वैसे सूरत हम बनाना कब चाहते हैं. सूरत बनाने की सोचते में हाथ कांपते हैं. हाथ कांपना ठहर जाने के बाद भी देर तक मन का कांपना बना रहता है. वैसे में हम चाहने लगते हैं अच्छा हो कोई सूरत न ही बने. जैसा, जो भी अपना सा रूप लिए हम अपने से में बने रहें.
अपने से में हम बने ही रहते हैं. उसी बने रहते में फिर बाहर भी निकल आते हैं. कम से कम मैं तो निकल ही आ रहा हूं. तीन लाख वर्ष आगे शायद न पहुंच पाऊं, तीन कदम ही आगे निकल चलूं. आप शायद दिल्ली में दीखें, मुस्करायें और जीवन- ज़रा सा, ज़रा सा और कम बुरा बन सके? या बेहतर? दिल्ली आपको सुहाती न हो तो हम कहीं और बाहर मिल लेंगे, मैं पहाड़ पर बारिशों में घिरा कहूंगा हूं यहीं कहीं, आप जोर-जोर से कहियेगा कहां कहां? फिर हम हंसने लगेंगे. हंसी न आये तो भी उसकी एक कोशिश कर लेंगे. यकीन मानिए ऐसी बुरी बात न होगी. यूं भी एक कोशिश कर लेने में कोई हर्ज नहीं. बीच-बीच में बाहर निकल ही जाना चाहिए. बाहर बारिश होती हो तैसे में भी. नहीं, आप हमारे साथ इत्तफाक़ नहीं रखते? (इत्तेफाक़ में नुक्ता लगाने के हद तक भी नहीं?) निकलना अच्छा ख़याल नहीं? लेकिन मैं तो ऑलमोस्ट पैर बाहर रख चुका हूं, दोस्त? फिर मोड़ लूं, ज़रा सी उम्मीद बांधे हूं उस पर फिर पानी गिर जाने दूं?
आप ज़रा सा अच्छा नहीं सोच सकते? अपने खातिर न सही, मेरे ही लिए? बार-बार बस्ता बांधना आपको हंसी-खेल लगता है? जबकि बाहर बरसात हो रही हो? जबकि मैं बाहर बरसात में खड़ा होऊं? हंसते हुए बेहयायी से, बेमतलब, चीख़ता फिर रहा होऊं कि देखो, निकल रहा हूं?