Thursday, October 7, 2010

रात के खेल, और सुबह के

सोते में आदमी कई मर्तबा घबरायेगा, मूंदे आंख कई सारे हिसाब करेगा, चौंककर खुद को सोता तकेगा कि यह क्‍या शख़्स है समय उमस की कैसी रात है, भूंकते कुत्‍तों के लहराते नातों में आख़ि‍र क्‍या सोचता वह गीली नींद को लोरियां सुनाता होगा, झपकियों में डूबे क़ि‍स्‍सों की कितनी अधभिड़ी खिड़कियां होंगी जिनकी खड़खड़ाहटों पर उनींदा जागा हड़बड़ की साइकिल चलाता. खार खाया फिर खुद को समझाता कि क्‍या बेहूदगी है साइकिल पर निकलने का यह समय नहीं और ऐसे सफ़र बेसबब यात्राओं का रोमान हैं झांसा हैं, फेसबुक वाली दोस्तियां और कॉमनवेल्‍थ खेलों की चकमक राष्‍ट्रीयता का फांसा. घबराहट फिर किसी दूसरी तान पर चढ़ एक नया गान शुरु करेगी, नींद जागी रात की आंखें मलती खुलती सुबह का ध्‍यान, और सुब्‍बालक्ष्‍मी का भजन न भी होगा तो खड़खड़ाते क़ि‍स्‍से मिलेंगे खिलखिल हंसी हंसते कि बाबू, मुंदोगे आंख कि हम शुरु करें खेल?

8 comments:

  1. बाबू, मुंदोगे आंख कि हम शुरु करें खेल?

    -शुर तो करिये ही...देखी जायेगी....जादा से जादा चौंधिया न जायेंगे.

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  2. जो आँखें मूँदने पर भी न मुंदी तो....

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  3. आँख तो हम मूंदे ही हैं,नहीं तो 'इनका' कोई खेल न शुरू हो !

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  4. अक्तूबर के 'हंस' मे आपकी कहानी -- ''पहाड़े पहाड़े प्रेम के पत्थर'' पढ़कर हम तो आपकी कलम के मुरीद हो गए ....।

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  5. @शुक्रिया, सुशीला..

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  6. शायद सोने से पहले कही ये ख्याल भी कौंधे कि बिग बॉस से इस बार बाहर कौन जाएगा..?

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  7. aaj pitaji ne bataya ki hans me prakashit ek kahanee padhke ve hanste hanste lotpot ho gae...main aaj raat ko padhungee....aapko badhai

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  8. हंस तो हमें मिलती नहीं..और कैसे पढ़ा जाये, जरा बताईयेगा..

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