Wednesday, September 15, 2010

समर क्षण..

जीवन में बहुत सारे क्षण थे. उन बहुत सारे क्षणों के बाहर फिर और क्षण थे (जिनके मापने की मशीन होती और माप को डेटाबंद करने का विज्ञान, और फिर उस विज्ञान की नौकरी पर अपना रोज़मर्रा जीनेवालों के जीवन में ऐसे ही और अन्‍य होते, क्षण. चुपचाप चले आते. या खोये-खोये झरते होते).

समर गलियारे की दीवार पर ढलती दोपहरी की गिरती रौशनियों को निरखता सोचता अच्‍छा, यह मेरे देखे, जिये के क्षण हुए.

जैसे कटे नाखून, कांधे की फुंसी, मसूड़े की सूजन, धूप में जलते लोहे से नंगी पिंडली का रगड़ खा जाना, खौलती चाय को हड़बड़ में गैस से हटा लेने की कोशिश में हाथ का जल जाना जीने के अन्‍य क्षण हुए होते.

क्‍लास से बाहर गलियारों में घूमते, चुपचाप कैंटीन में बैठे किसी दोस्‍त या एक गिलास पानी का इंतज़ार करना व ऐसी ही जाने कितनी दूसरी चुपचाप की चुप्पियां भी जिये की अर्थवत्‍ता के क्षण ही होते?

एक मर्तबा समर दोमंजिले की बालकनी से गिर पड़ा था. दरअसल समर के जीवन में चार ऐसे मौके रहे हैं जब वह अलग-अलग ऊंचाइयों से गिरा- मैं गिर रहा हूं जैसा महसूस करता गिरा- है, उन सबकी जीवन के सकारथ क्षणों में गिनती होगी?.. समर नहीं जानता.

क्षण और उसे डेटाबंद करके विज्ञान की तरह बरतनेवाले जानते हों तो भी चुप हैं..

भूरी काली मिट्टी से कूदकर एक हरा मेंढक गंदले पानी के पोखर में छलांग लगाता है. मेंढक के जीवन में उमगन व निस्‍पृहावस्‍था में छलांग लगाने के अगढ़, परिमार्जित दोनों ही तरह के किंतु अनगिन क्षण हैं, अलबत्‍ता उनकी व्‍यवस्‍था बनाने की उसमें सूझ नहीं. मेंढक की जुबान समझनेवाला कोई विज्ञानी होता तो उसके जवाब में संभवत: मेंढक टर्राता जवाब देता अच्‍छा है, मैं मेंढक ही हुआ.

सुनिधि भी छिनकती, छिनकने के क्षणों वाली सुनिधि बनी, रिक्‍शे से उतरती है, कि आईंदा फिर कभी बक्‍सेवाली गली से रिक्‍शा नहीं पकडेगी, और पकड़ेगी तो इस पतली मूंछवाले के रिक्‍शे पर तो नहीं ही चढेगी. मगर बक्‍सेवाली गली के रिक्‍शे से घर लौटने की अप्रीतिकरता के मौके भी सुनिधि के जीवन में कितने हुए. जैसे छोटे मौसा के छप्‍पन नंबर बस में चढ़कर पूरे रास्‍ते फिर कूढ़ते रहने के मौके.

अंधेरे में आंख खोले आत्‍महत्‍या की सोचते रहने के क्षणों का एक ख़ामोश अंतरंग, गुप्‍त संसार होता.

वैसे ही जैसे मिठाई या जीभ पर खटाईपड़े चटनी की विशिष्‍ट खटास का. इमली के पानी और कूटे हुए मिरचे के तीते का.

सूखे बालों में कंघी के रगड़ने, आईने में दांत निकालकर हंसने, या पेड़ के तने को निशाना बनाकर पेशाब करने के फिर अलग से ही क्षण होते.

मतलब ऐसे बहुत क्षण होते जब समर जीवन के बिखरे क्षणों की सोचता, अलबत्‍ता उन्‍हें मतलब में बुनकर समझ के करीने में गूंथ लेने का ख़याल सोचते ही उसके पसीने छूटने लगते. पसीने छूटने के जीवन में ढेरों क्षण होते, उनका विशिष्‍ट राजनीतिक महत्‍व समझ आ जाये, ऐसे क्षण तो विरले ही होते..

4 comments:

  1. @अभय,
    तकिये पर कुहनी गड़ाये सोच का एक क्षण भर हो्गा. या थोड़े से क्षण.

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  2. वाक़ई बड़ा ख़ूबसूरत तुमार बाँधा है! शुक्रिया, प्रमोद जी...ज़ोरे-क़लम और कुछ ज़ियादा!

    रविकान्त

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  3. @शुक्रिया रवि.

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