Sunday, June 27, 2010

जंगन के मोर और जीवन..


कस्‍बे के पसराव से बहुत दूर, जाने किस उजाड़ वीराने में ऊंचे तंबुओं के डेरे तने थे, ढलती सांझ के धुंधलके में नीली, पीली, लाल रौशनियों के लट्टू दिखते. देखनेवाली आंखों को भरम होता सपने में दिखी होंगी, नज़दीक जाने पर फटी दरियों और सस्‍ते कैनवास के पैबंद दीखते, मगर समय और समाज से कटे उस सजीले, उजड़े ज़हान यूं भी जाता कौन था? मोर की कर्कश कूक गूंजती और रात की ख़ामोशी में हाथी का चिंहाड़ना सुनाई पड़ता.
फिर जब सब शांत हो जाता तो अपने भारी पिंजड़े में शेरनी ऊबी बायें से दायें और दायें से बायें झल्‍लायी फुफकारती मिलती, ‘इस जीवन का मतलब क्‍या है? है कोई?’
‘वाह! कैसे नहीं है, मैं नहीं हूं? मतलब?’ कोई ख़ास वज़ह होगी कि दिन भर का भूखा जोकर हमेशा हौसले में रहता. हंसते रहने का, जीवन जिये जाने के हौसले. हवा में पैर ऊपर किये, हाथ के पंजों के बल चलता जोकर शेरनी के पिंजड़े तक आया, फिर बड़ी-बड़ी आंखें नीचे से ऊपर को उल्‍टी फाड़े शेरनी को तकता तक़लीफ़ में बोला, ‘इतना प्‍यार करता हूं तुमसे, फिर भी तुम जीवन का मतलब पूछती हो?’
इस बेमतलब सर्कस में एक जोकर ही है जिससे शेरनी मन की बात कह सकती है, बाकी तो सिर्फ़ उसका दहाड़ना समझते हैं. जोकर को इस तरह सिर के बल खड़ा खुद से मिन्‍नत करता देख शेरनी को उस पर तरस हो आया, बोली, ‘जीवन के बारे में सोचकर मन परेशान होता है, उसका क्‍या करूं, उस पर काला कपड़ा खींच लूं, बताओ?’
जोकर हवा में कलाबाजी करता सफाई से वापस अपने पैरों पर खड़ा हो गया, पिंजड़े के भारी सलाखों में चेहरा धंसाकर बोला, ‘और मेरा प्‍यार, वो कुछ भी नहीं?’
शेरनी इस दरमियान अपनी बेकली का टहलना रोककर पिंजड़े के बीचोंबीच बैठ गई थी, पंजों पर मुंह गिराये उदासी से बोली, ‘यहां किसी ने तुम्‍हें कसूरवार ठहराया? मगर जंगल और आसमान के लिए रहम करो, प्‍यार के खयाल को इतना सिर मत चढ़ाओ, यहां जितने जने हैं सबसे ज्यादा उनमें तुम जानते हो प्‍यार की हकीकत क्‍या है, सिर्फ सपना है!
कुछ दूर पर बैठा जाने मुंह में क्‍या लिए बूढ़ा ऊंट जुगाली कर रहा था, वहीं से चिंघाड़कर उसने आवाज़ लगाई, ‘प्‍यार तुम्‍हारे वक्‍तों की ईजाद होगी, या जाने किन वक्‍तों की, मैं हजारों साल से रेत पर लंबी दूरियां दौड़ता रहा हूं, कभी किसी को प्‍यार के पीछे भागते नहीं देखा, अलबत्ता पानी के लिए जाने कितना खून बहते ज़रुर देखा है! प्‍यार को बेचना बंद करो, बरखुरदार, कम से कम एक ऊंट के आगे तो ऐसी बेहयायी मत ही करो!’ फिर अपने घिसे खुर सहलाते बूढ़े ऊंट ने अपनी बात पूरी की, ‘जहां तक शेरनी देवी के सवाल की बात है तो मैं तो कहूंगा मोहतरमा के सवाल में दम है. अब जैसे आप हमीं से पूछ लें क्‍या मतलब है जीवन का, तो जनाब, हम यही दोहरायेंगे रेगिस्‍तानी दुनिया के किसी सरायखाने में इसका जवाब नहीं.’
जोकर इस बेदिली की पेशी से कुछ बेरौनक सा हो गया. शेरनी आह भरकर बोली, ‘अब इस तरह मन छोटा मत करो, जीवन के मतलब में किसी ने तुम्‍हारा हाथ होने की बात नहीं कही, भला कही?’
जगह की तंगी में अपनी जगह अस्थिर होता हाथी ने गुस्‍से में मुंह उठाकर तब शिकायत की, ‘मैं अपनी सुनाऊं, सुनोगे? जीवन नाम की जो चीज है, बड़ी बेहूदा चीज है, मैं अपने हाथ से अपने कान तक नहीं खुजा सकता, फिर इस बड़े जीवन का क्‍या खाकर माला जपूं, बताओ, किसी कीच, गड़ही में जाके बूड़ क्‍यों न जाऊं, बोलो?’
चेहरे पर जबरन हंसी पोतकर जोकर ने कहा, ‘मेरे समझदार दोस्‍तो, आपकी समझदार समझ ने मेरा मन भारी कर दिया है!’
इस सभ्‍य समाज से तभी कहीं बाहर की एक चिड़ि‍या चहचहाती इनके बीच उड़ी आई, और हाथी के चिंघाड़ने, शेरनी के दहाड़ने तक का उस पर असर नहीं पड़ा कि वह गंभीर जिरह कर रहे हैं, अपनी चहचहाटों से जिसे वह हल्‍का किये जा रही है, अपनी में खोयी बेशरम चहचहाती रही.
इससे पहले कि फटी आंखों चिड़ि‍या को तकता जोकर कुछ कहता, कह पाता, ऊंट ने अपनी जुगाली रोककर चिड़ि‍या का परिचय दिया, ‘मैं जानता हूं इसे, जाने क्‍या तो नाम है नाचीज़ का, बीस वर्षों तक नींद में डूबी रहने के बाद आंखें खोलती है तो सिर्फ एक गाना गाने के लिए, और उस गाने के खत्‍म होते ही दम तोड़ देती है, बस इतनी भर कहानी है इसकी जिन्‍दगानी की!
जोकर ने ऊंट की बात सुनी तो उसके दिल कट गया. हवा में हाथ फैलाये वह चिड़ि‍या के नज़दीक भागा-भागा पहुंचा, बोला, ‘चिड़ि‍या रानी, मैं नहीं जानता तुम्‍हारा नाम, मगर तुम भी कहां जानती हो मेरा, वैसे भी एक नाम में क्‍या रखा है. मैं तो सिर्फ यह कहने आया हूं कि बहुत प्‍यार करता हूं तुमसे, समझती हो, चिड़ि‍या रानी!’
चिड़ि‍या की आंखें एकदम से भर आईं, चहचहाती हुई उसने कहा, ‘जानती हूं, जभी तो अपने गाने से यहां तक खोजती चली आई!’
जोकर के दिल के और टुकड़े हुए, ‘फिर तुम्‍हारी आंख में ये आंसू कैसे हैं, चिड़ि‍या रानी?
‘खुशी के हैं, क्‍योंकि जीवन इतना लंबा होता है लेकिन नींद का होता है, जगे में प्‍यार की बातों की उम्र तो बड़ी छोटी होती है, नहीं?’
चिड़ि‍या की प्‍यारी बातों से जोकर का चेहरा खिल गया, लेकिन हक़ीक़त दरअसल यह थी कि उसकी आंखों से आंसू टपका आना चाहते थे. शायद जीवन का मतलब ऐसा ही कुछ होता हो..

7 comments:

  1. "बेहद मार्मिक-सम्वेदनशील लोक कथा एक छोटी-सी चिड़िया जीवन -दर्शन सिखा गई..."

    ReplyDelete
  2. अरे आपने तो चिड़िया के बहाने मन को ही छू लिया ..छोटी सी चिड़िया की बड़ी बड़ी बात .

    ReplyDelete
  3. अत्यधिक ज्ञानवर्धक संवाद ।

    ReplyDelete