Friday, October 22, 2010

तारों भरी रात..



बूढ़ी मां के बालों की तक़लीफ़ में गुंथी होती
या त्यौहारी बुढ़ऊ तिरपाल के छत टंकी, बेसुरी
या वह कोई विदेशी लेखक होता किताब होती
जिसके पन्नों में छुपी द‍‍क्-मक् चमकीली लखती
हज़ारों, हज़ार जुगनुओं की बारात होती, हाय
वह कैसी तो तारों भरी रात होती

बूढ़ी नहीं थी जब मां सीढ़ि‍यों पर बिछलती गिरी थी लगभग
लपककर लोप लिया था मैंने, रसोई से छूटकर भागी दीदी का
सहमा भय अपनी जगह अटक गया था मां खिल गई थी
तब भी दिखी थी ऐसी ही चमकीली, छाती में चुभती नुकीली
तारों भरी रात, या जब बीमार बुन्‍नन नहीं किसी की सुन रहा था
अपने होने में दहल रहा था तब थपकियों बहलाये रहा
आंगन घूमता रातभर कांधे उसे सुलाये रहा, रौशनी झर्-झर्
गिरती रही थी उंगलियों के पोरों तक पर चमकती

अब कितना तो चश्मा मलना होता है, या चौंक-चौंककर
अधूरी नींद बीच जगना, सासाराम और सुहावनपुर के आसमानों
में कितने डोर छूटते हैं, पतंगें फड़फड़ाती, फिर भी नहीं आती
सपनों तक में नहीं आती, कि आई हूं बताने कि नहीं आऊंगी
और मुंह बिराती तारों भरी रात, शायद इसीलिए इतना
ताज्जुब होता रहा आपका उदास होकर कहना कि कैसे तो
कह लेते हैं कभी इतनी सहजता से आप मन की बात
सुना मैंने, मगर नहीं भी सुन रहा था, क्योंकि मन बझा था
कहीं और, अचक्के फिर इतने दिनों बाद दिख गई थी
हाय, जुगनुओं का सफ़ेद लालटेन झुलाती
हुमस में मन नहलाती, वही तारों भरी रात.

1 comment:

  1. सुनना चाहिये भी नहीं था..

    आपका लिखा एक tranquilizer जैसा होता है.. सच पूछिये सुकून जैसा ही कुछ मिलता है.. ये पोस्ट बिना कमेंट सूनी लग रही थी इसलिये अपनी झलक दिखा दी.. वरना आजकल हमें भी निर्मल वर्मा के ’एक चिथडा सुख’ के पात्र के जैसे ’होकर भी नहीं होने’ में रस आने लगा है..

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