Thursday, July 1, 2010

गाल के काटे..

दलिद्दर के सौ तीखे तीर गड़ते रहते हैं फिर क्‍या बात होती है आवाज़ में चमक आ जाती है, अपनी हंसी में चमकने लगता हूं? अचानक जुसेप्‍पे पकड़ में आया तो मैं कुछ ऐसा ही चमकता खुद को दीखा होऊंगा, उसी खुशी में लरजता जुसेप्पे की कुहनी थामे अभी बेचारा कुर्सी पर ढंग से बैठा तक नहीं था, उसका चैन हराम करते मैंने सवाल किया, ‘‍कैसा पागलपन है जुसे, क्‍यों इस तरह मन में बरखा-बहार बरसने, आत्‍मा मह्-मह् महकने लगती है?’

’मालूम नहीं कैसा है, मगर है पागलपन ही,’ सस्‍ती कुर्सी खींचकर जुसेप्‍पे ने उस पर अपनी थकी देह गिराई, बोतल की ठेपी खोलकर गटगट पानी पीने लगा, ‘बच्‍चों सी खुशी का ऐसा बुखार तुम्‍हीं पर चढ़ता देखता हूं, मेरे मन में तो समूचा सूनसान है. उन व्‍योतो कांप्‍लेतो![1]

मुंह बनाकर मेरे बुरा मानने की एक्टिंग पर जुसेप्‍पे ने हंसते हुए मेरे लिए लाया किताबों का पैकेट बाहर किया. हमेशा की तरह शातिर जुसे, कि बच्‍चे की तरह भागा-भागा मैं पैकेट खोल किताबें देखने लगूं, उसके कहे की कड़वाहट भूल जाऊं..

सेई उना इदियोता त्रेमेंदो, लो साई?[2]’ चिल्‍लाकर मैंने अपना फ़ैसला सुनाया और जल्‍दी-जल्‍दी पैकेट की कलाई फाड़कर भीतर के तोहफ़े की जांच में जुट गया. ओहोहो, एक उन्‍नीसवीं सदी के आखिर में ब्‍युनेस आयरस में छपी मोटे जिल्‍द की बच्‍चों की तस्‍वीरों वाली किताब है, एक दूसरी अफ्रीका का सांस्‍कृतिक इतिहास है, तीसरी.. एक ग्राफिक कथा जो मैंने जाने कितने वर्ष पहले सिर्फ सपने में देखी थी और जिसकी बाबत जुसेप्‍पे को कभी कहा भी नहीं था, बदमाश उसे लिये आया है, कहां से खोजकर लाया है? और ऐसे में फिर मेरी हंसी करता है कि मैं बच्‍चे की तरह खुश होता हूं, क्‍यों होता हूं?

जुसेप्‍पे ने मेरे हाथ से किताब अलग करते हुए कहा इस पागलपने में बाद में लौटना. चलो, पहले बाहर की कुछ हवा खाकर लौटते हैं.

नुक्‍कड़ पर कबाब की एक गुमटी है, वहां चुपचाप शरीफ़ बच्‍चे की तरह पीठ पर हाथ बांधे मैं जुसेप्‍पे का तश्‍तरी में कबाब लिये खाना देखता रहा. जुसेप्‍पे के हाथ-मुंह धो चुकने पर सवाल किया, ‘तुम्‍हारा मन क्‍यों बुझा हुआ है?’

दो सौ कदम आगे एक ज़रा खुला मैदान है, हम टहलते वहां पहुंचे तब जुसेप्‍पे से खबर हुई कि गांव में उसकी बुआ के नाम कुछ ज़मीन है जहां बचपन में कभी-कभी वह छुट्टि‍यां मनाने जाया करता था, बीसेक सालों से उस दुनिया से संबंध टूटा हुआ था. अभी दो महीने पहले किसी अदालती कागज़ की ज़रुरत पड़ी तो बूढ़ी फुआ की गुजारिश से गांव जाना हुआ था, मन पर उसी सफ़र की चोटे हैं.

मैंने पूछा, ‘ऐसा क्‍या हो गया गांव में?’

‘कुछ नहीं हुआ,’ जुसेप्‍पे ने धीमे से कहा, ‘पहले जो किसानी करनेवाले बीस घर थे, पहचानी दुनिया में होने का अहसास था वो पूरी दुनिया बदल गई है. सांझ के धुंधलके दो घरों में बत्तियां जल रही थी, बाकी पूरे गांव में अंधेरा. सूनसान. बाकी के घर बिके हुए हैं. मिलान के पैसेवालों के हाथों, कुछ विदेशियों ने खरीदा है, कि साल के हफ्ते-दस दिन कभी गांव की खुली हवा में आकर समय गुजार जायेंगे के ख़याल से. किसानी गांव में अब सिर्फ़ एक परिवार करता है, फन्‍नीमारा का पोता. बचपन में उसके साथ खेला करता था मैं. अबकी अपनी खेत की पगडंडी पर आठ-दस गायों को हांककर घर लौटता मिला तो उसके चेहरे की झुर्रियां देखकर मुझे परेशानी हो रही थी. इसी उम्र में वह बूढ़ा हुआ जा रहा है..’

उस पार्कनुमा मैदान में तीन-चार लड़कियों का समूह कहीं से खी-खी करता हमारे पास चला आया था. लड़कियां गुजर गईं तो फिर जुसेप्‍पे ने अपनी बात बढ़ाई, ‘सोचो चालीस हेक्‍टेयर की ज़मीन है लेकिन शाम को फन्‍नीमारा की बैठक में घर की बनी वाईन पी रहा था तो विन्‍से मेरे सामने हाथों में सिर लिये बैठा वही गाना गा रहा था जिसे योरोप के किसी देहात में चले जाओ तुम्‍हें हर जगह सुनने को मिलता रहेगा.’

‘मतलब?’

‘यही कि घर में दो सौ गायें हैं, पहले जब सिर्फ तीन और चार हुआ करती थी तब जीवन में ज्‍यादा चैन था. अब इतने खरचे बढ़ गए हैं कि कभी खतम ही नहीं होते. विन्‍से बता रहा था उसकी घरवाली गांव की कौंसिल की नौकरी में न होती तो उनके घर का खर्चा चलाना मुश्किल हो जाता..’

‘मगर मेरी समझ नहीं आता कि चालीस हेक्‍टेयर की ज़मीन के बावजूद किसान के जीवन में खाने के लाले हों?’ मैंने बेचैनी से सवाल किया और जुसेप्‍पे का मुंह देखने लगा.

‘बड़ा महीन दुश्‍चक्र है तुम तथाकथित डेवलपिंग देशों में अंतर्राष्‍ट्रीय मदद के खेल के चश्‍मे से उस फांस को समझने की कोशिश करो. अमीर मुल्‍क डेवलपिंग देशों से कहते हैं आपकी हम मदद करेंगे मगर आपको अपने यहां पहले ये-ये स्‍ट्रक्‍चरल एडजसमेंट करना होगा. मतलब आर्थिक संस्‍थाओं व नीतियों में खास-खास बदलाव लाने होंगे कि आपके यहां एफ्फि‍सियेंसी बढ़ाने के सीधे बहाने के पीछे दरअसल बाहरी पूंजी को आपकी अर्थव्‍यवस्‍था में सपरकर फैल सकने और अपनी जड़ मजबूत करने का सुभीता बने. विकास के लिए ज़रूरी है कहकर डेवलपिंग देश की सरकारें यह सब बदलाव हंसते-हंसते करती ही हैं. अब ऐसी अंतर्राष्‍ट्रीय मदद जो विदेशी, बाहरी पूंजी की मुश्किलों को आसान करने की पीठ पर बैठ कर आपके मुल्‍क में घुसी है, वो लॉंग रन में फिर आपके देश की अर्थव्‍यवस्‍था का भला करनेवाली है या विदेशी, बाहरी पूंजी की, ए क्‍वेस्‍तो ऐ कैच-22 देल्‍लो स्‍वि‍लुप्‍पो मिस्तेरियोज़ो![3]

बात कुछ मेरे समझ आई कुछ नहीं आई. जुसेप्‍पे को सामने पाकर ऐसा चहका-चहका सा मन था अब कैसा मलिन, मुरझा-सा गया. गनीमत है एक जवान मां गोद में एक डेढ़ साल की प्‍यारी बच्‍ची लिए हमारे नज़दीक से गुजर रही थी, मन की चोट भूलने के लिए मैंने चिल्‍लाकर बच्‍ची से कहा, ‘अभी तुम्‍हारा गाल काट लूंगा फिर समझोगी, हां!’

बच्‍ची की जवान मां के जाने किस बात का गुस्‍सा था, मुझ पर गरजती बोली, ‘काटकर दिखाओ अभी तुम्‍हारे खिलाफ़ सैक्‍सुअल हैरेसमेंट का केस ठोंकती हूं!’

जवान औरत की बात सुनकर जुसेप्‍पे हंसने लगा, औरत को सुनाते हुए जोर से बोला, ‘बच्‍ची की बजाय इनके गाल काटो तो शायद तब केस न ठोंकें!’

औरत का चेहरा एकदम शर्म से लाल हो गया. लगा जैसे उस लाल में जुसेप्‍पे को सिर से पैर तक अभी इसी वक़्त हजम कर जायेगी. अच्‍छा हुआ मां की मुसीबत में जाने कब बच्‍ची मौका पाकर गोद में उछली और लपककर वही मेरा गाल काट गई. जुसेप्‍पे अब और जोर-जोर से हंसने लगा था. औरत ने बच्‍ची को पीछे खींचकर खिसियानी आवाज़ में दांत दिखाते हुए मुझे इत्ति‍ला दी, ‘बच्‍ची ने सच्‍ची का नहीं काटा है, एंड एनीवे, बच्‍ची इज़ अबव लॉ!’


[1] . a complete void.

[2] . you’re a big idiot, you know that?

[3] . and this is the catch 22 of the mysterious development.

1 comment:

  1. अरे वाह! क्या शानदार पोस्ट लिखी ...अब समझ में आया कि इतनी सारी ज़मीन होने के बाद भी किसान गरीब क्यों होते हैं ...वैसे आदमी किसी भी हाल में खुश नहीं हो सकता....जुसेप्पे की हाज़िरजबाबी से बरबस मुस्कुराहट आ गई....बढ़िया"

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