Thursday, July 1, 2010

जिस जगह रहता हूं..

किताबों से निकलकर फिर किताबों में लौट आऊंगा
पहाड़ी चढ़ान पर भहरायी दौड़ती भेड़ें लौटती हैं जैसे
गड़रिये की बंसी औ’ अपनी गले की घंटी सुनती
खोजती चली आतीं बेरूप, लंगड़ सौदागर के ठीये

कभी अचक्‍के अंधेरे आंखें खोले घबराया
ज़ोर-ज़ोर से बुलाता दीखूंगा तुम्‍हारा नाम
या फिर उतनी ही फुर्ती से संभलकर
फुसफुसाकर माफ़ी मांगता, कि ग़लती हुई

कभी देर रात अचानक निकल जाऊंगा बाहर
जैसे एकदम सूरज निकलने से पहले की सुबह हो
कि दुनिया में और दृश्‍य होंगे, खाना रांधती
औरत औ’ रोते बच्‍चों के बीच खड़ा कैसा चिंतित दीखूंगा
मतलब कहीं से कहीं घूमता, कुछ गहरे पहचानने की
कोशिश करता जैसा कुछ, मगर बाहर फिर वही
उलझे हरफ दीखेंगे, उनको सुलझाने की जहमत में उलझा मैं

खोज लोगे मुझे की गफलत में खोजते
मिलने कभी आना मत, क्‍योंकि मिलूंगा
कहीं कोई जगह तो ज़रूर होगी घर नहीं होगी
वहां सांसों का बजता सुनो तो वह मेरी
नहीं अदद उन कुछ किताबों की ही होंगी.

3 comments:

  1. किताबों में बार बार डुबकी लगाता हूँ,
    कुछ तो लाता, अधिक छोड़ आता हूँ

    ReplyDelete
  2. गड़रिये अब भी बंसी बजाते होंगे!

    खाना रांधती औरत औ’ रोते बच्चों के बीच खड़े व्यक्ति की कल्पना कर रहा हूं। :)

    ReplyDelete
  3. "पूरा दृश्य खिंच गया..अंत प्रभावशाली...लगता है कि अच्चका आपका पसन्दीदा शब्द है..."

    ReplyDelete