Friday, September 24, 2010

असेहजनावस्‍थाओं की सहेजनाएं..

कोई तरीका होता होगा लोग सहेजकर रखते हैं, कुछ ज़रा पसरे अंतराल पर बंबई की अपनी छोटी दुनिया में लौटा हैरतमंद हो रहा हूं मगर सच्‍चाई है मेरे पल्‍ले सहेजने की यह चतुराइयां नहीं पड़ रहीं, और ऐसा नहीं कि झोले में अंटीं चंद नई किताबों को बाहर हवा में निकाल सकुचा और शरमा रहा हूं कि पहले ही बिखरी इतनी सारी किताबों के बीच उनकी क्‍या जगह बनाऊं, अपने इस 'सकुचाने' और 'शरमाने' के इमोशन का भी ठीक मालूम नहीं कि इन्‍हें कैसे और कहां सहेजकर धरें.

और यह भी खबर है कि यह असमंजस ज़्यादा देर बना रहा तो फिर एक 'घबराहट' भी बनने व बुनने लगेगी, और फिर एक उसके सहेजने का भी काम निकल आएगा, और मैं हजारहा हाथ झटकूंगा, सहेजना उसे भी फिर होगा ही!

पता नहीं लोगों में क्‍या हूनर होता है कैसे होता है जो सहेजते रहते हैं. अच्‍छी-अच्‍छी मुश्किलों को आसानी से सहेज लेते हैं. उसके बाद हंसते भी दीखते हैं. कॉमनवेल्‍थ के आयोजकों को देखकर पूरा समाज सबक ले ही सकता है, मुझसे कुछ नाकारा ही होंगे जो मुश्किलों में मुस्‍कराने का सबक लेने की जगह ऐंठ-ऐंठकर फूटते रहते हैं. फिर उस फूटे हुए को सहेजने का काम आता है तो फटे दूध की तरह फैल जाते हैं, मतलब ऐसी किसी असहजावस्‍था में चले जाते हैं कि न खुद और न ही समाज उनसे कोई सबक ले सकता है.

विगत दो महीनों में जो चार और छै जगहें गया और ठहरा होऊंगा, रहते-रहते ऐसे मौके निकल ही आते कि सहेजने की ज़रुरत बनती और साफ़ नज़र आने लगता सहेजना असम्‍भव है. कम से कम मेरी उपस्थिति में तो है ही. फिर बनावटी हंसी का नहाना नहाने लगते. बुखार का बहाना बनाकर चेहरे पर चादर खींच लेते, या बुखार की घबराहट में ऋषिकेश टहलने निकल आते और फिर चूतियाटिक तरीके से मीलों पैदल चलकर व्‍यर्थ होते होते. मतलब कुछ भी सहेज सकने की व्‍यवस्‍था का एकदम फटा दूध हो जाता और फिर उसमें मिठाई और पकौड़ियां तली जातीं.

पता नहीं लड़कियां अपना सौन्‍दर्य और सुकुमारता कैसे सहेजे रखती हैं और सुलझे शरीफ़ लोग अपना विवेक, मैं एक ज़रा सा ड्राइंग किट अपनी संगत में लिए था, उसे सहेजना तो दूर खोलकर नज़र के सामने फैलाना तक दुश्‍वार बना रहा. बाकी चीज़ों के बीच वह कुछ इस तरह दबी, छुपी रहती जैसे बचपन की व्‍याहता कोई गंवई पत्‍नी हो जिसके उछलकर सामने आ जाने के खौफ़ में मैं हर वक़्त पीला पड़ता होऊं. साथ के छै जोड़ी कपड़ों में तीन को भी यही शिकायत है कि सारे समय हमारे साथ सौतेला बरताव किये रहे, हमसे पीठ किये जाने वो किन घरों के क्‍या कपड़े थे जिनको सिर और कांधे बिठाते फिरे!

मैं सुन नहीं रहा. क्‍या फ़ायदा इतना सब व्यर्थ सुनने का. सहेजन की सहजावस्था नहीं बनेगी, यह मेरा मन भी जानता है और असहज बना रहता है. मगर दिक्‍कत है उस असहज बने मन को भी एक पायंट के बाद सहेजने की ज़रुरत बनती है, मगर फिर, यहां इसमें कैच यह है कि इतना सुलझाव और इतनी शराफ़त झोले में मेरे अंटती नहीं, और झोला फैलने लगता है तो वह जगह मेरे लिए अंड़सने लगती है. माने कैच है मगर नो बॉल वाला है. ज़ाहिर है कुछ लोगों में टैलेंट होगा नो बॉल वाले सिचुएशन के कैचेस को भी एक सर्टेन ऑथेंटिसिटी दे देते हैं. हंसते-हंसते दौड़ लेते हैं, बिना दुबारा सोचे यहां और वहां ये और वो बकवास बोल लेते हैं, उड़ लेते हैं, मैं गिरा और घबराया होता हूं, ख़ामोशी से असहजता में अपनी असेहजनावस्‍थाओं में लौटता हूं..

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