
कितने दिन छूटेंगे, जैसे मन से रगड़ खाकर आंखों का सूखा लोर छूटता है
कितने दिन उड़ेंगे जैसे गाल छुआकर चिरई मनोहारी अपनी पांख मन की आंख खोलती है
कितने दिन होगा कि नीले पीले कत्थई धानी सुर्ख़ लाल के बीच गुज़रती, रंग बहलती
सारी सियाह लकीरों को तुम ठीक-ठीक पहचान लोगी, अपनी नाओं को रिसायकल बिन में
धरकर अपनी हांओं का सजीला डेस्कटाप कर लोगी. कितने दिन मैं कहूंगा विचार तो वह
विचार ही होगा, मेरा उनींदा व्यभिचार या तीन सौ बारह टके का व्यर्थ अहंकार नहीं होगा
हसूंगा तो हंसता घबराया या खुद को ज़माने से लजाया न दीखूंगा, न अपनी बरजोरी में
बहकाता, तुम्हारी उलझनों में तुम्हें और गिराता, अपने हत्भाव की सलीब पर चढ़ जाता दिखूंगा
कितने दिन होंगे पाखी हंसती सवाल करती होगी उडूं
और मैं चौंककर मुंह तकता कि अरे, क्या?
कितने दिन होंगे
जितने भी दिन होंगे.