Friday, June 18, 2010

ऐसे नचनियाये, पिल्‍लाये समय में..

कुत्ते भौंकते रहते हैं. मैं सोचता रहता हूं. और इसी में ‘रावण’ रिलीज़ भी हो जाती है. पोस्‍टर पहले रिलीज़ हुई थी, तब कुत्ते शांत थे, मगर मैं तब भी सन्‍न हुआ था कि कागज़ पर ये लाल, पीले, नीले की अलग-अलग शोभा तो ठीक है, मगर जिस चेहरे के आसरे ये रंग मुखरित, मर्मावस्‍थी हो रहे हैं, उस चेहरे के विविध(?)-भावों को ‘जुवेनाइल’ के खांचे में रखा जाये या मानसिक-व्‍याधि की परिधि में? धन्‍य होगा वह मणि रतन जो ऐसे विविध-भावी, अभिनय-स्‍पर्शी प्रतिभा के बूते अपने ‘रावण’ की इमारत खड़ी करे. मगर खड़ी तो की है. सब तरफ चित्र-वितान चीख़-चीख़कर इसकी घोषणा कर ही रहे हैं कि लो, हम खड़े हो गए! ‘गाइड’ में देवानंद तक को दर्शकों ने एक्‍टर मान लिया था, ‘आनंद’ में राजेश खन्‍ना हो माना ही था, ‘गुरु’ में फिर इन गुणकारी तक को मानने लगे थे, फिर ‘रावण’ से ही ऐसी रार क्‍यों हो? हे दीन, मल्‍टीप्‍लेक्‍स घेटआइज़्ड दलिद्दर, अभिनय का दसरूप न देखोगे, मणि के कैमराकारी जतनों के दस रंग देखने का सौभाग्‍य तो बनेगा?

कुत्ते भौंकते रहते हैं. मैं सोचता रहता हूं. उस ऐश्‍वर्यधारी के सोचकर भी दंग होता रहता हूं जो प्रतिभा के ऐसे दशावतार धनी की संगत में मंडप का क़रारनामा लिखवाकर बाकी का जीवन संवारने एक चिरकुटई से दूसरे में पहुंच गई! इससे पहले भी प्रतिभाओं के ऐसे ही नामचीन दो अभिनय-कुसुमकुमारों के आगे-पीछे हंसती, और बाद में हंसी का पात्र बनती दिखती ही रही थी. और तब जबकि लड़की पढ़ी-लिखी है. मगर देखिए, फिर भी ऐसी होनहारी दीखाने से बाज़ नहीं आई. इसीलिए बाज मर्तबा हैरत नहीं होती कि हिंदुस्‍तानी लड़कियां सचमुच अपने जीवन के क्रांतिकारी रुपान्‍तरण की दिशा में कैसे सधे कदम धर रही हैं. वैसे ही धर रही हैं जैसे ‘हम आपके हैं कौन’ बनाकर हिन्‍दी सिनेमा ने स्‍वयं को साधना, डॉलर्स में बांधना शुरू कर दिया था.

कुत्ते भौंकते रहते हैं. मैं सोचता रहता हूं. देश में दस भोपाल गैस कांड हो जायेंगे, त्रासदी के भोक्‍ताओं को न्‍याय कमोबेश सब कहीं एक-सा मिलेगा, मगर हम शहरातियों, महानगरीय बरातियों को ज़रा मौका मिलेगा नहीं कि हम तपाक से फिर दशावतारी, दसरंगी गानों के चिलमन में डूबने लगेंगे. जैसे कि हिन्‍दी का अनोखा सिरजनहार, रचनाकार अपनी अनोखी, तत्‍समधर्मी, रचनाशीलता के इश्‍क में डूबा रहता है! कुछ अनोखी राष्‍ट्रीय ‘डेस्टिनी’ हम अपनी किस्‍मत की झोली में लेकर आये होंगे कि रावणलला के इतने सारे समानांतर नाच हमारे गिर्द चलते रहते हैं, मगर हमारे नामवर साहित्‍य का उस विद्रूप यथार्थ में घेले भर का हस्‍तक्षेप नहीं होता. हो सकता. लिखनेवाले मगर मिनट भर को नहीं चौंकते. एक लंबी कविता के बाद दूसरा महाउपन्‍यास लिखने रचने का ख़्वाब सिलने लगते हैं. लिखनेवाले साहित्‍य-रतन जितना भी अभिषेकी-अकल वाली मुस्‍की काटते रहें, रेल की खिड़की पर एक हाथ से मूंगफली तोड़ते और दूसरे से किताब का पन्‍ना पलटते पाठक पढ़ अभी भी वही सुरेंद्र मोहन संसार रहे हैं. जैसे इस देश में इतिहास रचनेवाला बड़े शहरों का अंग्रेजीदां संसार सन्‍न रहा होगा जब तिरानबे में राम जन्‍मभूमि के सिपाही उसके रचे सारे इतिहास को मूंगफली का ठोंगा बनाकर एक तरफ फेंक गये थे, और फिर हंसते-हंसते अपने लुगदी पंप्‍लेटी इतिहास का लाऊडस्‍पीकरी उद्घघोषणओं के चित्‍कार में रामलला के उद्धार के लिए अजोध्‍या पहुंच गए थे!

कुत्ते भौंकते रहते हैं. मैं सोचता रहता हूं. जो मानसिक-व्‍याधि है, समूचे मुल्‍क की है, और बहुत सारी भूमिका भले हो मगर सिर्फ़ मीडिया का क्रियेशन नहीं है, तो सोचनेवालों को सोचते रहना चाहिए कि इस दुश्‍कर रावणलीला समय में वह कूल-कैट दीखने के मोह अपने-अपने कुष्‍ठ कोटरों में सहूलियत का दूध सड़पते रहेंगे, या बड़े सामाजिक फलक के कॉमन-सेंस में फेर-बदल लाने के किसी वृहत उद्यम में स्‍वयं को झोंकने की तरकीबें भिड़ायेंगे? भले वह कुत्ते का भदेस भौंकना ही दीखे? राष्‍ट्रीय निर्माण का अभी इतना पुराना भी नहीं हुआ वह एक दौर था समाज में व्‍यक्ति का योगदान उसके डॉक्‍टर, इंजीनियर, मास्‍टर होने में आंका जाता था, अब डॉक्‍टर, इंजीनियर, मास्‍टर तक सिर्फ़ कॉरपोरेट गुरु होना चाहते हैं, चैनल्‍स चीख़-चीख़कर ऐलान करते रहते हैं, ‘लुक, लुक, रावण इज़ सो कूल!’ और हम हंसते, पुलकित होते हैं. होते रहते हैं.

गनीमत है कुत्ते का जीवट है जो अभी भी भौंकता रहता है.

16 comments:

  1. शायद संसार में जो थोड़ा बहुत स्थायित्व, ठहराव है वह कुत्तों व उनके भौंकने और बिल्लियों की म्याऊं से ही है। जब वे भौंकना बन्द करेंगे तो...
    घुघूती बासूती

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  2. जीवट तो अब कुत्तों में ही दिखाई देता है. सूअर के भित्तर ता कभी था भी नहीं. और अगर कभी था भी कबे मर गया था. रावण के दश माथे रावण के सौ दांत.

    कैमरा बढ़िया एक्टिंग किया है ई बात ता हमहू सुने हैं.

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  3. मानसिक व्याधि है देश की, कुत्ते भौंकना । कोई उन्हें काटना भी सिखाओ भाई ।

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  4. फिर सेः आप अपने "आत्मसंघर्ष" और "रचनात्मक बेचैनी" को इतनी "चालू", "खराब" भाषा में काहे लिखते हैं? थोड़ा "आत्म-सुख" लिया कीजिये और जे क्या कुत्ता सूअर कौवा ले आते हैं "आत्म-परिष्कार" के बारे में मनन करिये।

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  5. @गिरिराज,
    जेनुइनली, मालूम नहीं मित्र, 'चालू' और 'खराब' जिसे आप चिन्हित कर रहे हैं, और आपके अंदर 'परिष्‍कृत' का कोई ख़याल होगा, मेरे लिए भाषा, ख़ासतर पर वह हिन्‍दी जिसमें मैं स्‍वयं को ठीक से व्‍यक्‍त कर सकूं, वह सतत खोजते रहनेवाली कोई चीज़ है. हमेशा भयानक रुप से असंतुष्‍ट किये रखनेवाली. आपलोग नहीं होते, मेरे समझ नहीं आता.

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  6. !कुत्ते ना भौंकें तो और आफत रहे ...भूक भूक कर ही जिए जाएँ कैसे भी .....अच्छा लिखे आप .. हम भी नाईस लिख दें का !!

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  7. हम तो आपके सुर में सुर मिला रहे थे और "--" लगाकर यही जता रहे थे कि वो सब हमारे मन में नहीं। आपने जिन तत्समियों का ध्यान किया है वे ऐसे ही भारी भारी शब्द काम में लेते हैं - "रचनात्मक बेचैनी", "आत्म संघर्ष" और अगर आप जैसे तरीके से सचमुच का अपनी अभिव्यक्ति खोजने का काम हो रहा हो तो ऐसे "पतनशील साहित्य" व उसकी भाषा को "चालू", "खराब" आदि बताते हैं।

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  8. आप की छोटी छोटी पोस्ट, शब्दों के साथ खेलना आन्नद आता है पढ़ कर , घुघुती जी की बात पर ध्यान दें। विवेक रस्तोगी जी ने बज पर आप की यह पोस्ट भेजी है , मेरा कमेंट करना मुश्किल हुआ है, बेरे बेरे कंपूटरवा नचा रहा हैं टक टक टुकुर टक....

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  9. @गिरीराज,
    अपने पिटे सेंस ऑफ़ ह्यूमर के लिए माफ़ी चाहता हूं. शायद 'भौंकना' बहुत ज़्यादा दिमाग पर चढ़ा रहा होगा.

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  10. सोचा था कि ’रावण’ देखेगे, पर आपने हीरो महोदय की विविध-भावी, अभिनय-स्‍पर्शी, गुणकारी प्रतिभा का जो परिचय दिया है और हीरोईन महोदया की समझदारी के जो किस्से सुनाये है.. लगता है कि ये वीकेन्ड काटने के लिये कुछ और ही इन्तज़ामात करने पडेगे..

    कभी कभार मुझे लगता है कि समझदारी पर एक पर्दा पडा रहना भी अच्छा ही है.. नही तो ज़िन्दगी जीना बडा मुश्किल हो जाता है.. अब देखिये मै भी चुपचाप मूवी देखता फ़िर रावण इज़ सो कूल बोलते घूमता... पर पता नही क्यू अब मन नही करता...

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  11. कुत्ते भौंकते रहते हैं. हाथी चलते रहते हैं.....इसलिए कई बार कुत्तों के भोंकने की असलियत आंकने के बाद भी चलना जारी रहना चाहिए.

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  12. हैरान हूँ.मणिरत्नम को क्या हुआ ?कंटेंट -स्टोरी गायब है.....तर्क एकतरफा अधूरे....सिर्फ संतोष शिवन है

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  13. कुकरमुत्ता पर पगलैट निराला लिख गए.

    सुअरिया,छिपकली,कौवे,मुरगे,चूहे,सांप,सरीसृप,कुत्ते,यहां तक कि टेरियर कुत्ते पर नागार्जुन और मुक्तिबोध लिख गए. आप काहे इन गुज़रे जमाने के बुड्ढों की तरह किलसते हैं.

    डोमा जी उस्ताद की बात मानिये. परिष्कृत सुधीजन ’आत्मा अधीरा’ से भी ’विमल सदानीरा’ की उम्मीद रखते हैं.

    काहे विवेक का रंदा-बसूला चलाते हैं. काहे कुहरीला,पथरीला और जहरीला लिख कर प्रक्षेपास्त्र की तरह फेंकते हैं.आपको बेचैनी होगी,होगी. हमरा चोला तो चैन में है. थोड़ा पनीला और सुरीला लिखिए ना .

    आपका तो कब्बों नहीं होगा पर हमरा तो आत्म-परिष्कार होने दीजिये. देखिए न रावण इज़ सो कूल, एण्ड वॉट टु से अबाउट राम -- ही इज़ सच अ फ़ूल !

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  14. लेखन के लिये “उम्र कैदी” की ओर से शुभकामनाएँ।

    जीवन तो इंसान ही नहीं, बल्कि सभी जीव जीते हैं, लेकिन इस समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार, मनमानी और भेदभावपूर्ण व्यवस्था के चलते कुछ लोगों के लिये मानव जीवन ही अभिशाप बन जाता है। अपना घर जेल से भी बुरी जगह बन जाता है। जिसके चलते अनेक लोग मजबूर होकर अपराधी भी बन जाते है। मैंने ऐसे लोगों को अपराधी बनते देखा है। मैंने अपराधी नहीं बनने का मार्ग चुना। मेरा निर्णय कितना सही या गलत था, ये तो पाठकों को तय करना है, लेकिन जो कुछ मैं पिछले तीन दशक से आज तक झेलता रहा हूँ, सह रहा हूँ और सहते रहने को विवश हूँ। उसके लिए कौन जिम्मेदार है? यह आप अर्थात समाज को तय करना है!

    मैं यह जरूर जनता हूँ कि जब तक मुझ जैसे परिस्थितियों में फंसे समस्याग्रस्त लोगों को समाज के लोग अपने हाल पर छोडकर आगे बढते जायेंगे, समाज के हालात लगातार बिगडते ही जायेंगे। बल्कि हालात बिगडते जाने का यह भी एक बडा कारण है।

    भगवान ना करे, लेकिन कल को आप या आपका कोई भी इस प्रकार के षडयन्त्र का कभी भी शिकार हो सकता है!

    अत: यदि आपके पास केवल कुछ मिनट का समय हो तो कृपया मुझ "उम्र-कैदी" का निम्न ब्लॉग पढने का कष्ट करें हो सकता है कि आपके अनुभवों/विचारों से मुझे कोई दिशा मिल जाये या मेरा जीवन संघर्ष आपके या अन्य किसी के काम आ जाये! लेकिन मुझे दया या रहम या दिखावटी सहानुभूति की जरूरत नहीं है।

    थोड़े से ज्ञान के आधार पर, यह ब्लॉग मैं खुद लिख रहा हूँ, इसे और अच्छा बनाने के लिए तथा अधिकतम पाठकों तक पहुँचाने के लिए तकनीकी जानकारी प्रदान करने वालों का आभारी रहूँगा।

    http://umraquaidi.blogspot.com/

    उक्त ब्लॉग पर आपकी एक सार्थक व मार्गदर्शक टिप्पणी की उम्मीद के साथ-आपका शुभचिन्तक
    “उम्र कैदी”

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  15. लेखन के मूल में जो चिंता है वह तो ठीक ही है ,लेखक की भाषा चाहे जैसी हो ,

    हमारे देश में एक मिथक चला आ रहा है कि देवता सोमरस का पान करते हैं और अप्सराओं के साथ राग रंग में स्वर्ग का आनंद उठाते हैं .वह सोम रस क्या है ? सोम का अर्थ है चन्द्रमा और चंद्रदेव को ही जड़ी बूटियों का अधिपति माना गया है .इन जड़ी बूटियों में चन्द्रमा अपनी किरणों से उज्ज्वलता और शान्ति भरते हैं .इसीलिए इन जड़ी बूटियों से जो रसायन तैयार होकर शरीर में नव जीवन और नव शक्ति का संचार करते हैं उन्हें सोमरस कहा जाता है .

    ऐसा ही एक सोमरस रसायन मुझे तैयार करने में सफलता मिली है जिसमे मेहनत और तपस्या का महत्वपूर्ण योगदान है .वह है- निर्गुंडी रसायन
    और
    हल्दी रसायन
    ये रसायन शरीर में कोशिका निर्माण( cell reproduction ) की क्षमता में ४ गुनी वृद्धि करते हैं .
    ये रसायन प्रजनन क्षमता को ६ गुना तक बढ़ा देते हैं .
    ये रसायन शरीर में एड्स प्रतिरोधक क्षमता उत्पन्न कर देते हैं
    ये रसायन झुर्रियों ,झाइयों और गंजेपन को खत्म कर देते हैं
    ये रसायन हड्डियों को वज्र की तरह कठोर कर देते हैं.
    ये रसायन प्रोस्टेट कैंसर ,लंग्स कैंसर और यूट्रस कैंसर को रोकने में सक्षम है.

    अगर कोई इन कैंसर की चपेट में आ गया है तो ये उसके लिए रामबाण औषधि हैं.
    अर्थात
    नपुंसकता,एड्स ,कैंसर और बुढापा उन्हें छू नहीं सकता जो इन रसायन का प्रयोग करेंगे .
    मतलब देवताओं का सोमरस हैं ये रसायन.
    9889478084

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