Tuesday, July 6, 2010

रात की लोरी

रोज़ इस वक़्त तक नंदन नीलमणि झा रात का खाना निपटा चुकते. घनश्‍याम होटल का सस्‍ता खाना. उसके बाद धीमे-धीमे पौन किलोमीटर की टहल करके खाना पचाते हुए डेरा लौटते. कभी मन में आलस जोर मारता तो टहलना टाल जाते. दोनों हाथों में सर टिकाये, तकिये के सहारे खटिये पर चित लेटे, ट्रांजिस्‍टर से विविध भारती का आनंद लेते. कभी मूड बनता तो गवैये का बोल दोहराते हुए मिलान करते रहते कि सुर में चल रहे हैं या यहां-वहां गड़बड़ हो रही है. इसी दरमियान स्‍टोव जलाकर दूध गरमा लेते, साइकिल को बाहर से लाकर भीतर आंगन में रखते. और फिर आंगन में कटहल और अमरुद के धीमे-धीमे कभी डोल जाते पत्‍तों को निहारते गिलास का दूध खतम करते.

कमोबेश रोज़ का यही नियम था और नंदन को शिकायत नहीं थी. मगर आज मन चिनक गया. काम से लौटकर घनश्‍याम होटल खाने नहीं गए. रास्‍ते में पान की गुमटी पर खड़े दिवाकर चौबे ने पीछे से आवाज़ किया तो अनसुना किये साइकिल आगे बढ़ा लिये थे.

नंदन का मन खराब है. मन खराब है से ज्‍यादा पत्‍नी पर गुस्‍सा आ रहा है. घर का जनाना सम्‍भलते नहीं संभल रहा है तो बाहर का अपराध-जगत क्‍या संभलाएगा. जो देखता है सुनता है नंदन नीलमणि झा की हंसी करता है. या नंदन नीलमणि कमसे कम ऐसा ही समझते हैं. सब उस औरत की लीला है!

गलती किये जो शादी किये. ढाई साल की शादी में ढाई महीनो साथ नहीं रही, क्‍या फायदा ऐसी शादी का? कहती है यहां का पानी नहीं पोसाता. साग-तरकारी का स्‍वाद कैसा तो लगता है! दिन-रात पुलिस का कपड़ावालों के बीच मन डेराता रहता है! अरे? फेरा लेते समय तब अकिल चलाते नहीं बना कि पुलिस की वर्दी वाले के घर में जाके रहना होगा? वही मिले थे उल्‍लू बनाये बास्‍ते?

संग नहीं रहने का सब एक से एक बहाना. असल बात है नंदन सीधे आदमी हैं उसी का औरत फायदा उठा रही है. थाना में थाना के लोग उठाते हैं और घर में..

जरा मोह-माया नहीं, ममता नहीं. पता नहीं कैसी औरत है व्‍याह करके नैहर में बसी हुई है. नंदन जब बूढ़े हो जायेंगे तब उनके साथ रहने आएगी? ऐसा कहीं कोई करता है? कभी-कभी तो नंदन कोशिश करते हैं तो याद भी नहीं पड़ता कि चेहरा था कैसा. माने हल्‍के से रुपरेखा का बोध होता है. जोर मारते हैं तो कभी सोये में पिंडली दिखी थी, या उघारे पीठ, आंख और नाक और होंठ, मगर पूरी तस्‍वीर मन में नहीं बन पाती.

कुछ देर तक दायें-बायें करवट कर-करके दु:खी होने के नाटक से मन उकता गया तो नंदन सुबह के लिए भिगाये बूट की तरकारी बनाने की कसरत में जुटे. एक के बाद एक तीन प्‍याज काटे, सरसों के तेल में जीरा का छौंक दिये और उसमें सारा चना उलेड़कर छनौटा चलाते रहे. खूब सारा मसाला डालकर तरकारी बनायेंगे और थाली भर भात के दाबकर भूख का हिसाब सेट कर लेंगे. मगर दस मिनट तक छौंक और मसाले में छनौटा चलाते रहने के बाद दिखा कि तरकारी कहीं नहीं जा रही. भात के साथ जीभ के नीचे तो नहीं ही उतरेगी. घनश्‍याम होटल खाने क्‍यों नहीं गए का गुस्‍सा मन में कुनमुनाते तरकारी उतारकर स्‍टोव पर दूध का टूटा भगौना चढ़ा दिये. चमरख गमछी उठाकर हाथ पोंछ रहे थे तो गंजी के तीनों छेद पर नजर गई. उसके दीखते ही जीवन के दूसरे छेदों का भी तेजी से स्‍मरण होने लगा. सोचकर पारा ऊपर चढ़ने लगा कि कि पुलिस की नौकरी में यहां पैंट का टूटा बटन लगा रहे हैं और वो बदकार नैहर में मजा कर रही है!

और भाभी और मौसी मेरी मदद में खड़ा होने की जगह उसका साथ देती हैं कि अभी बच्‍ची है, उसे अपनी पुलिस की मारपीट से दूर रखो!

अरे, ऐसे ही दूर रहना था तो पास क्‍यों आई पहले? कोई तरीका है? अभी सामने होती तो वो खींचके लप्‍पड़ लगाते कि सारा बच्‍चीपना एक्‍के मर्तबे निकल जाता!

मन में भाव की तीव्रता रही होगी, घूमे हाथ की चोट में स्‍टोव पर धरा दूध का भगौना हवा में लहराता नीचे आ गिरा. हेड कांस्‍टेबल नंदन नीलमणि झा ज़मीन पर गिरे दूध को एकटक देख रहे थे और उन्‍हें विश्‍वास नहीं हो रहा था कि उसे गिराने का काम उन्‍हीं के हाथों संपन्‍न हुआ है.

4 comments:

  1. "बढ़िया ..पर क्या नन्दन को चन्दन लिखा गया है या चन्दन उच्चारण में अधिक लोकप्रिय और सरल है बजाए नंदन के...."

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  2. @Amitraghat,
    ग़लती मुझसे हुई, बंधु, देर रात की रही होगी, सुधार लिया. शुक्रिया.

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  3. जीवन के सुन्दर चलते क्रम में कोई विचार तो ऐसा घुसा ही रहता है जिसको अधिकार रहता है आपके फटेहाल में झाँकने का ।

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