Wednesday, October 20, 2010

जौने डगर तुम दरस आये सजन..


बापजी सबसे आगे थे. हमेशा रहते. पीछे के चार कदम की छूटी जगह के बाद नीलम, सर्बेसर, दिलीप, सुकांत, नगीना होते. गोदी में मझलका छौंड़ा और पवनी को ढोती काकी और फुआ उसके बाद. अम्‍मा सबके आखरी में. अम्‍मा को देखके यही लगता कि बापजी के शुरु किये काम (धड़ाम!) को चुप्‍पै, अपनी सामाजिकता में जोड़ और सिल रही हों. सब चैन से फुसफुसाते-बुदबुदाते चलते होते, एक अकेला बंटू ही पगहा तुड़ाये पाड़े की तरह घमासान का धूल उड़ाये फिरता. भागकर कभी बापजी का पाला छू लेता फिर हांफे-हांफे उसी सांस पवनी को जीभ बिराता दौड़ा अम्‍मा के पास लौटकर डायलाग मारता, ‘अब अम्‍मा?’
अम्‍मा चुप रहती. बंटू बाल झटकता, छूटा वापस भागता तब अलबत्‍त पीछे से कहती बहुत दौड़ो नहीं, कंकड़-पत्‍थर लग जाएगा.
मुझसे नहीं कहती. जबकि मुझे कंकड़-पत्‍थर लगता रहता था. कदम-कदम पर. न लगे तो खाली-खाली लगता और तक़लीफ़ होती. लगने से तो होती ही. मैं फुत्‍कार मारता अम्‍मा को सुनाता बोलता, ‘किसी को नहीं दिख रहा कितनी चोट लगी है! क्‍यों संगे लेकर आये मुझको? जाओ जहां जाना है तू लोग, हम कहीं नहीं जा रहे!’
अम्‍मा चुप रहती. क्‍या फ़ायदा टंटा बढ़ाने का. जवाब नगीना या सर्बेसर में से कोई देता, इस लड़के को साथ लेकर कहीं जाना मुश्किल है.
काकी पीछे से जोड़ती करते रहो बखेड़ा. पहिलका पांत खाके उठ जाये इसके पहिले पंगत में चहुंप जायें ऐसा नसीब होगा कबहूं ऐ जीवन में?
आगे बापजी आवाज़ लगाते कौन है हो, चप्‍पल हाथ में लेके चल रहा है?
कितनी तक़लीफ़ होती है. सब साथ चलते हैं, बात कोई नहीं समझता. फुआ, काकी से तो उम्‍मीद करना व्‍यर्थ है गंवार औरतें­­­­­. मगर अम्‍मा ही क्‍या समझती है. साथ नहीं चल रहा साफ़ दीख रहा है फिर भी ये औरत नहीं देख रही! घिसटाये-घिसटाये का सफर करना, क्‍यों करना, जाओ जहां जाते हो, मैं नहीं जाता तुमलोगों की संगत में!
फिर हारकर हूक-सी छूटती, चीखता कहता हूं, ‘मैं कितना अलग हूं, अंधे हो सब, दिखता नहीं?’
बंटू अपनी भाग-दौड़ रोककर आवाज़ लगाता है हम भी अलग हूं, देखे? फिर थोड़ी दूर भागा जाता और पलटकर कहता, हां, अब देखो, दिखा?
बापजी भारी गले से खखारकर पूछते हैं बेल्‍ट से मार खानेवाला काम कौन कर रहा है हो.
ओह.
इतने में कोई गौरैया जाने कहां से भटकी बगल में आकर साथ-साथ चलने लगती; हैरानी से तकती जैसे मैंने उसका कुछ बिगाड़ा हो, फिर ऐसे सवाल करती जैसे सुनकर किसी के चोट न पहुंचे, ‘भैया, एक ज़रा सी मदद करोगे, बताओगे मैं कौन? मैं भी सबसे अलग हु? कि सबके जैसी ही ठहरी? असल बात है मैं किसी को कष्‍ट देना नहीं चाहती! और वह पीतल का पत्‍ता भैया?
अपने बाजे-गाजे की धज में एक बूढ़ा बैंडवाला है, अपने गुरुप से छूटा संगीत नहीं लोटा भर पानी और बीस रुपयों की खोज में भटका दिख रहा है. मुझसे पूछता है, हम भी साथ चले चलें भैया? हुआं खाने का इंतजाम है? और कुछ नहीं बस चार रोटी खायेंगे, साव के यहां पिछले महीने भोज था उसके बाद पेट में पेटभर खाना गया नहीं, कसम से!
और मन की खुराक का क्‍या? कोई उसके बारे में सोचता है? सोचेगा?
ओह. और देखिए, अब अम्‍मा के पीछे एक पुलिसवाला अपनी साइकिल चोरी-चोरी लगाये चल रहा है. जैसे जाने इतने लोग भारत-छोड़ो का आंदोलन छेड़ने का कोई फोटो खिंचवाने जा रहे हैं या और मालूम नहीं क्‍या. थोड़ी देर में बेहयायी से नगीना के बंडल से बीड़ी लेकर सुलगा रहा है­. वही पुलिसवाला, और कौन? बैंडवाले से जौने डगर तुम दरस आये सजन गाने की फरमाइश कर रहा है!
अम्‍मा चुप रहती है. जबकि काकी और फुआ अपने मंझलके छौंड़े और पवनी में बझे होते, अकेला मैं ही पैर पटकता कांपता दिखता होता कि चाहे जो हो जाये मैं आगे एक कदम नहीं रखूंगा!
गौरैया ताज्‍जुब से ठहरकर सवाल करती, एक कदम नहीं? एक मेरे जितना, छोटा, कदम?
पुलिसवाला आसानी से बापजी से दोस्‍ती गांठ लेता; बापजी हंसते-हंसते हाथ ठोंकते उसे मना करते कि वह खैनी नहीं खाते. उनके घर में कोई नहीं खाता.
ज़हर? ज़हर खाता है कोई घर में? मैं चीखकर कहना चाहता, मगर गौरैया फिर सवाल करके मेरा जीना दुलम करेगी की सोचता चुप रहता और दो कदम दायें चलकर फिर बायें चला आता.
(बेबी नेगी के लिए)

4 comments:

  1. ये भी क्या गजब लिखा आपने। बहुतों के बचपन की कथा-व्यथा। हां, ठीक, लोक-कथा जो बहुतों को अपनी सी लगे।

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  2. बच्चा जो बचपन जीता है उसको शब्द नहीं दे सकता .उसके मन की उड़ान और उसकी संवेदना को आपने जतन से संभाल कर रख दिया है और साथ दे दिया है फुदकती उछलती मचलती उमड़ती गौरय्या का !.गजब !!..

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  3. आपकी इस पोस्ट को आज के ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है...
    आज का बुलेटिन, महंगी होती शादियाँ, कच्चे होते रिश्ते

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