Saturday, June 19, 2010

बिछिलाहटें..

खाली तीन दिन की बारिश हुई है, एतने में कंप्‍लीट रामलीला का शो देख लीजिए!

मतलब सोमारु का मंझलका छौंड़ा था, बछिया को जाने कौन उंगली कर रहा था कि डंडी, बछिया का मम्‍मी देखत रही, देखत रही, फिर छिनकके अइसा दौड़ी है छौंड़वा का पीछे, कि अंगना का बिछिलाहट में फिसिल के पिछलका गोड़ तोड़वा ली है! केस नम्‍मर टू: सगीना महतो के खपरे पर तैयार, बतिया जेतनो लवकी था, सब मालूम नहीं केकरा घर का चोर-पाल्‍टी रहा, बरसाती का अंधारा में जाने कब लुकाके कवन जतन कब खपरा पे चढ़ा, खपरे का टोटल लवकी खजाना खलास. नंगा दिन-दहाड़े का डकैती! अब केस नम्‍मर थीरी पूछिये? डेढ़ हफ्ता से जोत्‍सना दीदी जीवन-लीला खतम कै लेंगी का बात सोच-सोच के अपना एक जगह अस्थिर बैठना-ठाड़ा होना तक मोहाल किये थीं, फिर आखिरकार जब तै कर लिया कि शनिच्‍चर की रात फैसले की रात होगी तो बियफे से जो बिजली कड़कना चालू हुआ और मुसलाधारी का खपड़ा और टीना और दुआरी और अंगना में भहरना, जोत्‍सना दीदी सुसैडी का आइडिया पिछवाड़ा का दीवार का पीछे- प्राइबेट कपड़ा का माफिक- फिलहाल के लिए फेंक आई हैं. अइसा कीचर-कादो का बीच अंगना का जमीन पर अपने को जीवन-सून्‍य देखने का खयाल जोत्‍सना दीदी को बेहद अश्‍लील लगता है!

खाली तीन दिन का बारिश है!

सुबह से चौथी बार है मालती फुआ अंगना का पानी झाड़ू से हटा रही हैं, ‘अकेले हम ही इस घर में अंग फोड़ते रहें, अऊर सबके जांगर पे त्s चमेली का फूल चढ़ा हुआ है!’

‘तs तूको कौन बोला है साड़ी खोंसके अंगना में जाके झांसी का रानी बने का? पनिया बहरा जायेगा त घंटा भर में फिर दुबारा हुंआ इकट्ठा नै होगा?’ सारस की तरह बरामदे के अंधेरे में खटिया पर उठंगे लेटे, मुंह उठाकर फूफा एकदम से बोलना चाहते हैं, मगर फिर चुपाकर दीपा के कोंचने पर लुडो की अपनी चाल चलते हैं, लड़की से शिकायत करते हैं, ‘तू चाह बना रही थी न, रे?’

दीपा मुंह तरेरकर विजयी नज़रों से पिता को ख़बरदार करती है कि हार रहे हैं तो अभी फिर चाय याद आने लगा? बाप-बेटी दोनों को ख़बर नहीं कि उनके सर के ठीक ऊपर, छत के खंभे से धीरे-धीरे सरकता एक बगेसर सांप चला जा रहा है, दीपा जानती होती तो वहीं लुडो के गत्ते पर बेहोश हो जाती, फिलहाल ठोड़ी में उंगली लगाये अपना चाल खेलकर ठिठोली कर रही थी, ‘सूजी का हलवो बना दें, पप्‍पा? कि कचौड़ी खाइयेगा?’

‘तू हमरे हाथ का छनौटा खाओगी, पप्‍पा की बेटी?’ घुटने में साड़ी फंसाते हुए मालती फुआ दीपा को झाड़ू दीखाकर बोलीं, ‘घर में तरकारी नहीं है ऊ किसी को सूझ रहा है? छाता लेके फट से तरकारी खरीद लायें, ऊ हियां किसी को नै सूझेगा, लुड्डो और लड्डू का बेमतलब कहानी बनायेंगी! जइसन बाप वइसन बच्‍चन सब!’

पिंटू जंगले के लोहे में चेहरा धंसाये मां का सिपाही होने का ईनाम लेने की गरज में बोला, ‘हम चल जायें, मां? मगर बुलू वाला छाता जाम हो गया है?’

फूफा ने कुरते की जेब से चुनौटी बाहर करते हुए बेटे की तरफ देखा, ‘भेजें तुमको बाहर? खतम हो गया तुमरा अलजेबरा?’

दो घर दूर मंजु बड़ि‍यों को एक सूखे डिब्‍बे में खलिया रही थी. बाहरवाले कमरे में पड़ोस की ताप्ती अपने बाल काढ़ रही थी, उसने मंजु को सुनाते हुए कहा, ‘जोत्‍सना दीदी के परस से परदीप कुमार का फोटो निकला है!’

मंजु चौंककर बोली, ‘परदीप कुमार?’

‘परदीप कुमार कि परबोध कुमार.. हमको क्‍या मालूम, हम फोटो लेके थोड़ी घूमते हैं!’

बाहर बारिश होती रही. तीन दिन से हो रही थी.

3 comments:

  1. बहुत अच्छी प्रस्तुति।
    इसे 20.06.10 की चर्चा मंच (सुबह 06 बजे) में शामिल किया गया है।
    http://charchamanch.blogspot.com/

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  2. एकदम से मजा आ गया. सब कुछ आँखों के सामने घूम रहा था..एक मूवी की तरह. एकदम टू कॉपी हमारे घर की तरह. और वो पिंटू का अलजेबरा वाला बात...एकदम ऐसे लगा जैसे बचपन में हमको बोला जाता था. मम्मी मैथ पढ़ाती थी, कहीं जाना हो तो बोलती थी - "जो दिए थे मैथवा उ हो गया? की मुह उठा के चल दी हो?" हा हा ... बहुत बहुत बहुत मजेदार :D :D

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