Wednesday, June 23, 2010

हम जो पागल नहीं हो रहे, क्‍यों नहीं हो रहे?..

बहन खोलेगी, विशुद्ध स्‍वार्थों का बक्‍सा होगा, चहकती पूछेगी कैसा दीखता है, बताओ, मेरी पीठ थपथपाओ ना? भाई हंसता गोड़ फैलायेगा, सुलझी समझदार सामाजिक होशियारियों की बताता, हासिल नई जीतों में मुझे लजवायेगा. भाई की छाती पर चढ़ उसे पीटने लगने की जगह मैं सोचता सन्‍न रहूंगा कि गले में क्‍या दबाकर कहूं एक ही ख़ून से बने हैं हम?

बिना सांस लिये बिना ज़रा प्‍यार दिये, पत्‍नी देर तक सुनाती रहेगी कैसी, कितनी खराबियां हैं मुझमें, फुटबाल की तरह बेचैनियों में दस कोने उछलता हारकर फिर मैं एक कोना पकड़ लूंगा, रिरियाता, अपने से मुंह चुराता अख़बार के सप्‍लीमेंट में सिर धंसाये कि उत्तर-पूर्व में भुत जलोकिया की मिर्चे की नई किस्‍म 'खुज' गईं, कि मुंह में सटाते ही दुनिया आग पर दौड़ने लगती है, कि हिंदुस्‍तान टाइम्‍स का मिंट बताता है कि कैसे तो फक़त दस वर्षों में इडिया आर एंड डी के क्षेत्र में घनघोर दौड़ने लग पड़ी, लगभग यूएस के पीछे-पीछे समूची दुनिया को पीछे छोड़ती जाने कितना तो आगे उड़ी जाती है.

शहर की बरसाती सड़कों पर गुंडई की एक और अन्‍य ख़बर होगी, हमारी बेहयायी आत्‍मा की पिटाई का एक दूसरा बजर, मैं सिर झुकाये चुपचाप रोटी कुतरता हूंगा, खिड़की पर देह भिगाये कौवा हावं-हावं चीख़ता होगा, हम कोई कुछ भी नहीं सुन पाते होंगे, ख़ामोशी का एक शोरीला मैटेलिक रॉक घन्‍न्-घन्‍न् समूचे दिन दहलता होगा.

6 comments:

  1. सिर झुकाए रोटी तो हम भी कुतरते हैं. मिंट में छपे आर एंड डी से उपजी रोटी.

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  2. " बेहद सम्वेदनशील पोस्ट...."

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  3. पगलैटी का ठेका भी एमएनसी को चला गया है, मुफ्त में तो वो भी नहीं मिलेगा ।

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  4. जून २०१०, नया ज्ञानोदय में गौरव सोलंकी की कहानी छपी है. उस में एक वाक्य यों है -

    ''वे, जो पागल नहीं हैं , वे इसलिए पागल नहीं हैं क्योंकि वे पागल हो ही नहीं सकते. ''

    आप के इस मार्मिक गद्य को पढ़ कर अचानक याद आया .

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  5. आज थोड़े सेंटियाये लगे सर जी....

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  6. हम लोगो का हर दिन यू ही गुजर जाता है न? या हम यू गुजार दे रहे है.

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