Friday, July 2, 2010

आता कहां से है, या जाता?

वो आएगा तुम देखना उससे आगे उसकी पीठ का दर्द होगा. कमर, कंधे, पसलियों के दर्द अलग से आएंगे.

तुम पूछना मत कुछ करते नहीं फिर कहां से दर्द की ऐसी संगत-सवारी लिए चलते हो. वो खुद ही चौंककर जाने किसको बताता दीखेगा यह पैर वाला नया है, जबकि ऐसी लम्बी तो मैं कहीं गया भी नहीं.

तुम पूछना, फिर?

वो घबराया ख़यालों के पैर पटकता झींकेगा, क्या मालूम कैसे बताऊं. कहीं गया जैसा अपनी आंख तो देखा नहीं, शायद सपने में गया होऊं. हरे पानी में लहरीले सांप के तैरते देखे का असर हो. धीरे-धीरे पकड़ता पुराना कोई ज़हर हो? खड़खड़गाड़ी पे बोराबंद जिबह जानवरों का कच्ची पगडंडी टप्-टप् रिसता ख़ून, या गुफा गुज़रती रात की रेल मां की गोद से भागे बच्चों का सोये सपनों में बिसुरना हो, शायद? सब होगा, मेरे सच के देखे का कुछ न होगा, ऐसा?

ऑलिवर सैक्स की किताब होगी ‘एन एंथ्रोपोलॉजिस्ट ऑन मार्स’, फुसफुसाकर कहेगी मैं बताऊं कहां से आता है दर्द? मारिया कोर्ती की ‘ओतरांतो’ बीचकटी फड़फड़ायी बतायेगी मैं बताती हूं, मुझसे सुनो. दामोदर दास हाथ की घड़ी हवा में भरते दु:खी होंगे ये माजरा क्या है, हजारी के हज़ार क़ि‍स्से सरियायेंगे, फरियायेंगे कभी? मुंह में दशहरी दाबे चैन से गांव मैं लौटूंगा या नहीं?

कोने कहीं गिलहरी चुपके भारी माथा अपना बाहर ठेले बुदबुदायेगी, दर्द-दर्द के इतने दीवाने बनते हो, कभी मेरा गाना सुनने की फ़ुरसत बनती है? मैं जो सगरे दिन भागी भागी फिरती हूं, ऊपर से नीचे और नीचे से ऊपर अपनी बेहया जिजीविषा में इतना भारी यह माथा पटकती हूं.

गिलहरी की अनसुना किये वो सिर थामे ढहा दीखेगा, कि इस वक़्त तुम जाओ यहां से दामोदर दास, मैं वो नहीं हूं तुम जिस किताब की खोज में आये हो. तुम पूछना फिर तुम सपनों की कह रहे थे?

हां, वो फिर संभलकर बैठेगा. आजू-बाजू सब दर्द, बैठेंगे. पीली दीवारों का घिसा पुराना कोई आहाता दिखता है. ईंट-गिट्टी लिए बच्चे कुछ अपना खेल सजाते. मुंह उठाये गाय कोई अपने बछड़े को आवाज़ देकर बुलाती. गली में दरवाज़े के बाहर धरा कोई कोयले का चूल्हा , सांझ की छत पर बेल की तरह चढ़ता धुआं दीखता. पीली साड़ी में एक औरत झरोखा झांककर पूछे, को हैं? केकरा खोजे आए हैं? हारे मन उतरती रात छाती धंसी मुंह का आंचल दांत दबाये बिना बोले बिना सुने कहे देखो, यही अरमान साजकर आये थे, और हाय, दरवाजा के बाहिर ठाड़ा रुके हैं अभी तलक!

फिर वो हारकर कहेगा पता नहीं यह कहां कहां क्यूं जाना होता है. जैसे चाय की दूकान की मेज़ पर वह जाने कैसी किसकी फोटो देखी, किसी गरीब डकैतों के गिरोह की बेसबब गिरफ़्तारी की हिंसक तस्वीर सा वह समूह चित्र जैसे लगे मेरी अपनी भूली खुद की हो. सफ़ेद एम्बेंसैडर के पीछे दौड़ते बच्चे दीखें, जैसे पहली बार जहाज दिखा हो के पीछे दौड़ते हों, फिर अचानक ग़ायब हों स्कूल के अंधेरे में छुप जायें. एक औरत चीख़कर कहती मैं तेल गिराकर जान दे दूंगी और उस परिवार का तबादला हो जाता और वर्षों सपने में भी न दिखती और एक दिन सचमुच के आग में घिरी जलती कोई और ही औरत की शक्ल में सामने आती, हदसकर चीख़ती मुझे बचा लो भइय्या और मैं सलीके से सवाल करता तुम्हें पहचानता हूं?

तुम कहना कि ये कहानियां कभी पीछा नहीं छोड़ेंगी, वो सिर गिराये कहेगा मगर दर्द जाता कहां है.

(यह ख़ास प्रियंकर और मनीष के लिए)

3 comments:

  1. दुख-दरद का कारण-निवारण औ ओहके आने और जाने का दिशा-मारग ढूंढने एक ठो बुद्ध निकले रहे सो बाद में बुत के रूप में एक बड़े संघाराम के खंडहरों में उदास बैठे दिखे.

    एक ठो कबीर रहे . आज होते तो बहुतै मार खाते.भावना-संवेदना जी के साथ छेड़खानी का मामला में बन्द कर दिये जाते.अदालत के चक्कर काटते और दुखी अन्दर-बाहर होते रहते.

    हमको तो एक नुस्खा दलिद्दर भाखा हिंदी के एक कोबी दिए रहे. जखुन दर्द आता है तखुन हम ओही मंत्र बुदबुदाता है :

    "दर्द जब घिरे बहाना करो
    ना ना ना ना ना ना करो ..."

    ऊ जब आता है हम ससुरे को पहचनबे नहीं करते हैं . ना ना ना ना कर देते हैं.ऊ हमको गरियाता चला जाता है. हम अपने रास्ते चल देते हैं.

    एतना सब तो जुज्झ है जीवन में जी. क्या कौरेगा. दर्द को हम पत्ता ही नहीं देता है जी.

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  2. "सही बात लिखी दर्द जाता कहाँ है..लौट-लौट के वापस आ जाता है..."

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  3. एक जाएगा दूसरा आ जाएगा कब तीसरे चौथे का ठिकाना सातवें तक पहुंचेगा कि नहीं अटकल है, काले हंस काले मोर बड़े आते हैं कहते हैं, कहानियां पढ़ते पढ़ते तुर्की ब तुर्की पता लगेगा कि नहीं कहानियाँ बन गए दिनों में इंटरवल की घंटी बजेगी मूंगफलियां चटखाने की,फिर शुरू - कुछ जल्दी होगा कुछ देर में - होगा ज़रूर - पेड़ भी यहीं गिरेंगे दूब भी यहीं जमेगी जैसा कुछ. सँभलने सँभालने का सुख उन्हें ही मिलेगा जो बहकने बहकाने में संग पैर थे
    बहरहाल भितरजाल आजकल फ़िलहाल
    "किस दिन उठेंगे ये नहीं मालूम आज दिन
    इस रात कुछ सपनों के हवाले लगा लिए"
    आज के दिन की सौगात यादगार - :-)

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