Friday, September 24, 2010

कांपती खड़ी या जाने खोई, किसके जानिब सोई ज़ेबुनिस्‍सा..

मुंह पर चुन्‍नी ढांपे सोते में ज़ेबुनिस्‍सा के पोर-पोर जगे रहते और खुली आंखों लगता सामने की सूनी हवाओं से टकराकर गिर पड़ेगी.
तालिब तीन कदम की दूरी पर अपना सामान सहेज रहे थे मगर अटकी सांसों में फड़फड़ाती ज़ेबुनिस्‍सा को लगे कि बीच में बाज़ार-हाट, पहाड़ों की कैसी दुरियां हैं जो उसकी नाभि के अतल से ऐसी बेहया हूकें फूटकर हवाओं में गूंजी फिरती हैं और यह आदमी कैसा तो आदमी है जो उन बिजलियों में पिघलकर राख नहीं हुआ जाता!
तालिब होश में होते जब उन्‍हें ज़ेबुनिस्‍सा की तोतारंगी चुन्‍नी की सलवटों में बेचैनियों की दम तोड़ती कहानियों का ख़याल होता, मगर झोले में लापरवाही से कागज़ धरते तालिब मियां का मन हसीना बी की गुफ्तगू में चाय की सुड़कियां लेता बैठा था. कलकत्ते वाले ज़ाकिर मामू की बात हो रही थी या उनके साढ़ू भाई का जाने कोई तो किस्‍सा.
ज़ेबुनिस्‍सा के मन हुआ डांटकर हसीना बी के चुप करा दे, कि आप ये कहां-कहां की बकवासी बक्‍से खोलकर क्‍यों बैठ जाती हो? उबले सूरन के छिलके काढ़ रही हो, चुप्‍पै वही और सामनेवाले को उसका काम करने नहीं दे सकतीं?
मगर मन का लिखा ज़बान से छनकर बाहर आ जाये ऐसी खुशनसीबी कहां होती है. कितनी ही बार तो ज़ेबुनिस्‍सा ने ख़याल किया है कि आहट पाते ही सीढ़ियां भागती बाहर सेहन के अकेले में कहीं इन्‍हें घेरकर एकदम से मना कर दे कि आप क्‍यों आते हो, मत आया करो हमारे हियां! कितनी तो दफा ऐसे मौके बने भी हैं कि सीढ़ियां उतरते ज़ेबुनिस्‍सा को तालिब के आने की आहट हुई है, उसका घर में दाखिल होना एकदम से अपने मन के आंगन में फैलकर बिछते जाने की हक़ीक़त सा उसपर तन गया है! वैसे में फिर जाने क्‍या होता है कि ज़ेबुनिस्‍सा के कंधे पिघलते मोम सा जलने लगते हैं. पैर आंगन के खंभों सा भारी हो जाता है और ज़बान पल भर को फड़फड़ाती भले हो, हलक से एक फीका 'सलाम!' तक बाहर नहीं आ पाता..
अभी ज़रा मुद्दत पहले की तो बात है ज़ेबुनिस्‍सा खांची-खांची भर गोबर लिए छत पर उपले काढ़ आती थीं, या सलमान की उस फिल्‍म का गाना गुनगुनाती डेढ़ सेर आटा गूंथ लेतीं, और तो और तबकी वो चुन्‍नी के सिरे जाने कहां से नासपीटा जो एक तेलचिट्टा दिख गया था तो कैसे तो वह हाथ का झोला लिए-लिए सीधे छत से छलांग लगाये अंगने कूदी गिरी थीं. हंसते-हंसते हसीना बी दोहरी हुई जातीं कि ओह, एक ज़रा से जनावर के छू लेवे का अइसा खौफ, फिर कवनो मरदाना के हाथ पड़िहें तब्‍ब तो बड़ जुलूम होई जाय, जेबुनिस्‍सा दुलारिन, हैंय?
मुंह से धुआं उगलती ज़ेबुनिस्‍सा का जवाब होता, हमार दिमाग फिरा है जो हम खुद के छुवाये जईहैं कहूं!
हसीना बी के एक चाचाज़ाद भाई थे मैमून, कच्‍ची उम्र में घरवालों ने शादी कर दी थी, कच्‍ची ही उम्र में बीवी दो बच्‍चे जन कर गुजर गई थी, कोयले का चूरा बेचकर चार पैसा कमा लेते थे और बहन की हमदर्दी के आसरे उम्र के बयालिसवें साल ज़ेबुनिस्‍सा को निकाह पढ़वाकर अपने यहां लिवा लाने की उम्‍मीद पाले बैठे थे. माथे में वही तस्‍वीर होगी जो हसीना बी हंसती अपनी ननद को छेड़तीं, काहे, मैमून तोको छूहहैं नाहीं? अइसने करंट खायके भागे फिरौगी, बताव?
भौजी की बात से ज़ेबुनिस्‍सा की देह में आग दौड़ जाती. मन करता कोई धड़धड़ाती रेल आए और उसपर से गुजरकर उसका नामोनिशां खत्‍म कर दे! फिर छत के कटे हुए आसमानी हिस्‍से पर नज़र जाती जहां सरसराता आवारा उड़ता कोई पतंग दिखता और उसके उड़ने के शोर में ज़ेबुनिस्‍सा के लगता मंजा लगे तागे उसकी छाती को दायें-बायें लगातार चीरे जाते हों! अक्‍सर ऐसे में ही होता जब बाजू वाले फाटक पर तालिब मियां के गेट पर स्‍कूटर खड़ा करने की आवाज़ आती, और लगभग हमेशा ही ज़ेबुनिस्‍सा का जी करता वह किसी सूरत भागकर जाये सकीना का गला घोंट आये जिससे कि तालिब का निकाह तय हुआ था.
क्‍यों होते हैं निकाह, और होते हैं तो फिर आसमान में कोई क्‍यों छोड़ता है उडने को पतंग. और पतंग इस कदर हल्‍का होता है तो ज़िन्‍दगी क्‍यों ऐसी भारी हुई छीलती जाती है छाती? बहुत सारे सवाल होते जिन्‍हें ठीक आंचल में सजाना नहीं जानती ज़ेबुनिस्‍सा, वैसे ही जैसे अब तक हम नहीं जान पाये मौके पर हंसना, मौके पर रोना!

2 comments:

  1. ज़ेबुनिस्‍सा के एकांत मन के कोने में दुबक कर बैठे उन भावनाओं के कबूतरों को छूकर एहसाये मेरे हाथ अभी वापस शरीर में मालूम होते हैं.....

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  2. इसे सही शीर्षक दिया है ।

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