Saturday, July 17, 2010

कितने जुग में रोमकथा..

विकास कहता है ’रोम वाज़ नौट बिल्ट इन अ डे’. एक दिन तो दूर यहाँ एक साल में भी अपनी रौमहर्षककथा बिल्ड हो रही है इसमें भयानक संदेह है. कितने दिन में होगी? क्योंकि होनी तो है. और कोई सुर्जप्रकाश सूरज की रोशनी की तरफ़ उंगली पकड़ के लिये तो जा नहीं रहा. सत्रह दिशाओं में मन भागता है, अहा कैसी तो हर्षीली बयार बहती है, मगर सत्रह की जगह सात काम तो कुछ वाज़िब तरीके से होते चलें? ढाई ही सही, आं? व्यासजी ने कितने दिन में महाभारत निपटा लिया था? हमको अपना यह सकारथ निपटाने में फिर इतना समय क्यों लग रहा है? जबकि मैं किसी की गांठ से बंधा हूँ और ना ही मेरा कंप्यूटर मेरे कंधे पर गिरा पड़ा है. यह अपनी स्वर्णकथा हो क्यूँ नहीं रही है? आप सब तो चिरकुट हैं ही, इस लाघव को सोचने कहने में क्या संकोच? मगर मैं क्यों इस तरह से चिरकुट हुआ जाता हूँ? कि सन्नास्थिति में खुद को तकता सन्न पड़ा रहूँ, कि स्वर्णकथा कह सकने का काम फिर मुल्तवी पड़ा रहे?

सुर्ज का प्रताप बरगद के नीचे मेरे पीढ़ा पर आकर कब बैठेंगे? बैठेंगे प्रभु? या मेरा रोम रोम कुंठित करने वाला यह रोम जाने कितने दिनों में बिल्ड होगा.

6 comments:

  1. शानदार पोस्ट

    ReplyDelete
  2. हो जायेगा सर! रोम भी बन जायेगा..

    बहुत ही खूबसूरत प्रोटोटाईप है.. इन्तजार रहेगा इसके बनने का।

    ReplyDelete
  3. रोम लगता है बनना शुरु हो गया है..

    ReplyDelete
  4. "पोस्ट तो शान्दार है...पर परिकथा खुल नहीं रहा....क्यों...?

    ReplyDelete
  5. @खुल तो रहा है, नवीन, जभी पंकज के कोई प्रोटोटाइप दिखा, तुम भी मन की चंचलता कम करो, देखो, फिर दिखेंगे.

    ReplyDelete
  6. शानदार, शानदार, - परतीयां दिख रहीं हैं परिकथाओं का इन्तज़ार - गुरु जी मंच बना रहे हैं या एक और नया घेरा संसार ?

    ReplyDelete