Wednesday, July 7, 2010

ज़ुरू ज़ुरू हो हो हो, हो हो, ज़ुरू..

कभी सोचकर ताज्‍जुब होता है कि अनोखे प्रतिभापुष्‍प पंखुरित होकर अंतत: फिर कहां हेरा जाते हैं. जैसे इसी (फिर, अनोखे, ही) रेकॉर्डिंग को ही लीजिए, सन्र् सत्तर का वो सुहाना समय, अमिताभ की हवा ने अभी हिन्‍दी सिनेसंसार का चेहरा काला नहीं किया था, शंकर जयकिशन वाली सेंसुअस पोंपॉसिटी बची और बनी हुई थी. और आपमें से बहुत भले पैदा न हुए हों, मैं न केवल पैदा होकर पैर मारने लगा था, ज़बान भी मेरी ठीक-ठाक उड़ने लगी थी (किन-किन दिशाओं में उड़ रही थी, उसके बारे में फिर कभी), और यह अपर्णा सेन का सहज सौभाग्‍य ही रहा होगा जो मुझसे दस वर्षीय पुष्‍पांक के अफ़ेयर्स-फेर में पड़ी, और आसपास की दुनिया भुलाये, वहीं पड़ी रहीं. और उससे ज़्यादा सौभाग्‍य बाबू जयकिशन का, कि मुझे अपर्णा की गोद में उसकी साड़ी से मुंह ढांपे (देवानंद की अदाओं से बेतरह अलग) गुनगुनाते सुन लिया और वहीं ज़ि‍द करने लगे कि इस अनोखी आवाज़ को मैं अपनी अनोखी फ़ि‍ल्‍म के टाइटल ट्रैक में यूज़ किये बिना रहूंगा नहीं. अपर्णा दुलार से समझाती रही, मगर मैं कहां जयकिशन के जाल में फंस रहा था? वो तो ज़ि‍या मोइउद्दीन के उर्दू जिरह की मिठास का नशा रहा होगा जिसमें उलझकर रेकॉर्डिंग स्‍टूडियो पहुंच गया और भारतीय टाइटल संगीत को एक नयी दिशा मिल गई, मगर फिर, सवाल उठता ही है कि अनोखे प्रतिभापुष्‍प पंखुरित होकर फिर कहां हेरा जाते हैं? शायद यही चिंता होगी कि आप रेकॉर्डिंग के आखिर में देखेंगे, देख तो दिल की जां से उठता है की तर्ज़ पर मेरे भी आह (उतनी सुरीली नहीं मगर वह अलग बात है) उठ रही है..

1 comment:

  1. "दुर्भाग्य से मेरे कम्पयूटर का सबवूफर सिस्टम खराब हो गया है ...कुछ समय लगेगा रिकार्डिंग सुनने में...पर प्रश्न तो सही है कि प्रतिभा आखिर कहाँ हेरा जाती है..?

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