Wednesday, September 29, 2010

रिपोर्ट ऑन द करेंट स्‍टेट्स ऑफ़ चतुरानन..

फ़िलहाल गा रहे हैं. अभी थोड़ी देर पहले खुजा रहे थे. चतुराननजी को एकदम तेज़ी से हंसी आती है. वैसे ही जैसे एकदम तेज़ी से फिर बुखार भी चढ़ता है और सामनेवाले को चप्‍पल-चप्‍पल पीटने के लिए तरपसीना होने लगते हैं. (प्रसंगवश सूचना दी जाती है कि 'तरपसीना' शब्‍दचर्चा विद्युत-विचार संचयन की खंगाल से प्राप्‍त नहीं हुआ है, वरन एक अन्‍य होनहार ब्‍लॉगर के पराक्रमों से मान्‍यवर चतुराननश्री की सेवाओं तक पहुंचा है, जो दुर्भाग्‍यवश हिन्‍दी साहित्‍य के एमएपने से सुशोभित नहीं हो सके. हैं.) ख़ैर, बात करेंट स्‍टेटस की हो रही थी, जो बावज़ूद फेसबुक की नेकनीयती के, प्रवहमान स्थिरता को प्राप्‍त नहीं हो पा रही है. वज़ह साफ़ है कि चतुराननजी वर्तमान में (जो ऑलरेडी अतीत की डोर में बंधा, पिछड़नवस्‍था में पीछे छूटा जाता है!) बौखलाये हुए हैं. बार-बार घबराकर टीवी चैनल बदल रहे हैं (जो अपनी टुच्‍चावस्‍थाओं के दुर्योग में यूं भी कभी सम्‍भल, दहल और बहल रहे हैं. बदल तो रहे ही हैं. प्रकृति का नियम है. राजनीतिक पतन की भयकारी स्थिरता से अलग हर शै कहीं से निकलकर कहीं घुसी जा रही है. अपनी हस्‍ती में गुमे बाबू शारुख तक अब थ्री डी एनीमेशन में अपने को खोजने निकल रहे हैं, 'आल इज़ वेल' का गाना गानेवाला नायक 'पीपली लाइव' की रंगरेजी रंग रहा है. सो, ऑल इज़ नॉट वेल एंड स्‍टेबल. वहां भी तो क्‍या वो गाना था 'बहती हवा सा था हो..'

तो किसी होशियार मौकापरस्‍त बौद्धिक की ज़ुबान में कहें तो द ओन्‍ली थिंग दैट इज़ स्‍टेबल इज़ द इनस्‍टैबिलिटी. चतुराननजी के स्‍टेट्स के बारे में बात करना मतलब सिर्फ़ उनकी अस्थिरता को और प्रोवोक करना है. जबकि मुकेश का 'चल अकेला, चल अकेला, तेरा मेला पीछे छूटा राही' गाते वे थोड़ी देर पहले देखे भले गए हों, सच्‍चाई है फैसबुक ने उन्‍हें पीरहरंकर केसरीवाल के 'भारत की आवाज़' को लाइक करते हुए रजिस्‍टर न भी किया हो, यू-ट्यूब पर खोज ये और खोज वो देखकर एक्‍साइट होते ज़रुर देखा है, एंड दैट प्रूव्‍स फॉर वन्‍स एंड ऑल दैट द परसन कॉल्‍ड श्री चतुरानन इज़ नॉट इन द करेंट स्‍टेट ऑफ़ हिज़ बीइंग. मीनिंग इनस्‍पाइट ऑफ हिज़ सिंगिंग 'एकला चालो' ही इज़ नॉट इम्‍पीलिमेंटिंग इट विद मोरल विगर एंड द ट्रू आर्टिस्टिक ऑनेस्‍टी!

एंड दैट इज़ द रियल रिपोर्ट ऑन द करेंट स्‍टेट ऑफ़ नॉट ओन्‍ली सम ओब्‍स्‍क्‍यूर श्री चतुरानन, बद आफ द होल नेशन इटसेल्‍फ़. द लैक्‍ ऑफ मोरल विगर एंड (फोरगेट आर्टिस्टिक) व्‍हॉट्सोवर एनी ऑनेस्‍टी! इसलिए भी श्री चतुरानन जी की ऐसे छिछले दुराग्रही विरोधों का कोई गहरा अर्थ नहीं जिसमें किसानों के असल चित्रण के लिहाज से वह 'पीपली लाइव' को भयानक तौर पर असफल बता रहे हैं, और उसके आगे चंद क्षणों तक हौले-हौले मुस्‍करा रहे हैं. क्‍योंकि जैसे ही उन्‍हें इत्तिला दी जाती है कि फिलिम सूरतेहाल किसान का किस्‍साए-गोदान नहीं, मुल्‍क के नैतिक-पतन की कॉमिकबुक फेयरी स्‍टोरी है, बाबू चतुरानन झटके में फिर तरपसीना और छड़नगीना होने लगते हैं, और एक बार फिर उन्‍हें करेंट स्‍टेट्स की फेसबुकीय रस्‍सी में बांधना दुश्‍वार होने लगता है, भले माननीय श्री पहरेवाल इस बेीच सुरैया से 'दिले नादां तुझे हुआ क्‍या है' की आवाज़ निकलवा रहे हों, अवाम का भवदोहन करके उसे ग़लत मौके व जगह पर रुला रहे हों..

यह पाकिस्‍तानी फ़साना है, मगर ज़रा इसे सुनकर भी रोयें?

1 comment:

  1. और क्या कर सकते हैं चतुरानन जी ।

    ReplyDelete