Tuesday, August 31, 2010

शहर को कैसे देखें उर्फ़ बातें बनाना..

हाथ की उंगलियों पर गिनी जा सके जितने दिनों वाली गुडगांव से पहचान है, मगर जितने दिनों की और जैसी भी है, उसमें सन्‍न और सुन्‍न होता रहता हूं कि शहर को कैसे देखें. और फिर उस दिखते हुए की किन रुपों में पहचान करें. बहुत बार अहसास होता है कहीं बाहर छूट गई हवा और अटकी हुई धूल का कोई दूर तक पसरा सैरा है जिस पर आंखों को थकाने की गरज में एक सिलसिले में सीमेंट और शीशों की दीवारें उग आई हैं. और एसी की चहारदीवारी में कैद खरीदारियों को निकले सफरियों के लिए शीशाघरों के रास्‍ते होंगे शहर के रास्‍ते, उस खरीदारी से बाहर खड़ों को जाने कैसी दीखती होगी वह दुनिया, मैं देखना चाहता हूं तो दीखता है धूल और गुबार पीटकर गुज़रा है कोई आततायी घुड़सवारों का लुटेरा दल, और उसके बाद रेगिस्‍तानी गांव के निस्‍संग वीरानों में दूर लोहे के जालों में उलझी गुज़रती दीखती है चांदी की धुधली, खिलौनागाड़ी सी अवास्‍तविक मेट्रो रेल, जैसे शहर सांप के उनींदे सपने में कोई सुनहला केंचुल उतर आया हो!

मालूम नहीं शहर में रहनेवाले कैसे देखते हैं अपना शहर. बहुत बार चौंककर देखने की कोशिश की है मैंने मुंबई, हमेशा एक उदासीन हंसी में बंबे और बंबई दीखी है. और बहुत बार तो अपने परदों में उलझा मलाड और जोगेश्‍वरी के बीच सिर्फ़ अंधेरी का अंधेरा ही दिखता रहा है. और बहुत-बहुत देर तक दिखने के बाद आंखें मुंद जाती हैं तब सपने में शहर नहीं दिखता, शहर की आवाज़ें आपस में एक-दूसरे पर गिर पड़ती सुन पड़ती हैं. कैसे देखते हैं शहर को, आप समझते हों शायद शहर देखने की तमीज? मैं सिर झुकाये हवा में गिरते धूल की आवाज़ों को सुनता हूं, शहर को कैसे देखूं की सोचता हूं, देख नहीं पाता.

बड़े शहर छोटे शहर. एक-दूसरे पर गिरते शहर. कंगली ठठरियों पर चांदी का वरक चढ़ाते शहर. किसी पुरानी याद पर गैरतपने का गिरह गांठते. राह में आते ठेलेवालों को हटाते, लगभग शरीफ़ लोगों को बकरियां बनाते, खेतों के बीच सीमेंट बिछाकर रिसोर्ट उगाते, गुंडों को परवरदीगार बुलाते, बड़े छोटे, कैसे-कैसे तो शहर.

देहरादून की तरफ निकलते हुए सोच रखा था इस बार पहाड़ के कई एक शहर देख आऊंगा. ठीक-ठीक देहरादून देखना भी संभव न हुआ. अपनी बदइंतज़ामी से अलग बरसात दिखती रही, खबरों में पहाड़ का फटना गूंजता रहा, या यह कि क्‍या खाकर इस शहर में ककड़ी किलो चालीस के भाव और खुबानी सौ के बिक रहा है. एक दोस्‍त ने कहा देहरा जा रहे हो वहां पानू खोलिया को देख आना, देहरा में किसी दूसरे ने खबर करी बाबू, उसके लिए हलद्वानी जाना. ज़ाहिर है हम नहीं गए, नहीं देखे. मतलब वही कि मालूम नहीं कैसे देखते हैं.

चलते-चलते आखिर में अपनी थेथरई में कुछ तुकमंदी:

बात में बात में बात हम बनायेंगे, तुम फिरी-फिरी आना. आंखें फैलाये गिरी जाना. हम हंसें इठलायेंगे, बाद को होगा कि शरम में सिर नवायेंगे, तुम उठाना, हमारी बनी बातों को नीचे गिराये जाना..


10 comments:

  1. अजीब उलझन है , शहरों में वो अपनापन भी खो गया है , जो यादों में हमारी आज भी जिन्दा है । वो मेट्रो रेल जिसमें सफ़र शुरू होने से पहले ही ख़त्म हो जाता है , किसी से क्या जान पहचान भी होगी ? आपने चांदी की अवास्तविक मेट्रो गाडी , शीशाघरों के रास्ते , बहुत सही नाम दिया है , अब वो मेलजोल हो ही नहीं सकता । और शोर इतना कि जैसे बेहोशी के बाद जगें तो मक्खियाँ भिनभिनाती लगें , क्या नाम दें इसे ?

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  2. कहते है अब हर शहर अपनी शक्ल हर पांच साल में बदल रहा है ....

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  3. पता नहीं अपने शहर को सब कैसे देखते हैं, मैं तो जयपुर को अभी भी अपना शहर कम ही कह पाती हूं। दिल अभी तक दिल्ली में अटका है। आखिरी बार मुंबई जाकर आई थी तो इतना परेशान होकर लौटी थी कि कसम खाई थी कि अब नहीं आऊंगी। हर शहर की पर्सनेलिटी के साथ हम कितना कमफर्टेबल हो पाते हैं।

    .....पर पहाड़ों की यात्रा सुखद रही होगी ऐसा मान कर चल रहे थे हम तो और आपने कहा कि आप तो ककड़ी और खुमाने के दामों में अटक कर रह गए।

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  4. @नीलिमा ,
    एक जौनसारी हूर ने वैसे कहा भी था, कि बच्‍चा, बहुत फुदक नहीं , तुझे बकरा या भालू बनाकर अपने पास रख लूंगी, मगर फिर पता नहीं क्‍या हुआ, मैं हूर की आंखों की जगह उसके चांदी होते बालों में अटक गया होऊंगा, या वही मुझे भूलकर अपनी बकरियां देखने निकल गई होगी, तो मोहतरमा नीलिमा, कहीं निकलने की जगह कहीं तो अटक जाता ही है आदमी.

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  5. नगरों का अपना व्यक्तित्व होता है।

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  6. नक्शा बदलता जा रहा है..

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  7. ise padhne se pahle kahu yaa baad me,lekin mujhe apna hi shahar jaha mai paidaa hua, tab ye raajdhaani nahi thi, lekin 10 saalon se hai aur ab mujhe khud hi ye shahar har dusre pal anjana sa lagne lagaa hai. aisa badlaav kyn aata hai.... shahar ko aise kaise dekhein.... ki vahi ek shahar jise aapne kya dekha tha... kyaa huaa, hota gayaa... aur fir kyaa ho raha hai.... kya hoga ye to aage ki baat hai....lekin vah shahar vahi kahan rah pata hai...

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  8. वक्त बदल रहा .......
    जमाना बदल रहा है.........

    अपनों कि भीड़ में भी ये दिल अब बेगाना है.......

    क्यों कि मेरे शहर में भीड़ अब अपनी नहीं लगती......

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  9. मुझे भी मुंबई में छितराया बॉम्बे ही दिखता है..

    आने वाले महीने में यहाँ रहते हुये तीन साल हो जायेंगे.. इस शहर से लडते लडते अब एक ’अपनापन’ सा आता जा रहा है.. अकेलेपन की लत लगती जा रही है और भागते लोगों में स्लो चलने में रस भी आ रहा है..

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  10. तुकमंदी तक पहुँचते हुए कई बार पढ़ा ऊपर का टुकड़ा...
    ....

    हवा में गिरते धूल की आवाज़ सुन पाना, शहर को यूँ देखना, वाह!

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