, तो सोचनेवालों को सोचते रहना चाहिए कि इस दुश्‍कर रावणलीला समय में वह कूल-कैट दीखने के मोह अपने-अपने कुष्‍ठ कोटरों में सहूलियत का दूध सड़पते रहेंगे, या बड़े सामाजिक फलक के कॉमन-सेंस में फेर-बदल लाने के किसी वृहत उद्यम में स्‍वयं को झोंकने की तरकीबें भिड़ायेंगे? भले वह कुत्ते का भदेस भौंकना ही दीखे? राष्‍ट्रीय निर्माण का अभी इतना पुराना भी नहीं हुआ वह एक दौर था समाज में व्‍यक्ति का योगदान उसके डॉक्‍टर, इंजीनियर, मास्‍टर होने में आंका जाता था, अब डॉक्‍टर, इंजीनियर, मास्‍टर तक सिर्फ़ कॉरपोरेट गुरु होना चाहते हैं, चैनल्‍स चीख़-चीख़कर ऐलान करते रहते हैं, ‘लुक, लुक, रावण इज़ सो कूल!’ और हम हंसते, पुलकित होते हैं. होते रहते हैं.

गनीमत है कुत्ते का जीवट है जो अभी भी भौंकता रहता है.

 
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Mired Mirage - June 18, 2010 2:41 PM

शायद संसार में जो थोड़ा बहुत स्थायित्व, ठहराव है वह कुत्तों व उनके भौंकने और बिल्लियों की म्याऊं से ही है। जब वे भौंकना बन्द करेंगे तो...
घुघूती बासूती

Shiv - June 18, 2010 2:48 PM

जीवट तो अब कुत्तों में ही दिखाई देता है. सूअर के भित्तर ता कभी था भी नहीं. और अगर कभी था भी कबे मर गया था. रावण के दश माथे रावण के सौ दांत.

कैमरा बढ़िया एक्टिंग किया है ई बात ता हमहू सुने हैं.

मानसिक व्याधि है देश की, कुत्ते भौंकना । कोई उन्हें काटना भी सिखाओ भाई ।

aapko hamara pahla comment nahin jama?

फिर सेः आप अपने "आत्मसंघर्ष" और "रचनात्मक बेचैनी" को इतनी "चालू", "खराब" भाषा में काहे लिखते हैं? थोड़ा "आत्म-सुख" लिया कीजिये और जे क्या कुत्ता सूअर कौवा ले आते हैं "आत्म-परिष्कार" के बारे में मनन करिये।

Pramod Singh - June 19, 2010 12:26 AM

@गिरिराज,
जेनुइनली, मालूम नहीं मित्र, 'चालू' और 'खराब' जिसे आप चिन्हित कर रहे हैं, और आपके अंदर 'परिष्‍कृत' का कोई ख़याल होगा, मेरे लिए भाषा, ख़ासतर पर वह हिन्‍दी जिसमें मैं स्‍वयं को ठीक से व्‍यक्‍त कर सकूं, वह सतत खोजते रहनेवाली कोई चीज़ है. हमेशा भयानक रुप से असंतुष्‍ट किये रखनेवाली. आपलोग नहीं होते, मेरे समझ नहीं आता.

प्रज्ञा - June 19, 2010 12:32 AM

!कुत्ते ना भौंकें तो और आफत रहे ...भूक भूक कर ही जिए जाएँ कैसे भी .....अच्छा लिखे आप .. हम भी नाईस लिख दें का !!

हम तो आपके सुर में सुर मिला रहे थे और "--" लगाकर यही जता रहे थे कि वो सब हमारे मन में नहीं। आपने जिन तत्समियों का ध्यान किया है वे ऐसे ही भारी भारी शब्द काम में लेते हैं - "रचनात्मक बेचैनी", "आत्म संघर्ष" और अगर आप जैसे तरीके से सचमुच का अपनी अभिव्यक्ति खोजने का काम हो रहा हो तो ऐसे "पतनशील साहित्य" व उसकी भाषा को "चालू", "खराब" आदि बताते हैं।

आभा - June 19, 2010 7:21 AM

आप की छोटी छोटी पोस्ट, शब्दों के साथ खेलना आन्नद आता है पढ़ कर , घुघुती जी की बात पर ध्यान दें। विवेक रस्तोगी जी ने बज पर आप की यह पोस्ट भेजी है , मेरा कमेंट करना मुश्किल हुआ है, बेरे बेरे कंपूटरवा नचा रहा हैं टक टक टुकुर टक....

Pramod Singh - June 19, 2010 10:22 AM

@गिरीराज,
अपने पिटे सेंस ऑफ़ ह्यूमर के लिए माफ़ी चाहता हूं. शायद 'भौंकना' बहुत ज़्यादा दिमाग पर चढ़ा रहा होगा.

सोचा था कि ’रावण’ देखेगे, पर आपने हीरो महोदय की विविध-भावी, अभिनय-स्‍पर्शी, गुणकारी प्रतिभा का जो परिचय दिया है और हीरोईन महोदया की समझदारी के जो किस्से सुनाये है.. लगता है कि ये वीकेन्ड काटने के लिये कुछ और ही इन्तज़ामात करने पडेगे..

कभी कभार मुझे लगता है कि समझदारी पर एक पर्दा पडा रहना भी अच्छा ही है.. नही तो ज़िन्दगी जीना बडा मुश्किल हो जाता है.. अब देखिये मै भी चुपचाप मूवी देखता फ़िर रावण इज़ सो कूल बोलते घूमता... पर पता नही क्यू अब मन नही करता...

bhupen - June 21, 2010 9:56 AM

कुत्ते भौंकते रहते हैं. हाथी चलते रहते हैं.....इसलिए कई बार कुत्तों के भोंकने की असलियत आंकने के बाद भी चलना जारी रहना चाहिए.

डॉ .अनुराग - June 21, 2010 11:54 PM

हैरान हूँ.मणिरत्नम को क्या हुआ ?कंटेंट -स्टोरी गायब है.....तर्क एकतरफा अधूरे....सिर्फ संतोष शिवन है

rangbaaz - June 22, 2010 11:25 PM

कुकरमुत्ता पर पगलैट निराला लिख गए.

सुअरिया,छिपकली,कौवे,मुरगे,चूहे,सांप,सरीसृप,कुत्ते,यहां तक कि टेरियर कुत्ते पर नागार्जुन और मुक्तिबोध लिख गए. आप काहे इन गुज़रे जमाने के बुड्ढों की तरह किलसते हैं.

डोमा जी उस्ताद की बात मानिये. परिष्कृत सुधीजन ’आत्मा अधीरा’ से भी ’विमल सदानीरा’ की उम्मीद रखते हैं.

काहे विवेक का रंदा-बसूला चलाते हैं. काहे कुहरीला,पथरीला और जहरीला लिख कर प्रक्षेपास्त्र की तरह फेंकते हैं.आपको बेचैनी होगी,होगी. हमरा चोला तो चैन में है. थोड़ा पनीला और सुरीला लिखिए ना .

आपका तो कब्बों नहीं होगा पर हमरा तो आत्म-परिष्कार होने दीजिये. देखिए न रावण इज़ सो कूल, एण्ड वॉट टु से अबाउट राम -- ही इज़ सच अ फ़ूल !

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