Wednesday, September 29, 2010

रिपोर्ट ऑन द करेंट स्‍टेट्स ऑफ़ चतुरानन..

फ़िलहाल गा रहे हैं. अभी थोड़ी देर पहले खुजा रहे थे. चतुराननजी को एकदम तेज़ी से हंसी आती है. वैसे ही जैसे एकदम तेज़ी से फिर बुखार भी चढ़ता है और सामनेवाले को चप्‍पल-चप्‍पल पीटने के लिए तरपसीना होने लगते हैं. (प्रसंगवश सूचना दी जाती है कि 'तरपसीना' शब्‍दचर्चा विद्युत-विचार संचयन की खंगाल से प्राप्‍त नहीं हुआ है, वरन एक अन्‍य होनहार ब्‍लॉगर के पराक्रमों से मान्‍यवर चतुराननश्री की सेवाओं तक पहुंचा है, जो दुर्भाग्‍यवश हिन्‍दी साहित्‍य के एमएपने से सुशोभित नहीं हो सके. हैं.) ख़ैर, बात करेंट स्‍टेटस की हो रही थी, जो बावज़ूद फेसबुक की नेकनीयती के, प्रवहमान स्थिरता को प्राप्‍त नहीं हो पा रही है. वज़ह साफ़ है कि चतुराननजी वर्तमान में (जो ऑलरेडी अतीत की डोर में बंधा, पिछड़नवस्‍था में पीछे छूटा जाता है!) बौखलाये हुए हैं. बार-बार घबराकर टीवी चैनल बदल रहे हैं (जो अपनी टुच्‍चावस्‍थाओं के दुर्योग में यूं भी कभी सम्‍भल, दहल और बहल रहे हैं. बदल तो रहे ही हैं. प्रकृति का नियम है. राजनीतिक पतन की भयकारी स्थिरता से अलग हर शै कहीं से निकलकर कहीं घुसी जा रही है. अपनी हस्‍ती में गुमे बाबू शारुख तक अब थ्री डी एनीमेशन में अपने को खोजने निकल रहे हैं, 'आल इज़ वेल' का गाना गानेवाला नायक 'पीपली लाइव' की रंगरेजी रंग रहा है. सो, ऑल इज़ नॉट वेल एंड स्‍टेबल. वहां भी तो क्‍या वो गाना था 'बहती हवा सा था हो..'

तो किसी होशियार मौकापरस्‍त बौद्धिक की ज़ुबान में कहें तो द ओन्‍ली थिंग दैट इज़ स्‍टेबल इज़ द इनस्‍टैबिलिटी. चतुराननजी के स्‍टेट्स के बारे में बात करना मतलब सिर्फ़ उनकी अस्थिरता को और प्रोवोक करना है. जबकि मुकेश का 'चल अकेला, चल अकेला, तेरा मेला पीछे छूटा राही' गाते वे थोड़ी देर पहले देखे भले गए हों, सच्‍चाई है फैसबुक ने उन्‍हें पीरहरंकर केसरीवाल के 'भारत की आवाज़' को लाइक करते हुए रजिस्‍टर न भी किया हो, यू-ट्यूब पर खोज ये और खोज वो देखकर एक्‍साइट होते ज़रुर देखा है, एंड दैट प्रूव्‍स फॉर वन्‍स एंड ऑल दैट द परसन कॉल्‍ड श्री चतुरानन इज़ नॉट इन द करेंट स्‍टेट ऑफ़ हिज़ बीइंग. मीनिंग इनस्‍पाइट ऑफ हिज़ सिंगिंग 'एकला चालो' ही इज़ नॉट इम्‍पीलिमेंटिंग इट विद मोरल विगर एंड द ट्रू आर्टिस्टिक ऑनेस्‍टी!

एंड दैट इज़ द रियल रिपोर्ट ऑन द करेंट स्‍टेट ऑफ़ नॉट ओन्‍ली सम ओब्‍स्‍क्‍यूर श्री चतुरानन, बद आफ द होल नेशन इटसेल्‍फ़. द लैक्‍ ऑफ मोरल विगर एंड (फोरगेट आर्टिस्टिक) व्‍हॉट्सोवर एनी ऑनेस्‍टी! इसलिए भी श्री चतुरानन जी की ऐसे छिछले दुराग्रही विरोधों का कोई गहरा अर्थ नहीं जिसमें किसानों के असल चित्रण के लिहाज से वह 'पीपली लाइव' को भयानक तौर पर असफल बता रहे हैं, और उसके आगे चंद क्षणों तक हौले-हौले मुस्‍करा रहे हैं. क्‍योंकि जैसे ही उन्‍हें इत्तिला दी जाती है कि फिलिम सूरतेहाल किसान का किस्‍साए-गोदान नहीं, मुल्‍क के नैतिक-पतन की कॉमिकबुक फेयरी स्‍टोरी है, बाबू चतुरानन झटके में फिर तरपसीना और छड़नगीना होने लगते हैं, और एक बार फिर उन्‍हें करेंट स्‍टेट्स की फेसबुकीय रस्‍सी में बांधना दुश्‍वार होने लगता है, भले माननीय श्री पहरेवाल इस बेीच सुरैया से 'दिले नादां तुझे हुआ क्‍या है' की आवाज़ निकलवा रहे हों, अवाम का भवदोहन करके उसे ग़लत मौके व जगह पर रुला रहे हों..

यह पाकिस्‍तानी फ़साना है, मगर ज़रा इसे सुनकर भी रोयें?

Friday, September 24, 2010

असेहजनावस्‍थाओं की सहेजनाएं..

कोई तरीका होता होगा लोग सहेजकर रखते हैं, कुछ ज़रा पसरे अंतराल पर बंबई की अपनी छोटी दुनिया में लौटा हैरतमंद हो रहा हूं मगर सच्‍चाई है मेरे पल्‍ले सहेजने की यह चतुराइयां नहीं पड़ रहीं, और ऐसा नहीं कि झोले में अंटीं चंद नई किताबों को बाहर हवा में निकाल सकुचा और शरमा रहा हूं कि पहले ही बिखरी इतनी सारी किताबों के बीच उनकी क्‍या जगह बनाऊं, अपने इस 'सकुचाने' और 'शरमाने' के इमोशन का भी ठीक मालूम नहीं कि इन्‍हें कैसे और कहां सहेजकर धरें.

और यह भी खबर है कि यह असमंजस ज़्यादा देर बना रहा तो फिर एक 'घबराहट' भी बनने व बुनने लगेगी, और फिर एक उसके सहेजने का भी काम निकल आएगा, और मैं हजारहा हाथ झटकूंगा, सहेजना उसे भी फिर होगा ही!

पता नहीं लोगों में क्‍या हूनर होता है कैसे होता है जो सहेजते रहते हैं. अच्‍छी-अच्‍छी मुश्किलों को आसानी से सहेज लेते हैं. उसके बाद हंसते भी दीखते हैं. कॉमनवेल्‍थ के आयोजकों को देखकर पूरा समाज सबक ले ही सकता है, मुझसे कुछ नाकारा ही होंगे जो मुश्किलों में मुस्‍कराने का सबक लेने की जगह ऐंठ-ऐंठकर फूटते रहते हैं. फिर उस फूटे हुए को सहेजने का काम आता है तो फटे दूध की तरह फैल जाते हैं, मतलब ऐसी किसी असहजावस्‍था में चले जाते हैं कि न खुद और न ही समाज उनसे कोई सबक ले सकता है.

विगत दो महीनों में जो चार और छै जगहें गया और ठहरा होऊंगा, रहते-रहते ऐसे मौके निकल ही आते कि सहेजने की ज़रुरत बनती और साफ़ नज़र आने लगता सहेजना असम्‍भव है. कम से कम मेरी उपस्थिति में तो है ही. फिर बनावटी हंसी का नहाना नहाने लगते. बुखार का बहाना बनाकर चेहरे पर चादर खींच लेते, या बुखार की घबराहट में ऋषिकेश टहलने निकल आते और फिर चूतियाटिक तरीके से मीलों पैदल चलकर व्‍यर्थ होते होते. मतलब कुछ भी सहेज सकने की व्‍यवस्‍था का एकदम फटा दूध हो जाता और फिर उसमें मिठाई और पकौड़ियां तली जातीं.

पता नहीं लड़कियां अपना सौन्‍दर्य और सुकुमारता कैसे सहेजे रखती हैं और सुलझे शरीफ़ लोग अपना विवेक, मैं एक ज़रा सा ड्राइंग किट अपनी संगत में लिए था, उसे सहेजना तो दूर खोलकर नज़र के सामने फैलाना तक दुश्‍वार बना रहा. बाकी चीज़ों के बीच वह कुछ इस तरह दबी, छुपी रहती जैसे बचपन की व्‍याहता कोई गंवई पत्‍नी हो जिसके उछलकर सामने आ जाने के खौफ़ में मैं हर वक़्त पीला पड़ता होऊं. साथ के छै जोड़ी कपड़ों में तीन को भी यही शिकायत है कि सारे समय हमारे साथ सौतेला बरताव किये रहे, हमसे पीठ किये जाने वो किन घरों के क्‍या कपड़े थे जिनको सिर और कांधे बिठाते फिरे!

मैं सुन नहीं रहा. क्‍या फ़ायदा इतना सब व्यर्थ सुनने का. सहेजन की सहजावस्था नहीं बनेगी, यह मेरा मन भी जानता है और असहज बना रहता है. मगर दिक्‍कत है उस असहज बने मन को भी एक पायंट के बाद सहेजने की ज़रुरत बनती है, मगर फिर, यहां इसमें कैच यह है कि इतना सुलझाव और इतनी शराफ़त झोले में मेरे अंटती नहीं, और झोला फैलने लगता है तो वह जगह मेरे लिए अंड़सने लगती है. माने कैच है मगर नो बॉल वाला है. ज़ाहिर है कुछ लोगों में टैलेंट होगा नो बॉल वाले सिचुएशन के कैचेस को भी एक सर्टेन ऑथेंटिसिटी दे देते हैं. हंसते-हंसते दौड़ लेते हैं, बिना दुबारा सोचे यहां और वहां ये और वो बकवास बोल लेते हैं, उड़ लेते हैं, मैं गिरा और घबराया होता हूं, ख़ामोशी से असहजता में अपनी असेहजनावस्‍थाओं में लौटता हूं..

कांपती खड़ी या जाने खोई, किसके जानिब सोई ज़ेबुनिस्‍सा..

मुंह पर चुन्‍नी ढांपे सोते में ज़ेबुनिस्‍सा के पोर-पोर जगे रहते और खुली आंखों लगता सामने की सूनी हवाओं से टकराकर गिर पड़ेगी.
तालिब तीन कदम की दूरी पर अपना सामान सहेज रहे थे मगर अटकी सांसों में फड़फड़ाती ज़ेबुनिस्‍सा को लगे कि बीच में बाज़ार-हाट, पहाड़ों की कैसी दुरियां हैं जो उसकी नाभि के अतल से ऐसी बेहया हूकें फूटकर हवाओं में गूंजी फिरती हैं और यह आदमी कैसा तो आदमी है जो उन बिजलियों में पिघलकर राख नहीं हुआ जाता!
तालिब होश में होते जब उन्‍हें ज़ेबुनिस्‍सा की तोतारंगी चुन्‍नी की सलवटों में बेचैनियों की दम तोड़ती कहानियों का ख़याल होता, मगर झोले में लापरवाही से कागज़ धरते तालिब मियां का मन हसीना बी की गुफ्तगू में चाय की सुड़कियां लेता बैठा था. कलकत्ते वाले ज़ाकिर मामू की बात हो रही थी या उनके साढ़ू भाई का जाने कोई तो किस्‍सा.
ज़ेबुनिस्‍सा के मन हुआ डांटकर हसीना बी के चुप करा दे, कि आप ये कहां-कहां की बकवासी बक्‍से खोलकर क्‍यों बैठ जाती हो? उबले सूरन के छिलके काढ़ रही हो, चुप्‍पै वही और सामनेवाले को उसका काम करने नहीं दे सकतीं?
मगर मन का लिखा ज़बान से छनकर बाहर आ जाये ऐसी खुशनसीबी कहां होती है. कितनी ही बार तो ज़ेबुनिस्‍सा ने ख़याल किया है कि आहट पाते ही सीढ़ियां भागती बाहर सेहन के अकेले में कहीं इन्‍हें घेरकर एकदम से मना कर दे कि आप क्‍यों आते हो, मत आया करो हमारे हियां! कितनी तो दफा ऐसे मौके बने भी हैं कि सीढ़ियां उतरते ज़ेबुनिस्‍सा को तालिब के आने की आहट हुई है, उसका घर में दाखिल होना एकदम से अपने मन के आंगन में फैलकर बिछते जाने की हक़ीक़त सा उसपर तन गया है! वैसे में फिर जाने क्‍या होता है कि ज़ेबुनिस्‍सा के कंधे पिघलते मोम सा जलने लगते हैं. पैर आंगन के खंभों सा भारी हो जाता है और ज़बान पल भर को फड़फड़ाती भले हो, हलक से एक फीका 'सलाम!' तक बाहर नहीं आ पाता..
अभी ज़रा मुद्दत पहले की तो बात है ज़ेबुनिस्‍सा खांची-खांची भर गोबर लिए छत पर उपले काढ़ आती थीं, या सलमान की उस फिल्‍म का गाना गुनगुनाती डेढ़ सेर आटा गूंथ लेतीं, और तो और तबकी वो चुन्‍नी के सिरे जाने कहां से नासपीटा जो एक तेलचिट्टा दिख गया था तो कैसे तो वह हाथ का झोला लिए-लिए सीधे छत से छलांग लगाये अंगने कूदी गिरी थीं. हंसते-हंसते हसीना बी दोहरी हुई जातीं कि ओह, एक ज़रा से जनावर के छू लेवे का अइसा खौफ, फिर कवनो मरदाना के हाथ पड़िहें तब्‍ब तो बड़ जुलूम होई जाय, जेबुनिस्‍सा दुलारिन, हैंय?
मुंह से धुआं उगलती ज़ेबुनिस्‍सा का जवाब होता, हमार दिमाग फिरा है जो हम खुद के छुवाये जईहैं कहूं!
हसीना बी के एक चाचाज़ाद भाई थे मैमून, कच्‍ची उम्र में घरवालों ने शादी कर दी थी, कच्‍ची ही उम्र में बीवी दो बच्‍चे जन कर गुजर गई थी, कोयले का चूरा बेचकर चार पैसा कमा लेते थे और बहन की हमदर्दी के आसरे उम्र के बयालिसवें साल ज़ेबुनिस्‍सा को निकाह पढ़वाकर अपने यहां लिवा लाने की उम्‍मीद पाले बैठे थे. माथे में वही तस्‍वीर होगी जो हसीना बी हंसती अपनी ननद को छेड़तीं, काहे, मैमून तोको छूहहैं नाहीं? अइसने करंट खायके भागे फिरौगी, बताव?
भौजी की बात से ज़ेबुनिस्‍सा की देह में आग दौड़ जाती. मन करता कोई धड़धड़ाती रेल आए और उसपर से गुजरकर उसका नामोनिशां खत्‍म कर दे! फिर छत के कटे हुए आसमानी हिस्‍से पर नज़र जाती जहां सरसराता आवारा उड़ता कोई पतंग दिखता और उसके उड़ने के शोर में ज़ेबुनिस्‍सा के लगता मंजा लगे तागे उसकी छाती को दायें-बायें लगातार चीरे जाते हों! अक्‍सर ऐसे में ही होता जब बाजू वाले फाटक पर तालिब मियां के गेट पर स्‍कूटर खड़ा करने की आवाज़ आती, और लगभग हमेशा ही ज़ेबुनिस्‍सा का जी करता वह किसी सूरत भागकर जाये सकीना का गला घोंट आये जिससे कि तालिब का निकाह तय हुआ था.
क्‍यों होते हैं निकाह, और होते हैं तो फिर आसमान में कोई क्‍यों छोड़ता है उडने को पतंग. और पतंग इस कदर हल्‍का होता है तो ज़िन्‍दगी क्‍यों ऐसी भारी हुई छीलती जाती है छाती? बहुत सारे सवाल होते जिन्‍हें ठीक आंचल में सजाना नहीं जानती ज़ेबुनिस्‍सा, वैसे ही जैसे अब तक हम नहीं जान पाये मौके पर हंसना, मौके पर रोना!

Monday, September 20, 2010

दैट गर्ल इन येल्‍लो बूट्स व अन्‍य ऐसी ही कोई तो स्क्रिनिंग..

पता नहीं दिल्‍ली शहर था या बिल्‍लीनगरी कोई और. झालरसजी कईरंगी हाथी की बारात थी, मेट्रो चढ़कर बस उतरकर ट्रैफिक के जगर-मगर के अधबीच मैं लहरा रहा था, शुरुआत किसी लाउडस्‍पीकर पर हुआ होगा, धुन में फंसा वन्‍दनगान गा रहा था. हवाओं को रगड़ता दबंग, रंगबाज कोई ईनोवासवार चील होगा, नज़दीक हिलगते खबर करी लोकतंत्र में आकार और आयतन को बीच-बीच में झेलना बच्‍चा, सामाजिक मजबूरी है, हथपना निभाना पड़ता है, वर्ना जानते तुम भी हो जो गा रहे हो वह मेरी ही अर्चना है; अगली और उसके बादवाली सड़क पर भी जो सुनोगे सबकहीं दिखे हाथी की खाल, मगर तराना हमारा ही होगा. अख़बार और टीवी वाले जिंगल्‍स जिससे करायें, कंटेंट मैनेजमेंट हमीसे कराते हैं, गाना हमारा ही सुनाते हैं, दैट्स द चार्म ऑफ़ द गेम.

मैं घबराया गा रहा था, अब चीख़ता सुस्‍ताने लगा, आप कौन हुए, चील भाईसाब, कैसा तो अच्‍छा सलेटीसजा ओह हमारा दुलारा अंडरडॉग हाथी, आप खामखा उसपर चिल्‍ला काला गिरा रहे हैं? अच्‍छा-खासा कान पर आईपॉड चढ़ाये भूला हुआ था झोले में तीन कमीज़ें लिए उन्‍हें धरने की जगह ढूंढ़ रहा हूं, और इस उस व किसी भी शहर जाके जगह की किल्‍लत से पार पाना नहीं ही होगा. भौतिकता में ज़रा जगह हाथ आएगी भी तो मनमनोरम की मलिनता के अन्‍य अध्‍याय खुलेंगे, स्‍वयं से विस्‍थापन के विहंगम कैनवास तन जाएंगे, बुनेंगे; अचक्‍के में दहशतज़दा हाथ-पैर भांजता रिरियाने, फिर वही मालिकगान गाने लगूंगा? कितने तो काम लगे हुए थे ओमप्रकाश दीपक का वह उपन्‍यास है 'कुछ जिंदगियां बेमतलब' के मानिंद माथे और मुंह पर, सबके नीचे से आप दरी खींच रहे हैं?

ऐंठ पैठ आत्‍मासवार चील दिखता था अब नहीं दीख रहा, धमकती मैट्रो दौड़ती है, देह पर एसी की हवा गिराये मैं बाकी में जल रहा हूं, न दिख रहे सब हिस्‍सों में पिघल रहा हूं. कविता में समय पढ़ने से हारा हुआ समय में कविता खोजता सिर धुन रहा हूं, स्‍कूल की पुरानी कापियों में इतिहास और इतिहास के पन्‍नों के हास का हिसाब कर रहा हूं, कि समय विछिन्‍न दाढ़ खुजाता देख सकूं कि अपनी सहूलियत के साधनों में यहां और वहां लोग (इधर ये उधर वे, और उसके बाजू वे, वे, वे और वो भी) समय और समाज को (गोड़, और देह के अन्‍य हिस्‍से हिलाते हुए) कैसे देख रहे हैं.

बहुरंगी अंतरंग का विस्‍थापन बजता रहता है चौबीस घंटे छिन-छिन, कान में वह नहीं गिरता शीशा कहीं किसी के.

चील की हंसी सुन पड़ती है, मैं तीन कमीज़ों को कहां, किधर धरूं की भूल चहकता हूं गुरु, हथबारात की रात के बाद हम अगला तमाशा क्‍या देखने जा रहे हैं?

Wednesday, September 15, 2010

समर क्षण..

जीवन में बहुत सारे क्षण थे. उन बहुत सारे क्षणों के बाहर फिर और क्षण थे (जिनके मापने की मशीन होती और माप को डेटाबंद करने का विज्ञान, और फिर उस विज्ञान की नौकरी पर अपना रोज़मर्रा जीनेवालों के जीवन में ऐसे ही और अन्‍य होते, क्षण. चुपचाप चले आते. या खोये-खोये झरते होते).

समर गलियारे की दीवार पर ढलती दोपहरी की गिरती रौशनियों को निरखता सोचता अच्‍छा, यह मेरे देखे, जिये के क्षण हुए.

जैसे कटे नाखून, कांधे की फुंसी, मसूड़े की सूजन, धूप में जलते लोहे से नंगी पिंडली का रगड़ खा जाना, खौलती चाय को हड़बड़ में गैस से हटा लेने की कोशिश में हाथ का जल जाना जीने के अन्‍य क्षण हुए होते.

क्‍लास से बाहर गलियारों में घूमते, चुपचाप कैंटीन में बैठे किसी दोस्‍त या एक गिलास पानी का इंतज़ार करना व ऐसी ही जाने कितनी दूसरी चुपचाप की चुप्पियां भी जिये की अर्थवत्‍ता के क्षण ही होते?

एक मर्तबा समर दोमंजिले की बालकनी से गिर पड़ा था. दरअसल समर के जीवन में चार ऐसे मौके रहे हैं जब वह अलग-अलग ऊंचाइयों से गिरा- मैं गिर रहा हूं जैसा महसूस करता गिरा- है, उन सबकी जीवन के सकारथ क्षणों में गिनती होगी?.. समर नहीं जानता.

क्षण और उसे डेटाबंद करके विज्ञान की तरह बरतनेवाले जानते हों तो भी चुप हैं..

भूरी काली मिट्टी से कूदकर एक हरा मेंढक गंदले पानी के पोखर में छलांग लगाता है. मेंढक के जीवन में उमगन व निस्‍पृहावस्‍था में छलांग लगाने के अगढ़, परिमार्जित दोनों ही तरह के किंतु अनगिन क्षण हैं, अलबत्‍ता उनकी व्‍यवस्‍था बनाने की उसमें सूझ नहीं. मेंढक की जुबान समझनेवाला कोई विज्ञानी होता तो उसके जवाब में संभवत: मेंढक टर्राता जवाब देता अच्‍छा है, मैं मेंढक ही हुआ.

सुनिधि भी छिनकती, छिनकने के क्षणों वाली सुनिधि बनी, रिक्‍शे से उतरती है, कि आईंदा फिर कभी बक्‍सेवाली गली से रिक्‍शा नहीं पकडेगी, और पकड़ेगी तो इस पतली मूंछवाले के रिक्‍शे पर तो नहीं ही चढेगी. मगर बक्‍सेवाली गली के रिक्‍शे से घर लौटने की अप्रीतिकरता के मौके भी सुनिधि के जीवन में कितने हुए. जैसे छोटे मौसा के छप्‍पन नंबर बस में चढ़कर पूरे रास्‍ते फिर कूढ़ते रहने के मौके.

अंधेरे में आंख खोले आत्‍महत्‍या की सोचते रहने के क्षणों का एक ख़ामोश अंतरंग, गुप्‍त संसार होता.

वैसे ही जैसे मिठाई या जीभ पर खटाईपड़े चटनी की विशिष्‍ट खटास का. इमली के पानी और कूटे हुए मिरचे के तीते का.

सूखे बालों में कंघी के रगड़ने, आईने में दांत निकालकर हंसने, या पेड़ के तने को निशाना बनाकर पेशाब करने के फिर अलग से ही क्षण होते.

मतलब ऐसे बहुत क्षण होते जब समर जीवन के बिखरे क्षणों की सोचता, अलबत्‍ता उन्‍हें मतलब में बुनकर समझ के करीने में गूंथ लेने का ख़याल सोचते ही उसके पसीने छूटने लगते. पसीने छूटने के जीवन में ढेरों क्षण होते, उनका विशिष्‍ट राजनीतिक महत्‍व समझ आ जाये, ऐसे क्षण तो विरले ही होते..

Monday, September 13, 2010

ला पेतीत बोहेमियें.. और दो लड़ाकिनियां, ऑलमोस्‍ट बिल्लियां ही, ऑन सम हॉट टीन रूफ..


झींक के, गाल बजाके, नज़र चुरा के, महटिया के, मान लें कि सामाजिक सौजन्‍यता की दूकान से हम हाथ झुलाये टहलकर लौट आने वाले हुए. सो सिगरेट खरीदने और गोड़ ढीला करने बेहया, बे-हवा की गुड़गांवी सांझ की धूप में बाहर निकलें, बकिया पंखे की हवा के नीचे के सीमेंटेड घास पर लेटे रहें, सोचते ओह, कैसे तो हम बोहेमियन हुए. भीतर-भीतर हौंड़ाये लगता रहे कि तसल्‍ली में पड़े हैं, आंखों को मूंदते ही दुनिया और उसमें अपने होने की एक तस्‍वीर बुन जाएगी; आश्‍वस्‍त हो लेंगे, और धीमे-धीमे सरकता एक दिन अपनी उदासियों में सिहर, हौले-हौले फिर वह भी गुज़र ही जाएगा.
मुंदी आंखों वाले देह पर न दिख रही बिल्लियां दौड़ती, ऊधम बिखेरती होंगी. जाने किन गजनों के जले बालों में खुर फंसातीं, पलकों पर नेह के नाखुन चलातीं, पूछतीं मासूमियत से सपना देखते हो? सपनों में क्‍या दिखता है, तोपखां? मैं कहूं हटो, हटो, बिल्लियां तो हंसती बेग़ैरत जवाब दें, ह: ह: ह:, आंखें तुम्‍हारी चबा जायें, कलाकार? ऑर समथिंग ऑव दैट सॉर्ट?
बिल्लियों से जिरह की फिर सूझे मेरे पास भाषा नहीं है, न सलीके से उनसे सुलट लेने का उत्‍कट उत्‍साही हौसला. बिल्लियां शायद वहां हैं भी नहीं जहां मैं अपने पलकों को कांटागड़ा पा रहा हूं, वह कुछ और ही है जो अचेतन के अबूझघामों के खंभे नोंचता, नाचता फिरता है.
चप्‍पल कहीं गिरे होंगे लाइटर कहीं, हम गिरे अपने सिरों में सोचते पेतीत बोहेमियनपने के और क्‍या कैसे आभूषण गढ़ लें. कि निकल जायें बाहर, एक और सिगरेट की तरह जल लें.
और नीचे यह लड़नियां पॉडकास्‍ट है, ज़रा नैतिकताओं, स्‍पीड और स्‍वर-प्रोसेसिंग के सेंसरों से होता, आया जाता है..

Wednesday, September 1, 2010

लहकियां: बस ज़रा सी लहरायी हुई..





(स्‍केच को बड़ाकार देखने के लिए कृपया उन्‍हें चटकाकर अलग पृष्‍ठ में खोलें.)