Sunday, October 3, 2010

हमरा नै, ऊ बूढ के कसूर है जो अपरील के चेट्ठी तोके अब अट्टूबर में भेंटा रहा है!

प्रेम परकास प्रियतमा बेबी कुमारी राय का सखी सकीना को पत्र..


का हमर डारलीन सखी, सब भुला गई, हो? ऊ दांती काटा वाला कसम खाई थी, कि हमरे तुमरे जीबन में चाहे जो हो, जौन कोई हो, हमरे आपस के परेम का ई पांचवा जलम है, और तू, सकिनिया!.. अभी पांचों साल नै हुआ और सब बिसरा दी रे? ऊ सुनीतवा का जेठ का दमाद है ऊहे बोल रही थी तुम हमरे बारे में अनाप-सनाप बीष फैला रही हो, काहे रे, सकिनिया? तुमको करेजा का भीतरी का सब कहानी बोले, मन-मंदिर का राज खोले, बहीन से जादा का तुमको मर्जादा और इज्‍जत दिये, एही दिन का बास्‍ते रे, चोट्टी? हमरे हाथ में अब तीन तोला का कंगन और गरदन में सतलड़ा हार सोभित है, इसीलिए तू डाह से मर गई, एतना छोट हो गई रे, तू, सकिनिया?

हमरे दुख का तोको कवना अंजाद नै होगा! इतना तो ऊ मुंहजार परेम परकासो से दिल जोड़े और तोरे से नै हुआ था, जेतना तोर बिस्सासघाती से हुआ! हां! ऊ तो सीता मइया का अहसानी हुआ कि दमादजी दही में जलेपी बोर-बोर के ई सब कहानी बता रहे थे तब तोहरे जीजाजी बंटुआ को अपना हीरो-होंडा पे लेके ऐसक्रीम खिवाये गए थे. मोबैल पे फोन करके हम उनको वहींये से हाल्टिन में रोके रखे कि जरा कंपौंडर जी के हियां से हमरा कांधा का दरद वाला दवाइयो लिये आइएगा! नहीं तS ऊ आज नजीके रहते तS मालूम नहीं शंक़ र भगवान ई घर में कवन अनर्थ घटता!

हरमखोर, एतना अशानी से भूला गई कि बचपना में हमलोक एक दूसरका का दांत काटल अचार और आम का फांकी सब खाये हैं? और तब्‍बो तू हम्‍मर टाप सीकरेट सब हेहर-होहर फइला रही है रे? तोहरा से कवनो छुप्‍पल है रे सकिनिया कि त्‍याग में केतना बरीस हम अपना मन मारे? अऊर जवनो किये भी, सब तोहरे जीजा का सुख का बास्‍ते किये? नै तो ऊ परेम परकास को कब्‍बो हम अपना केवाड़ी पर गोड़ ठेकाने दिये थे, नै तू बोल? मन का गवाही अऊर इंतहाई सब जानके मुंहजार तू हमरा पे इल्‍जाम गिराती है, अऊर हम तोहरा को जलम-जलम का बहीन समझते रहे? गे सीता मइया, ई भटकल सखी का पाप माफ करना, हो माता!

जब ई बंटुआ को अपना उघारे पेट (अब ई पहिलका वाला थोरे हैं, नवकरी का बाद, पइसा का संतोख से पेट तनी बहरी फेंका गया है!) पर ठाड़ा करके दूनो बाप-बेटा हेंहें-ठेंठें का खेला करते हैं, तS सच्‍चो, सखी, तू नै बूझेगी केतना हमर मन में तिरिप्ति‍ ब्‍यापता है.

बंटुआ के गाल पर लहसून का वइसे ही छूटल निसान है जइसन ऊ गुंडा के था. साबित्री का गोतनी बोलती है अईसन दाग वाला का किस्मत खूब बुलंदी पर होता है! हम्‍मो आह ले के सोचते हैं एतना दुख का बाद सुख पाये हैं तS ईश्‍शरजी किरिपा करेंगे और बंटू बाबू को आगा अच्‍छा ही राहे रखेंगे.. ईहो रात-दिन बंटू-बंटू कै के घर भर कोहराम किये रहते हैं! जीबन में एगो कमी था, शंकर भगवान ऊहो पूर दिये. अब गरदन पे हारो है और करेजा से लग्‍गल बंटुओ है, हमको कौची का कमी है, सखी?

लेकिन हम्‍मर ई सोना जइसन गिरहत्‍थी पर तू आग काहे ला उछाल रही है, बहीन?

तोहरे भानजा के मम्‍मी,
बेबी कुमारी राय

अप्रैल 22, 2010.

(जिज्ञासु पाठक सारी चिट्ठियां एक जगह हंस के ताज़ा अक्‍टूबर, 10, 2010 अंक में पढ़ सकते हैं)

16 comments:

  1. दद्दा जय राम जी कि, अभी हंस का लिंक नहीं देखि हैं, रचना शानदार है......... जोखी भी है, पर आप प्रस्तुत किया - साधुवाद. और आभार हंस का लिक देने के लिए.

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  2. hans pe to september wala ank dikha raha hai. baaki chhitthi to hum sab padhe hain. :)

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  3. बहुत शानदार पोस्ट है और देशज अंदाज की तो बात ही क्या....एकदम राप्चिक।

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  4. राजाधिराज ,

    अब इसको दिल्ली का ’हंस’ छापे या ओक्लाहोमा का ’वर्ल्ड लिटरेचर’, इसके सबसे शुरुआती प्रशंसक हमहीं हैं. हमहीं यानी बाबू पीरहरंकर दास कलकत्ता वाले, सो कौनौ ससुरा हमसे यह हक छीन नहीं सकता. बकिया आनन्द मनाइये . हो सके तो हमें भी मनवाइए . इसके छपने से हंस का गिरता सेंसेक्स शर्तिया ऊपर आएगा.

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  5. @बाबू बिकाश कुमार,
    बेबीया पांच महीला वेटिन कै ली, तू एगो महीना का डिफरेंसी से घबरा रहे है? इहै तुमरा जवानी का करेजा है, हो?

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  6. आप तो महाराज आपै हो... आप जैसा कोई नहीं... एकै साँस में पूरी चिट्ठी पढ़ गए, बकिया बाद में...

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  7. जुलुम हो गया.... गोड़ लागते हैं बाबू... अब ना ...

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  8. माननीय महोदय, नमस्कार!
    मै अवधी, भोजपुरी व मगधी में साफ-साफ भेद नहीं कर पाता हूँ . फिर भी इतना तो अवश्य कह ही सकता हूँ कि आपका लिखने का अंदाज निराला है. मन की बात को प्रकट करने के लिए इससे सुगढ़ भाषा नहीं हो सकती है. साधुवाद.

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  9. हंस में पढ़ रही हूँ और प्रसन्न हो रही हूँ...!!

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  10. मन की उमगन, प्रेम दरसाने वाले सभी मित्रों का शुक्रिया..

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  11. ओ बूढ त करिया ढकनी लगाके भुकुर-भुकुर तमाखू टानने में एतना लीन हो जाते हैं कि टइमे बिलम जाता है।

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  12. Congrats!
    For the benefit of folks who can not get Hans, pl consider putting a common tag for all the posts related to Baby kumari's story here in Azdak.

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  13. 'किस्‍से रामजीत के' का टैग चटकाकर चहवैये सारी चिट्ठियां एक उलटी कड़ी में खोल सकते हैं (दु:स्‍साहसी हुए तो तत्‍काल पढ़ भी सकते हैं).

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  14. गज़ब कहानी !!!!!!!!!!!! :) :) :)

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  15. आपका कहानी छू त का रोग की माफिक हर ओर फैल गया है .. एकाध लोगों का औरी चिठ्ठी बांचने के लिए भेजिए न!!

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