Friday, October 15, 2010

उलटे सीधे, ज़्यादा उल्‍टे..

औरत सोचती होगी आदमी लगभग लेटा होगा, टॉम वेट्स बेसबब तकता होगा, जूतों को न देखता होगा..


9 comments:

  1. जूते मस्त हैं

    ReplyDelete
  2. आदमी कुछ सोचता नहीं........


    उस बहकते आलम में
    जूते छोड़ गया होगा...

    ReplyDelete
  3. यह सब आपकी ही खुराफात सॉरी करामात है क्या?..जब्र्दस्त हैं..खासकर जूतों का रंग-संयोजन..कि हम उधड़े बदरंग पैजारों वालों को रश्क हो जाता है कि वह सफ़र कितना खूबसूरत रहा होगा..जिसने इन जोड़ीदारों को इतने खूबसूरत रंग बख्शे..!!

    ReplyDelete
  4. और जूतों के फीते एक दूसरे का जुदा रंग देख कर लाल-पीले नही होते होंगे क्या?..वैसे यह जूते जूताशास्त्र के सामूहिक अनुशासन के प्रति एक बगावत हैं..मगर हैं दिलकश..बगावती चीजें ही अक्सर दिलकश या रोमांटिक लगती हैं..हमारे कन्वेंशन्स को, हमारे डर को चुनौती देती सी..!!..काले जूतों की कालिख देख कर काले हो गये आँखों के रेटिना मे इन जूतों का इंद्रधनुष जैसे घुलना चाहता है..मगर आंखे भी तो कबीरदास की काली कमरिया ही हैं ना..सो ऐसे जूते बस अपवादों और सपनों मे आते हैं.. ;-(

    ReplyDelete
  5. प्रेमचंद साब के पास भी ऐसे रंग-बिरंगे जूतों की जोड़ी रही होंगी..जब उन्होने हीरा-मोती की दास्ताँ लिखी होगी..आइ गेस!!

    ReplyDelete
  6. शुक्रिया, अपूर्व..
    जूतों के बारे में इतनी चिंता मत करो, बेचारे घबराकर फिर काले पड़ने लगेंगे..

    ReplyDelete
  7. औरत चाहे जो भी सोचे, जूतों की डिजाइन पैटेन्ट करा लें।

    ReplyDelete
  8. वर्जिश-ए-हाथ जिंदाबाद, जिंदाबाद, रंग चउकस

    ReplyDelete