Thursday, October 28, 2010

लतीफ़ा..



कौन जानता किसे मालूम धुंधलके की यह दीवार कभी धंसेगी, भटकता किसी दिन जो पहुंच ही गया तब भी क्‍या ख़बर दीवार के पार तुम हाथ हिलाते, मुस्‍कराते मिलोगे ही?

छू लोगे गाल पूछोगे हाल, और मैं एकदम से लजाता, घबराता बुदबुदाने लगूंगा कि हाल के बारे में हम किसी और दिन बात नहीं कर सकते, आज सिर्फ़ एक लतीफ़ा सुनाता बनूं?

और फिर जैसाकि ऐसे मौकों पर होता, हमेशा होता है, लतीफ़ा एकदम याद नहीं आयेगा, झेंप छुपाने को मैं हंसने लगूंगा, और मेरी तक़लीफ़ बढ़ाने को तुम मुस्‍कराने, कि अच्‍छा है बिना लतीफ़े के भी हम हंस रहे हैं.

मैं हंसता अकुलाया कहूंगा मगर दोस्‍त, हम फंसे हुए हैं. धुंध का यह कैसा गहरा है साहित्‍य है समाज है, हमारे समय का कैसा अनसुलझा राज़ है? कैसी है तलवार, काठ की और दीवार मिट्टी की जिस पर पटकता, पीटता हूं कि घायल होता रहता हूं मगर ख़ून के छींटे उड़ते नहीं, धुंध कोई छंटती नहीं, युद्ध किस दिशा गई जैसा सूत्र हाथ कभी चढ़ता नहीं?

दीवार के पार वह जो व्‍यक्ति मिला होगा जो शायद तुम ही होगे, या तुमसा कोई दोस्‍त, या मैं ही होऊंगा अपने से मिलने दीवार के पार पहुंच गया होऊंगा, एकदम से सुन्‍न गुम हो जायेगा. या धुंध में ऐसी ही तस्‍वीर दीक्‍खेगी साफ़-साफ़. लिपटे शर्म के लिहाफ़ में मैं प्रार्थना करूंगा हे ईश्‍वर, मुझे मेरा लतीफ़ा याद दिला दे.

(ऊपर का चित्र सुधीर पटवर्द्धन की पेंटिंग है)

Tuesday, October 26, 2010

खिलेगा तो देखेंगे..

घर लौटकर ताज्‍जुब हुआ. मतलब पत्‍नीजी तो रसोई में ही थीं मगर बाहर अहाते में एक नया खूंटा बंधा था, खूंटे में बकरी बंधी थी. जब गया था तो पत्‍नीजी के पीछे चुनमुन, ढुनमुन, किन्‍नी और दुलारी ही छोड़कर गया था, अब देख रहा हूं घर के बंधे बजट में जुगाली करने एक नया सदस्‍य आया हुआ है (एक पुराने कापी से पन्‍ने फाड़-फाड़कर ढुनमुन बाबू बकरी के मुंह में डाल रहे थे, बकरी बिना देखे कि कैसी कापी के कैसे पन्‍ने हैं प्रेमभाव से उनका भक्षण कर रही थी).

पल भर को मैं भयाक्रांत हुआ कि कहीं ऐसा न हो हरामी बकरी को मेरी कविताएं खिला रहा हो! लपककर ढुनमुन के हाथ से कापी झपटी तो देखा, कविताएं ही थीं!

इस हिंसा के प्रतिकार में ढुनमुन लाल एकदम से छूटकर बरसने लगे. माने पैर पटक-पटककर रोने लगे. किन्‍नी अपने भाई की रक्षा में मेरे हाथ से कापी खींचने लगी, ‘बकली भूकी है पप्‍पा, पिलीच!’

’और मैं नहीं हूं?’ मैंने चीखकर कहा, ‘मुझको कोई खिलाने आता है?’

’वैसा नहीं है जैसा तुम समझ रहे हो,’ पत्‍नीजी रसोई की खिड़की से झांककर बोलीं.

मैं पत्‍नीजी के झांसे में फंसनेवाला नहीं था. अपनी गर्जना बनाये हुए सवाल किया, ‘तो फिर कैसा समझूं, बताओ तुम! ये चार तो पैदा किये हैं इसकी मुझे जानकारी है, फिर ये पांचवां कैसे कहां से आ गया?’

नज़दीक जाकर बकरी के कान छुए, प्‍लास्टिक के नहीं थे, सो ज़ाहिर है बकरी चीन से नहीं यहीं कहीं पड़ोस से आई थी, मगर यहीं मेरे घर क्‍यों आई थी? जहां पहले ही चार छोटे बच्‍चों के दूध का खरचा और कविता की कापी की रक्षा का धुंध भरा था?

‘इसे यहां कौन लेकर आया है?’ मैंने आंखें तरेरे सवाल कि‍या.

‘मैं नहीं लाया हूं.’ आंखें तरेरे जवाब चुनमुन ने दिया, उसी तरह जैसे बंबई के किसी सिविल कोर्ट में जज के आगे राज ठाकरे जवाब देते और जज घबराकर कोई मराठी फिल्‍म का गाना गुनगुनाने लगता. गाने की जगह मैंने चुनमुन के कान उमेंठने का आनन्‍द लिया, ‘मुझी से होशियारी? लाना ही था तो एक गाय नहीं ला सकते थे? भैंस ले आये होते बारह लीटर दूध देती, पावभर दूध पीकर हमें भी रात का सोना नसीब होता? रात में डरावने सपने न आते?’

चुनमुन ने झटका देकर मेरी पकड़ से अपने कान खींच लिए, वैसे ही जैसे आनेवाले दिनों में कलमाडी और शीला दीक्षित न्‍याय की पकड़ में आने से अपने को उबार लेंगे. अलबत्‍ता किन्‍नी दौड़ी आई और मुझसे चिपटकर बोली, ‘मेने बी सपना देखा पप्‍पा! बौत डेलावना, पिलीच?’

अपनी बहन की देखादेखी दुलारी भी भागी-भागी आई, मेरे ऊपर गिरकर बोली, ‘पप्‍पा, पप्‍पा, मैं तुमारे सिर पे चरुंगी, पिलीच?’

दुलारी को सिर और किन्‍नी को गोद में फंसाने की अपनी पहचानी पोज़ि‍शन लेकर मैं अब पत्‍नीजी से मुखा‍तिब हुआ, ‘चैन से मैं इस घर में कभी रहूंगा या नहीं तुम आज मुझे जवाब दो!’

‘नहीं रहोगे,’ पत्‍नी ने हंसते हुए चाय का टूटा कप मेरी ओर बढ़ाया और अच्‍छे कप से खुद एक घूंट चाय का लेकर बोली, ‘थोड़ी देर के लिए बच्‍चे खुश हो रहे हैं, तुम्‍हारी आंखों में गड़ता है? ढुनमुन अपनी रोटी किसी को नहीं देता, कितने प्‍यार से अपनी कापी बकरी को खिला रहा था? तुमने आकर सब खराब कर दिया!’

किन्‍नी मुझे चिकोटी काटने लगी, मानो सब खराब कर देने की सज़ा मुकर्रर कर रही हो. दुलारी पहले ही सिर के बचे बाल खींच रही थी. पत्‍नीजी ने गहरी सांस छोड़कर कहा, ‘असल बात है बच्‍चे बकरी को प्‍यार कर रहे हैं, तुम्‍हें डाह हो रही है..’

मेरे ज़रा से बालों को खींचने से शायद ऊबी हुई दुलारी ने सिर झुकाकर मेरे गाल की पप्‍पी ली, बोली, ‘मैं तुमको बी पियार करती हूं पप्‍पा, बौत करती हूं!’

’अरे मज़ाक हो रहा है यहां? मेरी कविता बकरी को खिला दी, पता नहीं और क्‍या-क्‍या खाया हो इस मरदूद ने, और मैं पूछ रहा हूं कहां से आई है तो कोई जवाब नहीं दे रहा? मेरी अपनी सगी पत्‍नी मुझे टूटे कप में चाय पिला रही है इस सबका मतलब क्‍या है!’ मैंने चिल्‍लाकर कहा जिसके जवाब में ढुनमुन जो अभी तक रो रहा था एकदम से चुप हो गया. किन्‍नी जो सबसे आंख बचाकर मुझे चिकोटी काट रही थी अब मेरे नाक से नाक लड़ाने लगी. चुनमुन की बांहों में लिपटी बकरी हर्षातिरेक से मुंह ऊपर उठाये मिमियाने लगी. मैं पत्‍नीजी की आंख से आंख लड़ाने के लिए अकुलाने लगा, जबकि वह, मुझसे लापरवाह, बच्‍चों और बकरी के नेह में नहायी, विनोदकुमार शुक्‍ल के लिखे वाक्‍य के मीठे से अपनी साड़ी सजा रही थी, ‘प्रेम से कोई दो शब्‍द बात कर ले तो पूरी पृथ्‍वी में कोई दुश्‍मन नहीं ऐसा लगता था.’

(यह ख़ास दरभंगाकुमारी सिन्‍हा के लिए)

Sunday, October 24, 2010

हाय रे पंजाबी सुहाना..



पंजाबी लैंडस्‍केप पर विजय सिम्‍हा की घुमाई की एक रपट है, रपट से ज़्यादा मर्सिया है, मर्दाना तो कतई नहीं है.. पूरी रपट 'तहलका' में यहां पढ़ सकते हैं.

Saturday, October 23, 2010

भूल जाओ भाव..

भूल जाओ भाव
बस सामने देखे चलो
दिखी दूर अंधड़
हेराये के लंगड़ अपनी
बिन पालों वाली नाव?

डगराये डोलती अभी डूबी नहीं है
तुम ऊबे हाथ झाड़ रहे हो, या जाने
अंधारे संझा की मोहब्‍बत नहाये
गहीन ज़ि‍रह अपने उतार रहे हो
दिखता है झुराये झोले में तीन ग़लत पहाड़ा
कवनी का मुंहकाटा एक कवनो का छोहाड़ा
या, मन की कठफोड़ी में हाड़काटा जाड़ा?

सारे गुल-गपाड़े उड़े होंगे, मुंह उफनती पानी में पड़े
कोई दूर कहीं गाता होगा दिल के हहलने का गाना
या कि तुम ही होगे, बुनते अपने बहलने का बहाना
रहते-रहते चौंक जाते, टटोले खुद को टोह लेते
कि महज़ ख़याल ही तो नहीं है
कि नाव कहीं खाली तो नहीं जा रही?
कि कहीं ऐसा तो नहीं
कि मैं भाव खाकर नहीं ही डूब रहा?

इतने पर भी..

ज़रा सी जगह के ज़रा से जीवन में बहुत सारी लाचारी होगी, नकचढ़े उधार भरमार होंगे इच्छाओं के बुखार. देह डोलाता मुंह बिराता कोई एक बीमार भी होगा, कदम-कदम दांत निपोरे सिगरेट बढ़ाता, कि जलाऊं, धुआं उगलोगे? बलगम? कोई एक लड़की होगी हाथ हिलाती भुले शहरों की छूटी छींट की साड़ि‍यों के चोटखाये किस्सों की हाय-हाय मिटाती, पोंछ-पोंछकर सजाती, चेहरे के उड़े रंग को आंखों के नम से हटाती, गोद में छुपा हिसाबी रजिस्टर जोहती, कि यह आपने जो बारह पंक्तियां लिखी उसके पांच-पांच सौ के तीन नोट काट दूं, काफी होगा, कि कहीं ज़्यादा तो नहीं दे रही? मैं हंसने लगता, या लगभग रोता. या लगभग हंसता लगभग रोता हुआ दीखता बात एक ही होती. लगभग जयहिन्द की तर्ज़ पर बड़े देश की नागरिकता से छिटकता अपनी अदद एक ज़रा सी ज़मीन में मुंह बचाये चला आता, गुस्से में पीछे खाली जगह हाथ का चप्पल फेंकता दिलदारी की बेहयायी गुनगुनाता. हालांकि हैरत होती, देरतक फिर होती ही रहती, कि ऐसे में भी कैसे तो तरंग फूट आता है बिछा दिखने ही लगता है रंग. कैसे तो इत्ते से, बित्ते भर के देश में इतनी बड़ी जिजीविषा कमरतोड़ दुश्वारियों पर भी हाय, बेहया खिलाने ही लगती उमंग.

Friday, October 22, 2010

तारों भरी रात..



बूढ़ी मां के बालों की तक़लीफ़ में गुंथी होती
या त्यौहारी बुढ़ऊ तिरपाल के छत टंकी, बेसुरी
या वह कोई विदेशी लेखक होता किताब होती
जिसके पन्नों में छुपी द‍‍क्-मक् चमकीली लखती
हज़ारों, हज़ार जुगनुओं की बारात होती, हाय
वह कैसी तो तारों भरी रात होती

बूढ़ी नहीं थी जब मां सीढ़ि‍यों पर बिछलती गिरी थी लगभग
लपककर लोप लिया था मैंने, रसोई से छूटकर भागी दीदी का
सहमा भय अपनी जगह अटक गया था मां खिल गई थी
तब भी दिखी थी ऐसी ही चमकीली, छाती में चुभती नुकीली
तारों भरी रात, या जब बीमार बुन्‍नन नहीं किसी की सुन रहा था
अपने होने में दहल रहा था तब थपकियों बहलाये रहा
आंगन घूमता रातभर कांधे उसे सुलाये रहा, रौशनी झर्-झर्
गिरती रही थी उंगलियों के पोरों तक पर चमकती

अब कितना तो चश्मा मलना होता है, या चौंक-चौंककर
अधूरी नींद बीच जगना, सासाराम और सुहावनपुर के आसमानों
में कितने डोर छूटते हैं, पतंगें फड़फड़ाती, फिर भी नहीं आती
सपनों तक में नहीं आती, कि आई हूं बताने कि नहीं आऊंगी
और मुंह बिराती तारों भरी रात, शायद इसीलिए इतना
ताज्जुब होता रहा आपका उदास होकर कहना कि कैसे तो
कह लेते हैं कभी इतनी सहजता से आप मन की बात
सुना मैंने, मगर नहीं भी सुन रहा था, क्योंकि मन बझा था
कहीं और, अचक्के फिर इतने दिनों बाद दिख गई थी
हाय, जुगनुओं का सफ़ेद लालटेन झुलाती
हुमस में मन नहलाती, वही तारों भरी रात.

Wednesday, October 20, 2010

जौने डगर तुम दरस आये सजन..


बापजी सबसे आगे थे. हमेशा रहते. पीछे के चार कदम की छूटी जगह के बाद नीलम, सर्बेसर, दिलीप, सुकांत, नगीना होते. गोदी में मझलका छौंड़ा और पवनी को ढोती काकी और फुआ उसके बाद. अम्‍मा सबके आखरी में. अम्‍मा को देखके यही लगता कि बापजी के शुरु किये काम (धड़ाम!) को चुप्‍पै, अपनी सामाजिकता में जोड़ और सिल रही हों. सब चैन से फुसफुसाते-बुदबुदाते चलते होते, एक अकेला बंटू ही पगहा तुड़ाये पाड़े की तरह घमासान का धूल उड़ाये फिरता. भागकर कभी बापजी का पाला छू लेता फिर हांफे-हांफे उसी सांस पवनी को जीभ बिराता दौड़ा अम्‍मा के पास लौटकर डायलाग मारता, ‘अब अम्‍मा?’
अम्‍मा चुप रहती. बंटू बाल झटकता, छूटा वापस भागता तब अलबत्‍त पीछे से कहती बहुत दौड़ो नहीं, कंकड़-पत्‍थर लग जाएगा.
मुझसे नहीं कहती. जबकि मुझे कंकड़-पत्‍थर लगता रहता था. कदम-कदम पर. न लगे तो खाली-खाली लगता और तक़लीफ़ होती. लगने से तो होती ही. मैं फुत्‍कार मारता अम्‍मा को सुनाता बोलता, ‘किसी को नहीं दिख रहा कितनी चोट लगी है! क्‍यों संगे लेकर आये मुझको? जाओ जहां जाना है तू लोग, हम कहीं नहीं जा रहे!’
अम्‍मा चुप रहती. क्‍या फ़ायदा टंटा बढ़ाने का. जवाब नगीना या सर्बेसर में से कोई देता, इस लड़के को साथ लेकर कहीं जाना मुश्किल है.
काकी पीछे से जोड़ती करते रहो बखेड़ा. पहिलका पांत खाके उठ जाये इसके पहिले पंगत में चहुंप जायें ऐसा नसीब होगा कबहूं ऐ जीवन में?
आगे बापजी आवाज़ लगाते कौन है हो, चप्‍पल हाथ में लेके चल रहा है?
कितनी तक़लीफ़ होती है. सब साथ चलते हैं, बात कोई नहीं समझता. फुआ, काकी से तो उम्‍मीद करना व्‍यर्थ है गंवार औरतें­­­­­. मगर अम्‍मा ही क्‍या समझती है. साथ नहीं चल रहा साफ़ दीख रहा है फिर भी ये औरत नहीं देख रही! घिसटाये-घिसटाये का सफर करना, क्‍यों करना, जाओ जहां जाते हो, मैं नहीं जाता तुमलोगों की संगत में!
फिर हारकर हूक-सी छूटती, चीखता कहता हूं, ‘मैं कितना अलग हूं, अंधे हो सब, दिखता नहीं?’
बंटू अपनी भाग-दौड़ रोककर आवाज़ लगाता है हम भी अलग हूं, देखे? फिर थोड़ी दूर भागा जाता और पलटकर कहता, हां, अब देखो, दिखा?
बापजी भारी गले से खखारकर पूछते हैं बेल्‍ट से मार खानेवाला काम कौन कर रहा है हो.
ओह.
इतने में कोई गौरैया जाने कहां से भटकी बगल में आकर साथ-साथ चलने लगती; हैरानी से तकती जैसे मैंने उसका कुछ बिगाड़ा हो, फिर ऐसे सवाल करती जैसे सुनकर किसी के चोट न पहुंचे, ‘भैया, एक ज़रा सी मदद करोगे, बताओगे मैं कौन? मैं भी सबसे अलग हु? कि सबके जैसी ही ठहरी? असल बात है मैं किसी को कष्‍ट देना नहीं चाहती! और वह पीतल का पत्‍ता भैया?
अपने बाजे-गाजे की धज में एक बूढ़ा बैंडवाला है, अपने गुरुप से छूटा संगीत नहीं लोटा भर पानी और बीस रुपयों की खोज में भटका दिख रहा है. मुझसे पूछता है, हम भी साथ चले चलें भैया? हुआं खाने का इंतजाम है? और कुछ नहीं बस चार रोटी खायेंगे, साव के यहां पिछले महीने भोज था उसके बाद पेट में पेटभर खाना गया नहीं, कसम से!
और मन की खुराक का क्‍या? कोई उसके बारे में सोचता है? सोचेगा?
ओह. और देखिए, अब अम्‍मा के पीछे एक पुलिसवाला अपनी साइकिल चोरी-चोरी लगाये चल रहा है. जैसे जाने इतने लोग भारत-छोड़ो का आंदोलन छेड़ने का कोई फोटो खिंचवाने जा रहे हैं या और मालूम नहीं क्‍या. थोड़ी देर में बेहयायी से नगीना के बंडल से बीड़ी लेकर सुलगा रहा है­. वही पुलिसवाला, और कौन? बैंडवाले से जौने डगर तुम दरस आये सजन गाने की फरमाइश कर रहा है!
अम्‍मा चुप रहती है. जबकि काकी और फुआ अपने मंझलके छौंड़े और पवनी में बझे होते, अकेला मैं ही पैर पटकता कांपता दिखता होता कि चाहे जो हो जाये मैं आगे एक कदम नहीं रखूंगा!
गौरैया ताज्‍जुब से ठहरकर सवाल करती, एक कदम नहीं? एक मेरे जितना, छोटा, कदम?
पुलिसवाला आसानी से बापजी से दोस्‍ती गांठ लेता; बापजी हंसते-हंसते हाथ ठोंकते उसे मना करते कि वह खैनी नहीं खाते. उनके घर में कोई नहीं खाता.
ज़हर? ज़हर खाता है कोई घर में? मैं चीखकर कहना चाहता, मगर गौरैया फिर सवाल करके मेरा जीना दुलम करेगी की सोचता चुप रहता और दो कदम दायें चलकर फिर बायें चला आता.
(बेबी नेगी के लिए)

Monday, October 18, 2010

जितने दिन होंगे..



कितने दिन छूटेंगे, जैसे मन से रगड़ खाकर आंखों का सूखा लोर छूटता है
कितने दिन उड़ेंगे जैसे गाल छुआकर चिरई मनोहारी अपनी पांख मन की आंख खोलती है
कितने दिन होगा कि नीले पीले कत्थई धानी सुर्ख़ लाल के बीच गुज़रती, रंग बहलती
सारी सियाह लकीरों को तुम ठीक-ठीक पहचान लोगी, अपनी नाओं को रिसायकल बिन में
धरकर अपनी हांओं का सजीला डेस्कटाप कर लोगी. कितने दिन मैं कहूंगा विचार तो वह
विचार ही होगा, मेरा उनींदा व्यभिचार या तीन सौ बारह टके का व्यर्थ अहंकार नहीं होगा
हसूंगा तो हंसता घबराया या खुद को ज़माने से लजाया न दीखूंगा, न अपनी बरजोरी में
बहकाता, तुम्हारी उलझनों में तुम्हें और गिराता, अपने हत्भाव की सलीब पर चढ़ जाता दिखूंगा

कितने दिन होंगे पाखी हंसती सवाल करती होगी उडूं
और मैं चौंककर मुंह तकता कि अरे, क्या?

कितने दिन होंगे
जितने भी दिन होंगे.

Sunday, October 17, 2010

बेबी क्‍यू..



चित्र को बड़ाकार देखने के लिए उसपर चटका लगाकर उसे एक नई खिड़की में खोलें..

..और हां, मालूम है फिनिशिंग नहीं है, मगर वह मुझी में कौन-सी है? और अंतत: यह बेबीवर्ल्‍ड नहीं है? और यूं भी सब सोने पर सुहागा यहीं हो जाएगा तो चारकोल में चिचरियां छुपाने की तब ज़रुरत कैसे पड़ेगी? हद है.

(यह खास बेबी पंछी कुमारी और नितिन की बेबी पाखी प्‍यारी के लिए)

Friday, October 15, 2010

उलटे सीधे, ज़्यादा उल्‍टे..

औरत सोचती होगी आदमी लगभग लेटा होगा, टॉम वेट्स बेसबब तकता होगा, जूतों को न देखता होगा..


Monday, October 11, 2010

एक ज़रा सा समय..





(चित्र को बड़ाकार देखने के लिए क्लिकयाकर नई खिड़की में खोलें.)

Thursday, October 7, 2010

रात के खेल, और सुबह के

सोते में आदमी कई मर्तबा घबरायेगा, मूंदे आंख कई सारे हिसाब करेगा, चौंककर खुद को सोता तकेगा कि यह क्‍या शख़्स है समय उमस की कैसी रात है, भूंकते कुत्‍तों के लहराते नातों में आख़ि‍र क्‍या सोचता वह गीली नींद को लोरियां सुनाता होगा, झपकियों में डूबे क़ि‍स्‍सों की कितनी अधभिड़ी खिड़कियां होंगी जिनकी खड़खड़ाहटों पर उनींदा जागा हड़बड़ की साइकिल चलाता. खार खाया फिर खुद को समझाता कि क्‍या बेहूदगी है साइकिल पर निकलने का यह समय नहीं और ऐसे सफ़र बेसबब यात्राओं का रोमान हैं झांसा हैं, फेसबुक वाली दोस्तियां और कॉमनवेल्‍थ खेलों की चकमक राष्‍ट्रीयता का फांसा. घबराहट फिर किसी दूसरी तान पर चढ़ एक नया गान शुरु करेगी, नींद जागी रात की आंखें मलती खुलती सुबह का ध्‍यान, और सुब्‍बालक्ष्‍मी का भजन न भी होगा तो खड़खड़ाते क़ि‍स्‍से मिलेंगे खिलखिल हंसी हंसते कि बाबू, मुंदोगे आंख कि हम शुरु करें खेल?

Sunday, October 3, 2010

हमरा नै, ऊ बूढ के कसूर है जो अपरील के चेट्ठी तोके अब अट्टूबर में भेंटा रहा है!

प्रेम परकास प्रियतमा बेबी कुमारी राय का सखी सकीना को पत्र..


का हमर डारलीन सखी, सब भुला गई, हो? ऊ दांती काटा वाला कसम खाई थी, कि हमरे तुमरे जीबन में चाहे जो हो, जौन कोई हो, हमरे आपस के परेम का ई पांचवा जलम है, और तू, सकिनिया!.. अभी पांचों साल नै हुआ और सब बिसरा दी रे? ऊ सुनीतवा का जेठ का दमाद है ऊहे बोल रही थी तुम हमरे बारे में अनाप-सनाप बीष फैला रही हो, काहे रे, सकिनिया? तुमको करेजा का भीतरी का सब कहानी बोले, मन-मंदिर का राज खोले, बहीन से जादा का तुमको मर्जादा और इज्‍जत दिये, एही दिन का बास्‍ते रे, चोट्टी? हमरे हाथ में अब तीन तोला का कंगन और गरदन में सतलड़ा हार सोभित है, इसीलिए तू डाह से मर गई, एतना छोट हो गई रे, तू, सकिनिया?

हमरे दुख का तोको कवना अंजाद नै होगा! इतना तो ऊ मुंहजार परेम परकासो से दिल जोड़े और तोरे से नै हुआ था, जेतना तोर बिस्सासघाती से हुआ! हां! ऊ तो सीता मइया का अहसानी हुआ कि दमादजी दही में जलेपी बोर-बोर के ई सब कहानी बता रहे थे तब तोहरे जीजाजी बंटुआ को अपना हीरो-होंडा पे लेके ऐसक्रीम खिवाये गए थे. मोबैल पे फोन करके हम उनको वहींये से हाल्टिन में रोके रखे कि जरा कंपौंडर जी के हियां से हमरा कांधा का दरद वाला दवाइयो लिये आइएगा! नहीं तS ऊ आज नजीके रहते तS मालूम नहीं शंक़ र भगवान ई घर में कवन अनर्थ घटता!

हरमखोर, एतना अशानी से भूला गई कि बचपना में हमलोक एक दूसरका का दांत काटल अचार और आम का फांकी सब खाये हैं? और तब्‍बो तू हम्‍मर टाप सीकरेट सब हेहर-होहर फइला रही है रे? तोहरा से कवनो छुप्‍पल है रे सकिनिया कि त्‍याग में केतना बरीस हम अपना मन मारे? अऊर जवनो किये भी, सब तोहरे जीजा का सुख का बास्‍ते किये? नै तो ऊ परेम परकास को कब्‍बो हम अपना केवाड़ी पर गोड़ ठेकाने दिये थे, नै तू बोल? मन का गवाही अऊर इंतहाई सब जानके मुंहजार तू हमरा पे इल्‍जाम गिराती है, अऊर हम तोहरा को जलम-जलम का बहीन समझते रहे? गे सीता मइया, ई भटकल सखी का पाप माफ करना, हो माता!

जब ई बंटुआ को अपना उघारे पेट (अब ई पहिलका वाला थोरे हैं, नवकरी का बाद, पइसा का संतोख से पेट तनी बहरी फेंका गया है!) पर ठाड़ा करके दूनो बाप-बेटा हेंहें-ठेंठें का खेला करते हैं, तS सच्‍चो, सखी, तू नै बूझेगी केतना हमर मन में तिरिप्ति‍ ब्‍यापता है.

बंटुआ के गाल पर लहसून का वइसे ही छूटल निसान है जइसन ऊ गुंडा के था. साबित्री का गोतनी बोलती है अईसन दाग वाला का किस्मत खूब बुलंदी पर होता है! हम्‍मो आह ले के सोचते हैं एतना दुख का बाद सुख पाये हैं तS ईश्‍शरजी किरिपा करेंगे और बंटू बाबू को आगा अच्‍छा ही राहे रखेंगे.. ईहो रात-दिन बंटू-बंटू कै के घर भर कोहराम किये रहते हैं! जीबन में एगो कमी था, शंकर भगवान ऊहो पूर दिये. अब गरदन पे हारो है और करेजा से लग्‍गल बंटुओ है, हमको कौची का कमी है, सखी?

लेकिन हम्‍मर ई सोना जइसन गिरहत्‍थी पर तू आग काहे ला उछाल रही है, बहीन?

तोहरे भानजा के मम्‍मी,
बेबी कुमारी राय

अप्रैल 22, 2010.

(जिज्ञासु पाठक सारी चिट्ठियां एक जगह हंस के ताज़ा अक्‍टूबर, 10, 2010 अंक में पढ़ सकते हैं)

Friday, October 1, 2010

एवरीवन इज़ एवरीवन, देन हू द हेल इज़ मी?.. एक घोड़ागप्‍प..


रास्‍ते में जगह-जगह आंखों के आगे एक बैनर लहराता रहा, 'अक़ल घास चरने गयस्‍त!', या यह महज़ घोड़े का दृष्टिभ्रम था? जो दीखता सा दिख रहा था वह ख़यालों में पहले कभी देखी तुर्की या फारसी शायर की पंक्ति थी, जो घूम-घूमकर फिर नज़रों के सामने एक दीवानगी का ताना बुन रही थी? संभवत: जंगल के सियाह सन्‍नाटे में अपने टापों से अलग, साउंडट्रैक पर बज रहे मारिया कालास की आवाज़ में पुच्चिनी के आरिया का असर होगा जो घोड़े को मूर्खता की हद तक मदहोश बनाता रहा होगा. यही वज़ह होगी जो बैनर-विचार और संगीत‍ दोनों के असर के बावज़ूद इतनी देर वह अपना हिनहिनाना भूला रहा, और दौड़ की वहशी भूख में सरपट अंधेरों में तब तक दौड़ता रहा जब तक उसके नथुने धुआं और बड़ी आंखें पानीभर न होने लगीं..
वह तो मारिया कालास और पुच्चिनी की मोहिनी से काफी दूर आकर अचानक घोड़े को खबर हुई अंधेरा वैसा तरल और मेलॉडियस नहीं जिसकी सवारी में वह कहां से निकलकर जाने कहां चला आया था.. और अंधेरे के इस जाने किस गहीन छोर पर आकर 'जुएलथीफ़' के क्‍लाइमैक्‍स के देवानंद की तरह सच्‍चाई सामने खुल रही थी कि आप किसी का भरोसा नहीं कर सकते, फ़िल्‍म की नायिका का भी नहीं. हालांकि यह जानने में घोड़े को थोड़ा वक्‍त लगा कि उसका सवार अधबीच जोख़िम से हाथ झाड़कर फ़रार हो चुका है. सिर्फ़ जाना ही घोड़े ने, गो भरोसा करने में अभी भी तक़लीफ़ हो रही थी. समझदार मनीषी कह गए हैं जीवन में आदमी को किसी का भरोसा नहीं करना चाहिए, चार्ली कॉफमन की फ़िल्‍म 'सिनेक्डकी, न्‍यूयॉर्क' में एक पादरी अपने सरमन में दु:खकातर कहता दीखता भी है:
“There are a million little strings attached to every choice you make. You can destroy your life every time you choose. But maybe you won't know for 20 years... and you may never, ever trace it to its source. And you only get one chance to play it out. Just try and figure out your own divorce. And they say there is no fate, but there is, it's what you create. And even though the world goes on for eons and eons... you are only here for a fraction of a fraction of a second. Most of your time is spent being dead or not yet born.

But while alive, you wait in vain... wasting years for a phone call or a letter or a look... from someone or something to make it all right. And it never comes, or it seems to, but it doesn't really. So you spend your time in vague regret... or vaguer hope that something good will come along. Something to make you feel connected. Something to make you feel whole. Something to make you feel loved. And the truth is... I feel so angry. And the truth is... I feel so fucking sad. And the truth is, I've felt so fucking hurt for so fucking long. And for just as long, I've been pretending I'm okay... just to get along, just for... I don't know why. Maybe because no one wants to hear about my misery... because they have their own. Well, fuck everybody. Amen.”
'ओह, यह पादरी की भाषा है? फ़िल्‍म और सांस्‍कृतिक अनुसंधान की भाषा है?', घोड़े को एक बार फिर भरोसा नहीं होता कि उसे सचमुच किसी पर, किसी पर भी, भरोसा करने का अधिकार नहीं. शायद अच्‍छा होता रास्‍ते में वह मकई की बालियों की मोहब्‍बत में न पड़ा होता, जो बाद में- उस छोटी मुस्‍कराती बच्‍ची की ही तरह- भीमकाय विज्ञापनों का तिलिस्‍म साबित हुए. घोड़ा आंखें फेरकर फिर से मारिया कालास और पुच्चिनी के आरिया को याद करने की कोशिश करता है, मगर जैसा यह अनर्थी, अमंगलकारी समय है, एक बार फिर चार्ली कॉफमन की फ़ि‍ल्‍म के अंत का वॉयसओवर अंधेरों में उस पर तीर बरसाने लगते हैं:
“What was once before you, an exciting and mysterious future... is now behind you, lived, understood, disappointing. You realize you are not special. You have struggled into existence and are now slipping silently out of it. This is everyone's experience.Every single one. The specifics hardly matter. Everyone is everyone. So you are Adele... You are Ellen. All her meager sadnesses are yours. All her loneliness. The gray, straw-like hair. Her red, raw hands. It's yours. It is time for you to understand this. As the people who adore you stop adoring you... as they die, as they move on... as you shed them, as you shed your beauty, your youth... as the world forgets you, as you recognize your transience... ...as you begin to lose your characteristics one by one... as you learn there is no one watching you... and there never was, you think only about driving. Not coming from anyplace, not arriving anyplace... just driving, counting off time. Now you are here. It's 7:43. Now you are here. It's 7:44. Now you are gone.”