
झींक के, गाल बजाके, नज़र चुरा के, महटिया के, मान लें कि सामाजिक सौजन्यता की दूकान से हम हाथ झुलाये टहलकर लौट आने वाले हुए. सो सिगरेट खरीदने और गोड़ ढीला करने बेहया, बे-हवा की गुड़गांवी सांझ की धूप में बाहर निकलें, बकिया पंखे की हवा के नीचे के सीमेंटेड घास पर लेटे रहें, सोचते ओह, कैसे तो हम बोहेमियन हुए. भीतर-भीतर हौंड़ाये लगता रहे कि तसल्ली में पड़े हैं, आंखों को मूंदते ही दुनिया और उसमें अपने होने की एक तस्वीर बुन जाएगी; आश्वस्त हो लेंगे, और धीमे-धीमे सरकता एक दिन अपनी उदासियों में सिहर, हौले-हौले फिर वह भी गुज़र ही जाएगा.
मुंदी आंखों वाले देह पर न दिख रही बिल्लियां दौड़ती, ऊधम बिखेरती होंगी. जाने किन गजनों के जले बालों में खुर फंसातीं, पलकों पर नेह के नाखुन चलातीं, पूछतीं मासूमियत से सपना देखते हो? सपनों में क्या दिखता है, तोपखां? मैं कहूं हटो, हटो, बिल्लियां तो हंसती बेग़ैरत जवाब दें, ह: ह: ह:, आंखें तुम्हारी चबा जायें, कलाकार? ऑर समथिंग ऑव दैट सॉर्ट?
बिल्लियों से जिरह की फिर सूझे मेरे पास भाषा नहीं है, न सलीके से उनसे सुलट लेने का उत्कट उत्साही हौसला. बिल्लियां शायद वहां हैं भी नहीं जहां मैं अपने पलकों को कांटागड़ा पा रहा हूं, वह कुछ और ही है जो अचेतन के अबूझघामों के खंभे नोंचता, नाचता फिरता है.
चप्पल कहीं गिरे होंगे लाइटर कहीं, हम गिरे अपने सिरों में सोचते पेतीत बोहेमियनपने के और क्या कैसे आभूषण गढ़ लें. कि निकल जायें बाहर, एक और सिगरेट की तरह जल लें.
और नीचे यह लड़नियां पॉडकास्ट है, ज़रा नैतिकताओं, स्पीड और स्वर-प्रोसेसिंग के सेंसरों से होता, आया जाता है..