Saturday, July 17, 2010

तारे कितने सारे तारे..

लिख रहा हूं. कि अभी लिखूंगा. या पहले का कुछ छुटा रहा होगा, जिसकी छिटकन सहोरने कीबोर्ड तक फिर खिंचा आया? मगर अटकी हुई बारिश के बीच के सूखे की वह ज़रा सी बात जैसी बात दरअसल थी क्‍या? यूकिलिप्‍टस के नंगे पेड़ पर गीले पंख झाड़ता किसी कौवे का चित्र था, कि नयी बनती इमारत के बाहर बांस के खांचों में किसी मजूर के छुटे गमछे का ख़याल?

किताबों के नाम थे, या मन के भीतर दबे पहचाने चेहरे गुमनाम? सोचता हूं, और फिर बिनसोचे लिखे जाता हूं.

तुम्‍हें याद है, प्रियवर चेतनकुमार? नहीं, चेतनकुमार फ़ि‍लहाल चश्‍मे के पीछे आंखें मुंदे खुद को भूले हुए. याद करना तकलीफ़ बढ़ाना है. मगर तब नहीं याद करना नहीं याद करने की तकलीफ़ बढ़ाना नहीं?

बाबा भूपिंदर बोल गए रहे ‘मेरी आवाज़ ही पहचान है’. जिस तरह की थी पहचानी होती ही. मगर जिनके टेलीविज़न पर आवाज़ नहीं, हमारी वाली पॉडकास्‍टों की शान नहीं, वे न पहचाने जायेंगे? भूपिंदर जी जो आप बोल गए रहे वह न्‍यायसंगत रहा? आपने दूसरी तरफ़ एक बोल दिया था ‘रैना बीती जाये..’ बीतती होगी आपकी सुश्री एम की संगत में, हमारे दर कहां बीतती है? अभी तक नहीं बीती. जितने वर्षों भी पहले जो आपने किया रहा, ये जेनराइलेज़ंश आपके सही नहीं ठहरे.

क्‍या तो वो ‘किनारा’ का गाना था, ‘एक ही ख़्वाब देखा है मैंने’? अच्‍छी सी आवाज़ पर बेमतलब से धरम प्रा और हेमा अम्‍मा चहकते से डोलते रहे, आपको अच्‍छा लगा था भूपिंदर साहब? यही ‘रुत जवां, रुत जवां’ के हसीन ख़्वाब ठहरे?

मैं ‘आख़ि‍री ख़त’ की तो नहीं ही सोचना चाहता. इतने अंतराल पर इंद्राणी मुखर्जी और राजेश खन्‍नायी रोमान के ख़याल अब सिर्फ़ वहशतनाक़ ही हो सकते हैं. ऐसे ख़याल इस नीम सुबह की महीन रौशनी भूपिंदर की आवाज़ के सहारे भी नहीं बचाई जा सकती. मगर मैं कुछ और, किन्‍हीं और ख़यालों की लिख रहा था, क्‍या लिख रहा था? रात की चौथी चाय पीते हुए मैं क्‍या सोच रहा हूं?

भूपिंदर साहब ने अब तक चाय पी ली होगी? सुबह की पहली? मैंने बिना चैताली के चार कप चला लिये हैं तो मिताली ने अब तक एक कप भी न सजाया होगा?

मगर यह सुबह-सुबह भूपिंदर की सोचने का क्‍या तुक है? और न सही, तारों की ही सोचता. सारी रात छुपे रहे, शरीर सुभो ही नज़र आते? लेकिन जैसे रात को नींद नज़र नहीं आती, सुबह बेहया तारे शरमाये फिरे-फिरे रहते हैं. मैं चाहकर भी चेहरे पर वो मुहावरा नहीं चिपका सकता, वही, ‘आंखों के आगे तारे नाचने लगे’. क्‍योंकि मेरे नहीं नाच रहे. ज़्यादा मैं ही नाचता रहता हूं. जबकि नौ मन क्‍या, नौ छंटाक तेल भी नहीं होता. और मैं राधाकुमार तो नहीं ही होता!

तो ये चक्‍कर क्‍या है जो मैं लिख रहा हूं? कि सिर्फ़ चक्‍कर ही है, और जो लिखना है वो अभी आगे लिखा जाना है?

वेरी फ़नी. मीनिंग नॉट फ़नी एट ऑल.

मगर ये सुबह तारे जाते कहां हैं? रीयली, कुछ मेरे आंखों के आगे नाचने के बाद फिर नहीं जा सकते थे?

ओ जानेवाले हो सके तो लौट के आना..’ लेकिन अब ये अचानक मुकेश को क्‍यों बुलाने लगता हूं? भूपिंदर साहब को ये किसी तरह से अच्‍छा लगता होगा? मनुष्‍यमन में यह सतत का विस्‍थापन क्‍यों है? जबकि परम्‍परा हमेशा समर्पण की रही है. जबकि भूपिंदर ने ‘छोड़ दो आंचल ज़माना क्‍या कहेगा’ गाया भी नहीं है.

मैं क्‍या कह रहा हूं. ‘तारे ओ कितने सारे तारे..’ वो कौन सा गाना था, जिसपर तारे नहीं बच्‍चे ठुमकियां लगाया करते थे?

8 comments:

  1. " मनुष्‍यमन में यह सतत का विस्‍थापन क्‍यों है? जबकि परम्‍परा हमेशा समर्पण की रही है. " -विस्थापन की ललक या लंडूरेपन की झलक ?

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  2. आपकी पोस्ट आज चर्चा मंच पर भी है...

    http://charchamanch.blogspot.com/2010/07/217_17.html

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  3. वैसे भूपिंदर साहब गिटार भी बहुत अच्छा बजाते है .....ओर एक हिट गाने में उन्ही का गिटार है सर जी....

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  4. भूपिन्दर जी के गाने बहुत अच्छे लगे।

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  5. दोपहर में नहीं तो रात में अकेले ढूंढिए अपने शहर की उम्र से लंबी सड़कों पर, "नीलगगन" के तारे

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  6. "भूपिन्दर में कुछ तो होगा जिसने ये पोस्ट लिखने को मजबूर किया है.."

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  7. आह, रात की चौथी चाय.. और बाबा भूपिंदर..

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