Friday, July 30, 2010

पठन-पाठन के थकेलों की तकलीफ़..

थक गया हूं. पस्‍ती की एक खास स्थिति में अंग के इधर और उधर, सब किधर पिराते रहने का जो एक दर्दभरा अहसास बनता है न, वैसा ही कुछ. और इस थकनन में मैं अकेले नहीं हूं. अब्‍बास, लल्‍ली, चतुरानन और रामकीरत भी खड़े हैं. इधर-उधर खड़े हैं, मगर खड़े हैं. थके हुए. गाल खुजाते हुए. सिर झुकाये. सिर्फ मुनिया ही है जो चुपाये रहती है, कोंचने पर भी कुछ कहने, कमिट करने से अपने को बचाती है. मगर उसकी चुप्‍पी की संगत में आधा घंटा बैठ जाइए, विदाऊट डाऊट देख लीजिएगा कि वह भी थकी हुई है. कोई बंबे वाला होता तो वैसे भी दू मिनट में बोल ही देता कि सब साले, थकेले हैं!

अब्‍बास को डेढ़ घंटा पहले फोन करके सवाल किये, का मियां, हिन्‍दी में अच्‍छा नवका क्‍या पढ़ रहे हो? अब्‍बास एक मिनट चुप रहने के बाद जवाब दिये नवका होगा, मगर अच्‍छा है कुछ? है तो हमको खबर नहीं है, आपको है तो बता दीजिए, हम पढ़ने लगें?

छोटका बाबू विष्‍णु से पूछे तो बोले अरे, कैसे नहीं हैं, ब्रह्मा हैं, उनको चंपानन पुरस्‍कार मिला है? महेशो हैं, उनको पहले ही मिल चुका है! अपराजेय आनंद है, आनंदविथी है, आदि अनादि, और भी जाने क्‍या-क्‍या. आनंद लेना सीखिए, लेते-लेते आनंद लेने की आपको तमीज आ जाएगी?

खुद से घबराये हमने रामकीरत को डांटकर कहा साले, जरा तुमसे उत्‍साहित होते नहीं बनता, विष्‍णु होते रहते हैं, जरा साहित्यिक अनुराग का ककहरा उधारी लेकर जीवन धन्‍य नहीं कर सकते?

बाथरुम में कहीं छुपाके रखे थे, वहां से बीड़ी सुलगाये लौटे और तब रामकीरत ने ठंडे मन जवाब दिया, भइय्या, बह्मा, बिस्‍नु, महेस का तेलबंदी का कहानी का हम बेकीरत आदमी कौ ची करेगा, कर सकेगा, आपै बताइये? हमरे मन में मीठे आंच की कौनो अगरबत्ती जलनी चाहिए, नहीं जलती हो तो जबरिया भजन गाने लगें? गायेंगे तो आप उसे मन की मोहब्‍बत में घुला अनुराग बुलाइएगा?

लल्‍ली बरसात का पानी में लेसराया साड़ी समेट रही थी, मने असमंजस था कि कड़ाही में चूड़ा भूज लें कि पाव भर पकौड़ी छान लें, उखड़े मन छनछनाई बोलीं, तुमलोक को सरम नहीं लगता कि इसके और उसके पीछे साहित्तिक अलता सजाते चलते हो? सोहर गाते हो तो अइसा जेमें दू आना के जलेबी जेतना भी मिठास नहीं है, और हमरे छिनके मन को अपने बभनई में उलझाते हो? हमरे बिस्‍वास को? हमरे मन के अंतरंग के अनुराग को?

लाल, पीला और ओकरे बाद चूल्‍हा से कड़ाही उतारकर सगरे नीला हुई अंगना में लल्‍ली लौटीं तो फिर वइसे ही फैले-फैले बमगोला दागे-दागे बोलीं, आदमी एगो किताब हाथे में लेके बिछौना में ढेमलाता है तो काहे खातिर, कि मन के गहिरे कवनो रागवन के सफरी में निकले, कि ना? कि छुच्‍छे सब्‍दसंग्रह और ज्ञानसंचय से सिरफुटव्‍वल खेलत फिरे जी?
भागो तूलोक हियां से, तूलोक का पीछे दू पैसा का पकौडियो बरबाद करे का जी नहीं है!

अब्‍बास को फोन पर मैंने दीदिया का किस्‍सा सुनाया, मियां बाबू, अपनी पुरानी आदत के मुताबिक तीन मिनिट चुपाये रहने के बाद बोले कौन नवका बात बोल रहे हैं, ई सब सुन-सुन के भी अब मन मुरचाइल हो गया है, और थकाइये मत!

कहने का मतलब जल्‍दी ही हम अपनी पुरनकी, पहचानी थकनवस्‍था में लौट आये. अब्‍बास, लल्‍ली, रामकीरत वहां पहले से लौटे हुए थे ही्. मुनिया का भेद अभी भी साफ होना बाकी था. मगर फिर, मुनिया हमेशा की नन-कमिटल रही..

4 comments:

  1. काहे ल नहीं बूझते हैं कि हिंदी में अच्छा और नवका हियें ब्लागे पर लिखा जा रहा है? रामकीरत जी और चतुरानन जी को हम मेल भेज दिए रहे कि अच्छा नवका पढ़ना है त ब्लॉग देखिये...इच्छा हो तो पढ़ भी लीजिये. आप को नहीं बताये काहे कि आपसे डराते हैं.

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  2. @बाबू सी कुमार,
    रामकीरत और चतुरानन को ई-मेल ठेल दिये, एगो मछली (मीन) माइंडेड बिसुनपरसाद को नहीं पठा सकते थे? कि दर्द बढ़कर इन्‍तहां खाली हमरे एंडे पर न होता रहे?

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  3. अगर मै अजदक तक न आई होती तो ,लेसराता साड़ी, बिछवना पर ढेमिलाना साहित्तिक आलता ...कुल कइसे पढ़ पाती .. ।आभार पंकज उपधियाँ जी का ....बज ओरी से इहा तक का सपर के लिए।

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  4. तहलका का ’पठन-पाठन’ पढवा देते :-)

    P.S. हम भी आपसे बहुत डराते है। :-।

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