Thursday, July 22, 2010

छोटे लाल

खिड़कियों के शीशों पर छोटी बूंदें बजती रहती है सारी रात. जैसे जेब में ज़रा सा पैसा बजता है. जैसे मेरे ज़रा से शब्‍द. ताव खाते रहते हैं. शब्‍दों से दूर खड़ा मैं कभी देख पाता हूं कि बज रहा हूं. अपने लघुकायपने में सारंगी जैसा सिरजने की कोशिश सा करता कुछ. सन्‍नाटे में छोटी आवाज़ें घन्-घन् घूमती कोई पुकार बुनती रहती हैं.

देर तक रोता रहा बच्‍चा कभी चौंककर कान लगाये सुनता है.

कि यह क्‍या है जिसका बजना मेरे विलाप से भी ज़्यादा भीषणतर बनता चलता.

छोटी बातें हैं. ज़रा ज़रा सी की. जैसे एक चूहे का बड़े कमरे में चले आना. छोटी गिलहरी का पीपल की नोंक पर पहुंच जाना. छोटों की बड़ी बातें. छोटी बड़ी बातें.

रॉकेट सिंह: सेल्‍समैन ऑफ़ द ईयर’ में छोटेलाल मिश्रा का फैल जाना. बड़े पुरी का और छोटे होते हुए जाना. शिमित अमीन की स्क्रिप्‍ट की छोटी ग़लतियों का फ़ि‍ल्‍म की बड़ी विफलता में बदल जाना.

मिस्‍टर एंड मिसेस 55’ के आखिर में नायिका का एयरपोर्ट पहुंचना छोटी ही बात होती है. मगर उसके मतलब बड़े बन जाते हैं. जैसे ‘गाइड’ के आखिर में मरते राजू के पास रोज़ी का लौट आना.

जैसे आपकी ज़रा सी हंसी. और मेरा चुप बने रहना.

या मेरे चुप बने रहने पर आपका हंसने लगना.

छोटी ही बातें हैं. जैसे आलोक राय की छोटी किताब. शम्‍सुर्रहमान फ़ारुकी की. पतली. मगर कितनी सारी हंसी है जिसमें. या चुप्‍पी. बीच फांक कटे समूचे आधे-आधे गांव.

(एक और किताब हुई. प्रैस से नई और ताज़ा-ताज़ा आई. बाबू विजय शर्मा की. 'दिमाग़ में घोंसले' छोटी ही है. मगर घोंसले बड़े हैं.)

बड़े भूगोल का वह भी कैसा छोटा इतिहास बना रहा. द ग्रेट आर्क. राष्‍ट्रीय विरासत की महत्‍वपूर्ण थाती हो सकता था, नहीं हो सका. महाराष्‍ट्र के छोटे हिंगनघाट में विलियम लैंब्‍टन की एक छोटी सी समाधी है, बड़ा राष्‍ट्र एक बड़े नायक को बिसराये छोटा बना रहा.

मैं भी सोचता एक छोटा अर्थभरा वाक्‍य लिखूं. मगर फिर उस छोटे से जूझते में दिखता अपनी बेचैनियों में भी हम बड़े छोटे ही रहते रहे.

8 comments:

  1. छोटी छोटी घटनाओं ने बड़ी दिशा दी है इतिहास को।

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  2. बहुते जूझन है जिनगी मे भाई..का करियेगा!!

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  3. का प्रमोद जी.....

    विचार...चिंतन...तंद्रा...अकुलाहट....सोच...

    सब कुछ एकै पोस्ट में पिरो के रख दिए हैं ..... एकदम मेरे मन माफिक पोस्ट है।

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  4. सुन्दर प्रस्तुति,
    अच्छी लगी,
    आभार...

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  5. "बेहतरीन....कई बार तो खिड़कियों के शीशे ही बजने लगते हैं......."

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  6. वाकई तकलीफदेह पड़ताल है सर जी !

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  7. एक छोटी पोस्ट, जो मेरे छोटे मगज पर एक छोटा असर कर गयी...

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  8. achchhi prastuti hai...'jansatta' me bhi aapki 'tipiyaan' padhta hoon !

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