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Jul 30, 2010

पहाड़े पहाड़े एक पॉडकास्‍ट..

कुछ मौके होते हैं, आदमी का चुप रहना बेहतर. जितना मैं हो सकता हूं, या नहीं हो पाता हूं, उतना चुप रहने की कोशिश करता भी हूं. मगर यह भी सही है कि बहुत सारा आदमीपन फिर भी कहीं छूटा रह ही जाता है. दो रात पहले उस एक गली में छूटता और डेढ़ दिन पहले फिर अपनी कोई एक बदजुबानी में.. ख़ैर, तो मुंह खुल ही जाता है (और फिर बेहया, बदजुबां खुला ही रहता है) और लरबोरियां अपने को गाने, सुनाने लगती ही हैं..

तो अच्‍छी चाय और अच्‍छे ऑर्गेनिक नमकीन की संगत में ऐसा ही कुछ गाये जा रहा हूं, पी. बी. जाने क्‍यों कैसा आनंद है वैसा ही कुछ बोलाये भी जा रही हैं.

कोई ग़लती और फूहड़ता हुई हो तो मैं और सिर्फ़ मैं ही उसका जिम्‍मेदार हुआ.

जो अच्‍छा है वह खास बबुनी प्रत्‍यक्षा और उनके नेक़ इरादों के लिए..

6 कमेंट:

जोशिम said...

नाम से हम भी हाथ उठाएं - परिचितों में :-)
[अब एक बार घूम ही आइये - "बाहर के" यू पी के पहाड़ में गुड्डी की डोर ढील दे कर ]

पारूल said...

कहानी में खाना ज़रुर होना चहिये :)

Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय) said...

आप दोनो के सम्वादो के झोको मे एक कटी पतंग की तरह बहता चला गया...

सतीश पंचम said...

@ कुछ मौके होते हैं, आदमी का चुप रहना बेहतर. जितना मैं हो सकता हूं, या नहीं हो पाता हूं, उतना चुप रहने की कोशिश करता भी हूं.
क्या अजीब संजोग है कि आज सुबह मोहन राकेश की लिखी कहानी 'अपरिचित' पढ़ रहा था और उसमें भी चुप रहने की इन्ही परिस्थितयों पर प्रकाश डाला गया है.....। उनकी कहानी बहुत पसंद आई।
और जहाँ तक पहाड़ो के लोगों...वादीयों....कीचड़ पांक की बात है तो वह रूमानीयत लिए हुए फिलमों में आना असंभव है....हां दूरदर्शन पर कहीं एक कड़ी देखी थी बहुत पहले....कि एक अंगरेज था जो कि पहाड़ को पसंद करता था....झरने के किनारे लोहे की खाट बिछा उस पर सोकर आनंद लेता था लेकिन जब अंगरेज जाने लगे तो वह नहीं गया और तब आसपास के लोग जो कि सीधे सादे माने जाते हैं उन्हीं में से एक अपना असली रूप दिखाता है और उसे परेशान कर देता है....उस कहानी का इतना ही अंश याद है....लेकिन उस पहाड़ी शख्स की बदतमीजीयां भुलाए नहीं भूलती....और जैसा कि आपने कहा कि लोग सीधे हैं....कुछ हरामी....।
शिवानी जी को मैंने पढ़ा लेकिन कहीं कहीं आत्मसात नहीं कर पाया। शायद मेरा मैदानी इलाके का होना इसमे बाधक बन गया.....।
सुंदर वार्ता। कमेंट सबमिट होने मे मुश्किल हो रही है..दुबारा प्रयास करता हूँ।

शरद कोकास said...

हम कहाँ लजाते हैं ?

Mired Mirage said...

पहाड़, आप देख आइए पहाड़। फिर बताइए क्या है पहाड़।
घुघूती बासूती