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बाबा कुछ देर तत्सम में विचार-तीर बांधने की कोशिश करते रहे, और बेचारे बार-बार हारकर हाथ हवा में लहकाने लग रहे थे; वैसे ही जैसे पुराने पतलूनों को पेट पर बटनबंद करने की मासूम हसरतों में बह निकलते ही मैं एकबारगी हिलने लगता हूं.. फिर जल्दी लजाने, अपने होने में घबराने लगता हूं. ज़ाहिर है बाबा की व्यथा समझ रहा होऊंगा, जभी होंठों पर लरपट मुस्की दौड़ने लगी होगी.
मुस्की को मलिनयाते बाबा से अभ्यर्थना की, ‘बाबा, तत्सम में नहीं सपर रहा तो अवधी में ही निकाल दीजिए, हम भोजपुरी में तर्जुमिया लेंगे, सीधे नहीं होगा तो शीर्षासन के अंतर-पाठीय पाठे से अर्थ सुलझा लेंगे. आप एक छोर से दुसरका छोर तक पहिले पहिलका वाक्य तो बोलिए!’
हम आश्वस्त हुए कि बाबा अब सीधे साहित्य की सींग पर आयेंगे, आस्तीन ऊपर चढ़ाकर हमें हमारे अंधारे से पारायेंगे, मगर कहां. बाबा ने हाथ ऊपर लहराकर आस्तीन नीचे गिराने की जगह, नीचे ही नीचे एक लघु विस्फोटकारी वायुचार किया.. तत्सम को इस तरह अपने भारी नितम्बों से बगलियाते, फरियाते हुए अपनी अवधी में महकने लगे. विलास-वन में बाबा के उड़ने से अलग काम की जो साहित्य-संघाती बात बबवा ने कही, उसका मंतव्य इन छंटाक भर पंक्तियों में बंद है. मन की भोजपुरी से बेमन की हिंदी में उसे उल्था कर दे रहा हूं:
“चिरई के बिष्ठान हथिये के हगान का हम का करें, बाबू? करेजवा फार दे मन तार दे, अंगुरी के पोर लाले लाल कै दे, अइसन ऊ कहनिया कबहूं नजर सजाती है, कहां भेंटाती है?.. गोड़ में नवका जूता के सजाई, गरदन में टाई लिये दवाई के सेल्समैनी माफिक धंधा और डेढ़ फंदा बेचते लौंडे भेंटाते हैं, इस सबकन बीच, गदहन के फोद, साहित्त कहां ले आता है?”
बाबा-कथन पर आमतौर से हम हाथ फेंक-फेंककर हंसने लगते हैं, आज नहीं छूटी. लजाहट में चुपाय हम सिर नवाये लिये.