Friday, July 16, 2010

इंटरनेट के तार पर स्‍वगत सार्वजनिक साहित्यिक चिंता..

लिख चुके के बाद का हिन्‍दी का लेखक फिर अपने लिखे के पाठक खोजेगा. बाबू, ज़रा पढ़ लीजिए? महाराज, कृपा कीजिएगा? क्‍योंकि अख़बार के तो जो सरकार हुए उनका क्‍या ही कहें, उन सजीले, रंगीले मंचों पर विचारों के जो गहरे, गर्वीले तीर छूटते हैं मालूम नहीं उन्‍हें कितना तीर समझा जाये. विचार तो क्‍या ही समझा जाये. समझा जाये? उससे अलग फिर पत्रिकाएं हैं (हैं? कहां हैं?) कभी त्रैमासिक का शरदांक तो कभी एक घबराया, जल्‍दी में तैयार किया विशेषांक निकल जाता है. जिनकी कुछ उस अंक में सामग्री प्रकाशित हुई होती है वो शंख बजाकर कूदने लगते हैं कि हिन्‍दी साहित्‍य कुम्‍हलायी, लजायी किस जिस भी दिशा में जो पड़ी थी, अब कैसी भागती किस दिशा को मुड़ी जा रही है. उनकी मोड़ों पर कहीं कोई कैंची चलाता, सवालों में हकलाता दीख जाता है तो नवांकुर रणबांकुर भाई लोग हतप्रभ अपनी दिशा कितना तो अच्‍छा दौड़ते हुए अच्‍छा-अच्‍छा लग रही थी का प्रमाणपत्र गिड़गिड़ाने की ज़ि‍द तक गालियां देते हुए मांगने लगते हैं.

किसी दूसरे भाई की सूचना आती है कि जिस विशेषांक से आप सारे प्रमाणांक माप रहे हैं, उसके बाजू में साहित्‍य के किन्‍हीं अन्‍य ज्ञान ने एक अलग मार्कशीट तैयार की है, उस पर के बुखार के ताप को मापा? तो बुखार में सुलगता एक रणअंकुर अकबकाया सवाल करता है अरे, सारी लड़ाई हम इस मंच पर घेरे हुए हैं तो किनने किस अज्ञान में कहीं एक दूसरा संधान कैसे खोल लिया?..

कहने का मतलब पचास करोड़ की भाषाई आबादी होगी, पचास पैसे का मैटर करने वाला इस भाषा का कोई वैचारिक मंच नहीं है जिसका लोगों के साहित्यिक-सुधी मन में कोई वास्‍तविक, मार्मिक आदर हो, जिसकी ओर नज़र फेर लोग इस भाषा में विचारगान या मन-मर्म की उड़ान कहां जा रही है की कोई थाह पा सकें. थाह लोग गुटपंथ के पंकों की पाते रहते हैं. किनने किसको कहां लगवा दिया, छपवा दिया. या लात लगाके बहिरवा दिया. ऐसी स्थिति में पहुंचवा दिये, गुरु, कि आगे से ज़बान नहीं खुलेगी टाइप. बिना नामवर के नाम का एक्‍को काम न होवे टाइप. अच्‍छी महीन भाषा का बिसनाथ बाबू गद्य लिखेंगे तब भी पाछे पाछे याद करते रहना ज़रुरी लगेगा कि नामवर के पीछे पीछे हमने भी कामभर तैराकी सीखी. फिर यहां और वहां हजारी बाबू को याद किये रहे. इस याद करते रहने की अगरबत्‍ती जलाये रहने में ही साहित्यिक की प्रतिष्‍ठा है. ऐसी प्रतिष्‍ठाओं वाले, ओह, कैसी तो मार्मिक भाषा और समाज हमारा ठहरा के साहित्‍य की ही फिर निष्‍ठा है.

इससे बाहर मालूम नहीं फिर कहां साहित्‍य विचार भरमार की जगह है, है?

आप लिख लो बत्‍तीस बंद, सवा सौ गांठ सुलझाये चलो, गुरुवर माथे पर हाथ न धरेंगे जब तक, सामाजिकता के पुण्‍य का चरणामृत पाओगे तब तक? ज़्यादा संभावना है नहीं पाओगे, क्‍योंकि गुरुवर के हाथ के नीचे से बाहर के संकीर्ण करीन-कैटरीन भदेस संसारविहार में साहित्‍य की कोई मति, गति ठहरी?

लिख चुके के बाद के हे हिन्‍दी लेखक, अपने लिखे को धोती की गांठ में बांधे, जी-मेल में गांठे, फिर पाठकीय मोहब्‍बत की खोज में किधर, कहां जाओगे? डेस्‍क पर उंगलियां बजाते, बेवज़ह दांत दिखाये कैसे, किस-किस तरह मुरझाओगे?

5 comments:

  1. तो, फिर का करें? अपना मदर टंग बदल लें? अंग्रेज़ी मा लिखें?
    :)

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  2. @रतलामकुसुम,
    जे बिचारणीय प्रश्‍न ठहरा, सुर्जप्रताप.

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  3. " अच्छे लेखन को, अच्छे साहित्य को हमेशा नकारना ये हिन्दी पट्टी वालों की मुख्य विशेषता है..."

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  4. साहित्य फाहित्य तो जो है सो ठीक है..... लेकिन मुझे याद नहीं आ रहा कि अब तक कही मैंने किसी नामवर की कौनो रचना पढ़ी है।

    यह नमवरई ही है जो हर ओर 'साहित्यिक हथपोईया रोटी' बनाने के चक्कर में 'लतपोईया रोटी' बना के धर दे रही है।

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  5. डेस्‍क पर उंगलियां बजाने का भी अपना मजा है. बरसों की प्रेक्टिस से अब सुर ताल में बजने लगी - उसका तो ले लेने दिजिये कि उ पर भी पाबंदी लगा लें. :)

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