Monday, June 21, 2010

भेड़कथा: एक सीक्‍वेंस.. दूसरे फिर बहुत सारे.. मेरे, हमारे हैं..

पहाड़ी की ढलान पर भेड़ों का झुंड अच्‍छा-खासा दौड़ रहा था, मतलब दो पेट से थीं, एक की कमर की हड्डी सरकी हुई, और चौथी एक के जाने कब का ऐब ठहरा, ज़रा लंगड़ाकर, कुछ फुदकती-सी उसका हमेशा का दौड़ना रहा, तो उसी लंगड़ाहटी लय में ही सही मगर सब दौड़ रही थीं.. मतलब दो दिन की लगातार की झड़ी के बाद आज आसमान ज़रा खुला था, एक भेड़ थी कुछ दिनों पहले एक बड़े पत्‍थर के पीछे घास का टुकड़ा देखा था, और इसके पहले कि सबकी नज़र बचाकर उसे संभालकर पेट में उतार सके, वहां तक पहुंचने का रास्‍ता भूल गई थी, इन दो दिनों की बरसात में छाती में पैर धंसाये उस रास्‍ते को खोज निकालने का सपना देखती रही थी, आज धुंधलके धूप के उजाले में कैसे भी करके अपने उस सजीले घास को खोज निकालेगी ही का प्रण करके दौड़ती बैठी थी कि.. जैसेकि एक दूसरी ममता की मारी थी जिसका दुलारा, फटेहाल बाड़े की लीद माथे पर रगड़ता ज़ि‍द ठाने बैठा था कि कैसे भी करके उसे गरदन पर चढ़ाने के लिए लाल ऊनी पट्टा चाहिए ही! मां बेचारी हारी घबराई बुदबुदाने लगती कि कैसी बात करते हो, बाबू? किसी भेड़ को देह पर ऊन चढ़ाते सुना है कभी? मां के नेह में बिगड़ा बच्‍चा भेड़ की कमर में अपना भारी सिर भिड़ाकर पिनपिनाता, नहीं सुना तो मुझसे सुन, बुढ़ि‍या! आसमान काट या पहाड़ खोद, कहीं से भी लाके दे नहीं तो ये बाड़ा फूंक डालूंगा, तेरा पेट चीर डालूंगा! भोली, बुढ़ि‍या भेड़ घबराई सोचती बैठती कि इतना प्‍यारा सा बच्‍चा था, पहाड़ी छोड़कर दो गांव दूर तक कभी गया नहीं, कहां से ऐसी घनघोर बातें सीख आया मेरा लाल? मगर ऊन की जिद करता है तो कहीं से भी लाके दूंगी, पूछूंगी मनोहर भेड़ से, वह गया है तराई के मेले, एक नदी भी देखी हुई, शायद जानता हो कि भेड़ भी लगाते हैं गले में ऊन का पट्टा, और जतन करके बच्‍चे की खुराफात से बचा लेगी बाड़ा के ख़याल सोचती दौड़ी जाती थी मनोहारी की ओर कि..

मनोहारी का मन उम्र में अपनी बेटी-सी लगनेवाली हुई एक भेड़ पर आया हुआ. धूप की दौड़ में मन में उत्‍साही कुलांचे भरते वह उसी को खोजते, भागते हुए, मन ही मन ‘तीन देवियां’ का ‘ऐसे तो न मुझे देखो’ गुनगुनाते, थोड़ा अपनी चढ़ती उम्र का लिहाज करके लजाते. जबकि उम्र में बेटी लगनेवाली जो भेड़ हुई, वह मेंहदी के तीन पौधे खोज रही थी जो उसकी एक नई-नई बनी सखी ने बताई थी. एक दूसरा भेड़ था जिसने कामू का ‘अजनबी’ पढ़ रखा था न बेकेट की ‘गोदो का इंतज़ार’ का मंचन देखा था, कुलांचे भरता अस्तित्‍ववादी चिंताओं में चिंतित हो रहा था कि ‘जाने क्‍या चिरकुटों का दल है, दौड़ा चला जाता, मगर कोई मुझे बतायेगा मैं क्‍यों दौड़ रहा हूं?' जलती झाड़ी में पूंछ झुलस गई हो की गरमी में सुलगता अस्तित्‍ववादी उबलता सोचता अगले क्षण मेरे पैर आगे नहीं बढ़ेंगे, भीड़ की भेंड़धंसान का मैं स्‍वयं हिस्‍सा नहीं होऊंगा!’ सोचता और सोच की अदबदाहट में उलझा दौड़ता चला जाता, जभी..

एक विचारवान भेड़ था, बुढ़ाता, बेचारा, सबकी थू-थू का पात्र हुआ, क्‍योंकि घास का सपना देख-देखकर ऊबे, हारे भेड़ घबराकर जब कभी किसी दूसरे विषय की चर्चा शुरु करते तो बात घूम-फिरकर विचारवान पर चली ही आती, और फिर कोई चिढ़कर थूथने उठाये धुआं निकालता कहने से बाज नहीं ही आता कि, ‘बुड्ढा सटकेला है, अपने साथ हम सभी को डुबोयेगा! अबे, भेड़ विचार से दोस्‍ती करेगा तो घास कब खायेगा, किसी के अकल में ये बात घुसती है?’ जबकि विचारवान की अकल में घास नहीं घुसती, ऐसे टेढ़े-मेढ़े विचार ही घूमते होते कि हम भेड़ कब तक सिर्फ़ अपने-अपने घासों की सोचते रहेंगे? क्‍या ऐसा कोई उपाय नहीं कि कभी हम विचार की भी सोचें? भेड़दल की बुद्धि को एक बल किसी तरह ऊपर ले जाने की सामूहिक होशियारी का जतन हमारा पिछड़ा समाज कभी नहीं करेगा? करेगा तो किस सधी भेड़बुद्धि के नेतृत्‍व में करेगा? विचारवान माथे में विचारों की ऐसी और वैसी उलझी जलेबियां छानता भाग रहा था कि..

जभी पहाड़ी में खनिज खोजने पहुंचे मानवबल की डायनामाइट का पहला धमाका हुआ!

(यह खा़स बेला.. बेला की बायें अदाओं के लिए..)

6 comments:

  1. बेहतरीन....हमेशा की तरह"

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  2. मुझे तो ये समझ में ही नहीं आया :(

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  3. अकल में विचार की आस तो घुसती है पर आहार की घास नहीं घुसती । भेड़ों को विचारग्रस्त व गेड़ों को अवसादग्रस्त देखा है और देख रहे हैं । किसी दिन योग्य भेड़िया इन सबको मोक्ष की ओर ले जायेगा ।

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  4. कोई दिन भेड़ों का भी आयेगा. कोई दिन उनको भी घास मिलेगी. हम तो भेंड हैं..सॉरी भेड़ों की तरफ हैं.

    भेंडिया-धसान पोस्ट....:-)

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