
माधव मत आना उस रात, तीन पाये और चार ईंटों पर टिके तखत की इस दुनिया का सब सन्तुलन तोड़ जाओगे, मैं आईने के सामने खड़ा सीटी बजाने से फिर कतराता फिरुंगा, वैसे भी उस रात न खत्म होने वाली बारिश बरसती होगी, छत के टपरे से ज़्यादा दिलों पर बजती, किसी और घर रात काट लेना, माधव, यहां मत आना. मेरी हर बात पर हंसने लगते हो, ईश्वर के लिए उस रात बख्शना. उन लड़कियों के नाम जो तुमसे जाने कैसे दु:ख पाती रहीं, दु:खकातर छूटी फिर ताउम्र मुंह चुराती रहीं, छत के मुंडेर के वे मोर जिनका जीना तुम हराम किये रहे, बच्चों का ग्राइप वॉटर चुराते, पूजाघर के मिश्री के ढेलों से अपनी गिनती सजाते उन सब के नाम मत आना माधव, उस रात मत आना. इस उम्र में आकर अब कुछ चीज़ें हैं जिसका सामना करने से डरता हूं, ख़ास तौर पर जब पूरी रात बरसात बरसती रहे.
माधव मत आना उस रात, फुसफुसाकर मंत्र सा मैं पढ़ता हूंगा दीवारों पर, अचार के सूने बयाम मुस्कराते होंगे, टूटे बकल का बेल्ट नम हवा में कांपकर फुफकारता, और तुम लापरवाही से दरवाज़े के भीतर पैर धरोगे, घुटने तक गीली पतलून गंदगी में औंचाये, हाथ पटकते बे-लजाये, जैसे उम्र के इतने वर्ष बीते का कोई ख़याल ही नहीं, कि जैसे ज़िंदगी तो शुरु हुई अभी एकदम अभी, कि हकबकाया मैं गुस्से से ज़्यादा शर्म में नहाया लरज़ता फिरुंगा कि तुम्हें मना किया था, मगर माने नहीं तुम, कि मैं कोई मज़ाक का कैलेंडर नहीं जिसे तुम जब कभी झांकने चले आओ, कांख से छेड़ने आंख से झाड़ने की निरर्थक कहानियां बनाओ. हां, निरर्थक.
माधव मत आना उस रात मैंने कहा था तो कोई मतलब रहा होगा. रिक्शे पर कपड़ों के नीचे छिपी किसी पैर की उंगलियां दिखी होंगी, किसी ने एक नाम कहा होगा या ग़लती से हमने खुदी को किसी ख़ास नज़र देख लिया होगा, कुछ बात रही होगी माधव, कोई छुटा तागों में उलझा तिनका और वह सनसनाती रात, कि बरसने की आवाज़ों से मैं एकबारगी चौंक गया हूंगा, कि अचानक पानी के चमकते तीरों में एक पगडंडी खुल गई होगी, मुसलाधार में चीखा किसी का सुन पड़ा होगा, जबकि हक़ीक़त में सिर्फ़ बरतन कोई फ़र्श पर गिरा होगा, लेकिन मैं दहल गया हूंगा, ख़यालों की सब सिटकिनियां चढ़ा ली होंगी. और इस तरह ख़यालों के तहखाने में और गहरे गिरा हूंगा.
माधव मत आना उस रात कहता-कहता मैं थक गया हूं माधव. तुम्हें मालूम है तीन जोड़ी मोज़े और चार कमीज़ों को तहाकर सहेजने की मुझे फुरसत नहीं, विटामिन और तकिये के नीचे कहां धरा था क्रॉसिन की गोलियां बटोरने की तो हर्गिज नहीं, मैंने कितने वक़्त से तुम्हें चिट्ठी लिखी नहीं और राज्य परिवहन निगम की बस की खिड़की से बाहर क्या नज़ारा दिखता है उसकी तो सपने में भी याद नहीं. तुम समझ सकते हो माधव मैं कितना संभलकर चलता हूं, पैर दुबारा किसी हाल ग़लत न पड़ें की संजीदगी में सिर से पैर तक बस इतने में ही यकीं रखता हूं, तुम आकर फिर मुझे सपना दिखाओ, बताओ जीवन कैसा अनोखा है और हम मन की नाव और मोहब्बतों के गांव पर बैठे इस घनेरे से बाहर के अजाने अंधेरों में कूद पड़ें, ओफ़्फ़, माधव इन ज़रा सी रुपल्ली के चप्पलों को चटकारते, मेरा दिया चाय उतारते ऐसे ख़याल कहां से आते हैं तुम्हारे भेजे, इक ज़रा सी शर्म नहीं आती?
माधव मत आना उस रात क्योंकि न खत्म होनेवाली बारिश से अलग वह कोई और रात भी होगी तो भी मैं इसी तरह डरा अपने कोने मिलूंगा, बेमतलब घुटने की थपकियां बजाता, पड़ोसी के कोई सस्ता चुटकुला सुनाता. मैं नहीं चाहता कि तुम फिर बताओ हम क्यों भागे थे घर से या बस की छत पर उस आवारा रात एक कुंजरिन की मोहब्बत में हम क्यों पिटे चार शोहदों से, और कुंजरिन का गरबीला चेहरा देखकर पिटे भी खुश रहे थे. तीन-तीन दिनों तक भूखे रहकर हम बेहयायी से हंसते और कड़कड़ाती ठंड में सिर्फ़ सपनों की आंच पर तपते रहते. तुम्हें याद है माधव केया घोषाल भाग जाना चाहती थी तुम्हारे साथ मगर तुम थे जो नंबरी पक्कमख़ां, हाथ जोड़कर केया से माफ़ी मांग ली थी कि क्यों अपना बेड़ा गर्क करना चाहती हो लड़की, टूटी नाव के हम किसी और सफर पर निकल रहे. ओह, पागल माधव भाभी के गहने चुराकर मैं आया था तुम्हारे पास याद है? मैं कुछ भी याद नहीं करना चाहता माधव, यह भी नहीं कि मैं हर समय क्यों तुम्हें इतना याद करता हूं.
माधव मत आना उस रात, तीन पाये और चार ईंटों पर टिके तखत की इस दुनिया का सब सन्तुलन टूट जायेगा, मैं आईने के सामने खड़ा सीटी बजाते हुए कैसा मूर्ख लगूंगा मैं नहीं देखना चाहता. वैसे भी उस रात न खत्म होने वाली बारिश बरसती होगी, छत के टपरे से ज़्यादा हमारे दिलों को बजाती. और तुम्हारे चेहरे पर हमेशा की सजी वह कमसिन हंसी और महकती हरकतों में बिजलियां लपकतीं, मैं कातर होकर फिर बहकने लगूंगा, बारिश के नगाड़ों पर हम फिर सारी सारी रात सपना बुनते, मैं खुद को निश्छलता से हंसता देख चौंकता फिरुंगा, सब गड़बड़ा भरभरा जायेगा माधव, हमारी ज़हीन इतनी संगीन दोस्ती के नाम पर ही मत आना माधव, क्योंकि तुम भी जानते हो मैं सिटकिनी चढ़ाये पूरी रात दरवाज़े से देह सटाये तुम्हारे कदमों की राह तकूंगा. इसीलिए मत आना. उस रात किसी भी रात दोस्त.