Wednesday, June 30, 2010

नींद के फेंस के इधर और उधर..

एक्‍चुअली किस बात से इस पूरे झमेले की शुरुआत हुई कहना मुश्किल है. पत्‍नी के बगल सोता न होता तो शायद यह दुर्दिन सामने न खुलते. लेकिन पत्‍नी को छोड़कर कहीं और सोने जाता तो फिर मेरी आदतों के बदलने का ख़तरा सिर मंड़राता. पीठ पीछे पत्‍नी शिकायत करती कि कहीं और जाकर सो रहे हैं. शायद इसीलिए कहते भी हैं आदतों से बंधा व्‍यक्ति चैन की नींद सोता है. जबकि सच्‍चाई है मैं तो सो भी नहीं रहा था. वह तो पत्‍नी करती थी, मैं छाती पर हाथ बांधे उसकी भारी सांसों का ऊपर-नीचे होना सुनता रहता. सुनते-सुनते उकताहट होने लगती तो गरदन मोड़कर चुपचाप सोती पत्‍नी को गौर से देखता रहता. कितनी रातें मैंने इस तरह सोई पत्‍नी को चुपचाप ताकते हुए गुजारी है. ऐसे मौकों पर बहुत बार कुछ वैसा दीख गया है जिसकी ओर पहले कभी ध्‍यान न गया होता. जैसे दायीं कान और गरदन के बीच पत्‍नी के एक मस्‍सा था मैं जानता नहीं था. या उसकी पसलियों के नीचे माचिस की तीली के आकार का एक कटे का निशान जिसे वह अब तक मुझसे छुपाये हुए थी. एकाएक मुझे विश्‍वास नहीं हुआ था कि माचिस की तीली के आकार के उस कटे के निशान को कमर पर सजाई हुई औरत मेरी पत्‍नी ही है. गहरे जुगुप्‍सा में मैं देर तक उस माचिस की तीली के आकार के कटे के निशान को पढ़ता रहा. पत्‍नी के चेहरे पर झुककर इसकी ताकीद की कि माचिस की तीली के आकार के कटे के निशान वाली वह स्‍त्री मेरी पत्‍नी है.

मुंह पर हाथ धरे मैं भले मुस्‍कराता रहा होऊं मगर बात सचमुच सोचनेवाली थी. सोलह वर्षों से मैं अपनी पत्‍नी के साथ रह रहा था लेकिन अभी तक उसकी प‍सलियों के नीचे माचिस की तीली के आकार का कटे का निशान है से अनजान बना हुआ था. घबराहट भरे ऐसे क्षणों मैं पत्‍नी को नींद से झिंझोड़कर उठा देता कि यह क्‍या तमाशा है. भगवान के लिए तुम अपने कपड़े उतारो, आज मैं तुम्‍हें पहचान लेना चाहता हूं. मैं नहीं चाहता कि किसी दूसरी औरत से तुम्‍हारे घालमेल होने का खतरा बना रहे.

मेरा प्रस्‍ताव सुनकर पत्‍नी हमेशा डर जाती, डरकर तीन कदम मुझसे दूर खड़ी हो जाती. या दूसरे कमरे में भागकर भीतर से सिटकनी चढ़ा लेती. मैं दरवाज़े के बाहर मिन्‍नत करता तुम समझती क्‍यों नहीं इस तरह हमारा एक-दूसरे के साथ अजाने बने रहना खतरे से खाली नहीं! पति-पत्‍नी के बीच कितनी सारी चीज़ें बेपहचानी बनी रहती हैं उसे हम नहीं ठीक करेंगे तो कोई बाहर से आकर नहीं ठीक करेगा. तुम्‍हें डर नहीं लगता कि इतने वर्षों से साथ रहने के बावजूद हम अभी भी एक-दूसरे को पहचानते नहीं? तुम्‍हारा कसूर ही नहीं, खुद मैं अपनी पीठ को कहां पहचानता हूं? मगर तुमने भी कभी इस ओर मेरा ध्‍यान कहां दिलाया? तुम समझ रही हो मैं क्‍या कह रहा हूं? बाहर आओ, प्रिये.

पत्‍नी अंदर से चिल्‍लाकर कहती मेरा दिमाग चल गया है फिर जोर-जोर से रोने लगती जिससे मुझे लगता कि कैसी औरत है सीधी बात इसके दिमाग नहीं घुसती, सचमुच किस पागल औरत के झमेले फंस गया मैं.

काफी देर बाद पत्‍नी धीमे से दरवाज़ा खोलकर बाहर आती तो उसके बाहर आने का इंतज़ार करता-करता मैं कुर्सी पर सोया मिलता. और चूंकि मेरी देह पर कोई कपड़ा न होता पत्‍नी मेरी हालत देखकर फिर एकदम बौखलाने लगती, और उसके बेमतलब के शोर से मेरी आंखें खुल जाती और फिर हम देर तक एक-दूसरे को कोसते रहते और उससे थक चुकने के बाद बेमतलब झगड़ने लगते. पत्‍नी भागकर रसोई में जा छुपती और वहां से हल्‍ला करती मेरे कपड़ों के नजदीक मत आना वर्ना मैं तेल पीकर खुद को खत्‍म कर लूंगी. मैं चीख़कर कहता तेरा दिमाग चल गया है औरत, तेल पीने की बात करती है?

उसके बाद थककर मैं रसोई की दीवार से लगकर जा बैठता और वहीं बैठे-बैठे आंख लग जाती.

रात को बिछौने पर आंख खुलती तो मुझे ध्‍यान आता बगल में पत्‍नी सांसें बजाती सो रही है और मेरी देह पर जब मैं जगा था नहीं थे लेकिन इस वक़्त कपड़े हैं. और तनाव में मेरी आंखों की नींद उड़ी हुई है, छाती पर हाथ बांधे मैं सो नहीं पा रहा, और कुछ देर बाद गरदन मोड़कर पत्‍नी को देखता हूं तो पहले का कुछ अनदीखा फिर एक बार नज़रों में कहीं गड़ जाता और मेरी बेचैनी एकदम से बढ़ने लगती..

8 comments:

  1. यह सिर्फ आप लिख सकते थे ...

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  2. कुछ दिन पहले कमलेश्वर की ’खोयी हुयी दिशाये’ पढी थी... एक अकेली, बेचैन सी, दिशाओ को ढूढती हुयी कहानी थी वो..

    इस कहानी को पढकर वैसी ही एक बेचैनी रही... साथ साथ रहते हुये भी वही अकेलापन... किसी गज़ल की एक लाईन भी है न कि इतनी कुरबत है तो फ़िर फ़ासला इतना क्यू है... एक कटे के निशान से भी दूरी का अन्दाज़ा होता है.. उसे करीब से सोते देखते हुये भी तो दूरी का अन्दाजा होता है... खासकर तब जब वो करवट बदलकर पीठ आपकी ओर कर दे..

    बस ऎ वे ही कुछ मेरी नींद के फेंस के इधर उधर से...

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  3. कमाल है ... स्तब्ध हूँ ... ऐसा लेखन ? अद्वितीय ... गोस्वामी जी ने उचित ही कहा "यह सिर्फ आप लिख सकते थे"

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  4. "बेहतरीन....जब हम खुद को ही सही नहीं जानते तब दूसरों को क्या जानेगें....वैसे उसकी साँसों की अपेक्षा खुद की गिरती-उठती साँसों को देखता तो मुमकिन् था कि ध्यान घट जाता....

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  5. @पद्मकमल सिंघ,
    मैं भी स्‍तब्‍ध हूं.. ऐसा कमेंट-लेखन?
    ओह, क्‍या करुं सुबह-सुबह तीन रुपये की दही खरीदकर उसे चाह में डाल पी लूं, या गोस्‍वामी से फोन करके पूछूं ये सिर्फ़ ऐसा कैसा मैं ही क्‍यों लिख सकता था?

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  6. आपका लिखा पढ़ लेने के बाद अक्सर मैं सोच में पड़ जाता हूँ कि टिपण्णी करूँ या यूँ ही निकल जाऊँ ....और अगर करूँ तो क्या करूँ ?

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  7. एक ऐसा विचार हिलाया है मन का जिस पर कभी ध्यान नहीं जाता है, यदि जाता है तो अविचारणीय मानकर छोड़ दिया जाता है । स्तब्धता में आपने लिखा । लिखकर आप भी स्तब्ध रह गये होंगे और पढ़कर हम भी । प्रणाम ।

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  8. @प्रवीण,
    लिखने से पहले स्‍तब्‍ध रहा, अब तसल्‍ली से हो गया हूं. इधर-उधर कहीं ताकझांक भी नहीं कर रहा, खड़े-खड़े सो रहा हूं.

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