Sunday, August 1, 2010

छुट्टी के दिन का जाने कैसा तो कोरस..

नालायकी और लायकी के बीच घिरती, घूमती एक गुफ़्तगू.. ज़रा ज़िंदगी की टेक, थोड़ा साहित्‍य के महीन अनुराग, कुछ अपने को कहते, सुनते, समझने के आह, आह्लादकारी सुख.. और हां, वही प्रत्‍यक्षा बी और पिरमोद सिं बोलते हुए..

8 comments:

  1. सुना गया..और समझने की, उसे गहने की कोशिश की गयी..आगे और की जायेगी..बस कुछ है..जो भले पूरी तरह समझ न आये..मगर अपने होने की, अपने वैभव की उपस्थिति जरूर देता है..कुछ वही ’इल्यूसिव’ सा..यही कोई जीवन है जो हमारे सपनों मे हो कर भी यथार्थ से ज्यादा यथार्थ लगता है..मुझे भी लगता है कि रेणु को पढ़ना उसी स्वप्न मे डूबना, उसी यथार्थ मे उबरने जैसा है..साहित्य के राजमार्ग की बदलती लेन्स का हो नही पता...मगर विनोद शुक्ल आदि के साहित्य की अरैखिकता वाले भविष्य पर आपकी बात को ले कर सवाल जरूर उठता है..कि क्या जीवन भी ऐसा ही हो सकता है..नानलिनियर...किसी ’मेज़’ की तरह...जिसमे कहीं से भी घुस कर कहीं से भी निकला जा सकें?..मगर समय तो सपाट होता है..ऋजुरेखीय!!..थोड़ा सा और जाना आपको..और थोड़ा सा और अनजानापन मिला आप मे..थोड़ा और जानने की प्यास रहेगी....प्रत्यक्षा जी का शुक्रिया...

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  2. इस गुफ्तगू मे डीप जाकर भी समझने की कोशिश की और लेटरली भी काफ़ी कुछ पकडने का प्रयास किया।

    कुछ लेखकीय फ़ार्मूले पकड मे आये जैसे एक अपवार्ड स्पाईरिल बनाता लेखन.. जिसे लिखते समय लेखक और पढते समय पाठक गोल गोल घूमता जाय और ऊपर उठता जाय.. अपनी कल्पनाओ से भी ऊपर और रच दे जाने कौन सा कैसा देश, भाषा, समुदाय..| एक लेखन जो आदि और अन्त से ही परे हो। मै इसे समझू तो शायद ’द जापानीज वाईफ़’ सरीखा जिसमे पाठक कही से भी भीतर जा सके और कही से भी बाहर आ सके।

    युवा लेखको/ब्लागरो के लिये ऎसी गुफ्तगू चेरिश करने वाली चीजे है... कीप डेम कमिंग.. मुझे ये सब एक अनोखे संसार में ले जाते हैं और वो संसार मुझे तो बेहद पसंद है...

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  3. क्या अच्छा लगता है, क्यों अच्छा लगता है, यह उत्तर उतना ही कठिन है, जितना सरल उसे लिख देना है। नदी में तलहटी तक तो जाया जा सकता है, उसके नीचे क्या है, उसका क्या अर्थ है, यह उभारना नदी की लहरों को, तरंगों को नकारना होगा।

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  4. सुबह-सुबह ये जुगलवार्ता कान बजा गयी। हमसे ऊपर के तीनों लोग हमसे बहुत बढिया कह गये हैं। हम यही कहेंगे इस वार्ता को आगे बढ़ाया जाये। आधे-आधे घंटे के वार्ता प्रसारित की जाये। जय हो!

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  5. प्रत्यक्षा जी व आपकी बातचीत सुनना, काहिरा में बैठ झारखंड व झारखंड में बैठ काहिरा को याद करने वाली बातें सुनना, प्रत्यक्षा से यूँ मिलना अच्छा लगा।
    घुघूती बासूती

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  6. सवाल बड़े सटीक है..सच में सोचने की बात है...लिखना चाहते क्यूँ है?

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  7. कौन जाने कहां के देश, कौन जाने कहां का लेखक, कौन जाने कहां के पाठक... कातर भाव वाले ब्‍लॉगर .... विनोद कुमार शुक्‍ल के पाठक ...

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  8. Thank you God for bringing me to this chorus:)

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