Monday, September 20, 2010

दैट गर्ल इन येल्‍लो बूट्स व अन्‍य ऐसी ही कोई तो स्क्रिनिंग..

पता नहीं दिल्‍ली शहर था या बिल्‍लीनगरी कोई और. झालरसजी कईरंगी हाथी की बारात थी, मेट्रो चढ़कर बस उतरकर ट्रैफिक के जगर-मगर के अधबीच मैं लहरा रहा था, शुरुआत किसी लाउडस्‍पीकर पर हुआ होगा, धुन में फंसा वन्‍दनगान गा रहा था. हवाओं को रगड़ता दबंग, रंगबाज कोई ईनोवासवार चील होगा, नज़दीक हिलगते खबर करी लोकतंत्र में आकार और आयतन को बीच-बीच में झेलना बच्‍चा, सामाजिक मजबूरी है, हथपना निभाना पड़ता है, वर्ना जानते तुम भी हो जो गा रहे हो वह मेरी ही अर्चना है; अगली और उसके बादवाली सड़क पर भी जो सुनोगे सबकहीं दिखे हाथी की खाल, मगर तराना हमारा ही होगा. अख़बार और टीवी वाले जिंगल्‍स जिससे करायें, कंटेंट मैनेजमेंट हमीसे कराते हैं, गाना हमारा ही सुनाते हैं, दैट्स द चार्म ऑफ़ द गेम.

मैं घबराया गा रहा था, अब चीख़ता सुस्‍ताने लगा, आप कौन हुए, चील भाईसाब, कैसा तो अच्‍छा सलेटीसजा ओह हमारा दुलारा अंडरडॉग हाथी, आप खामखा उसपर चिल्‍ला काला गिरा रहे हैं? अच्‍छा-खासा कान पर आईपॉड चढ़ाये भूला हुआ था झोले में तीन कमीज़ें लिए उन्‍हें धरने की जगह ढूंढ़ रहा हूं, और इस उस व किसी भी शहर जाके जगह की किल्‍लत से पार पाना नहीं ही होगा. भौतिकता में ज़रा जगह हाथ आएगी भी तो मनमनोरम की मलिनता के अन्‍य अध्‍याय खुलेंगे, स्‍वयं से विस्‍थापन के विहंगम कैनवास तन जाएंगे, बुनेंगे; अचक्‍के में दहशतज़दा हाथ-पैर भांजता रिरियाने, फिर वही मालिकगान गाने लगूंगा? कितने तो काम लगे हुए थे ओमप्रकाश दीपक का वह उपन्‍यास है 'कुछ जिंदगियां बेमतलब' के मानिंद माथे और मुंह पर, सबके नीचे से आप दरी खींच रहे हैं?

ऐंठ पैठ आत्‍मासवार चील दिखता था अब नहीं दीख रहा, धमकती मैट्रो दौड़ती है, देह पर एसी की हवा गिराये मैं बाकी में जल रहा हूं, न दिख रहे सब हिस्‍सों में पिघल रहा हूं. कविता में समय पढ़ने से हारा हुआ समय में कविता खोजता सिर धुन रहा हूं, स्‍कूल की पुरानी कापियों में इतिहास और इतिहास के पन्‍नों के हास का हिसाब कर रहा हूं, कि समय विछिन्‍न दाढ़ खुजाता देख सकूं कि अपनी सहूलियत के साधनों में यहां और वहां लोग (इधर ये उधर वे, और उसके बाजू वे, वे, वे और वो भी) समय और समाज को (गोड़, और देह के अन्‍य हिस्‍से हिलाते हुए) कैसे देख रहे हैं.

बहुरंगी अंतरंग का विस्‍थापन बजता रहता है चौबीस घंटे छिन-छिन, कान में वह नहीं गिरता शीशा कहीं किसी के.

चील की हंसी सुन पड़ती है, मैं तीन कमीज़ों को कहां, किधर धरूं की भूल चहकता हूं गुरु, हथबारात की रात के बाद हम अगला तमाशा क्‍या देखने जा रहे हैं?

6 comments:

  1. पता नहीं दिल्‍ली शहर था या बिल्‍लीनगरी कोई और. झालरसजी कईरंगी हाथी की बारात थी


    और इसी बरात के बाराती अपन है.... यहाँ वहाँ खीज उतारते रहते हैं.


    अपनी सवेदनाओ को अच्छी अभियक्ति दी है आपने. साधुवाद.

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  2. चकाचक !
    वैसे येल्लो बूट वाली फिल्म का हमें भी इंतज़ार है

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  3. गुरु, हथबारात की रात के बाद हम अगला तमाशा क्‍या देखने जा रहे हैं?

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  4. बढ़िया गद्यांश ।

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  5. पिछली बार तो शब्द चर्चा के जरिये थोडा कुछ सर के पास से गुज़रा था.. आज लग रहा है कि हमारी हाईट कम पड गयी है.. :)

    सारे शब्दों में एक उमगन दिखी.. सबसे मिल लिया.. सबसे अच्छे से ’अचक्के’ से मिला.. और सबसे मिलने के बावजूद अंत में यही रह जाता है कि जैसे कुछ था जो मुझ तक नहीं पहुंचा.. या कोई ऎसी बात जो ये सारे शब्द मुझसे छुपा ले गये..

    *ऊपर लिखने के बाद अभी अभी ’अचक्के’ को गूगल किया तो वो बाबा भी आप तक ही चहुँपाते हैं..

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  6. @पंकज, क्‍या करोगे, लिखना बंद करवाओगे?

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