Saturday, October 23, 2010

इतने पर भी..

ज़रा सी जगह के ज़रा से जीवन में बहुत सारी लाचारी होगी, नकचढ़े उधार भरमार होंगे इच्छाओं के बुखार. देह डोलाता मुंह बिराता कोई एक बीमार भी होगा, कदम-कदम दांत निपोरे सिगरेट बढ़ाता, कि जलाऊं, धुआं उगलोगे? बलगम? कोई एक लड़की होगी हाथ हिलाती भुले शहरों की छूटी छींट की साड़ि‍यों के चोटखाये किस्सों की हाय-हाय मिटाती, पोंछ-पोंछकर सजाती, चेहरे के उड़े रंग को आंखों के नम से हटाती, गोद में छुपा हिसाबी रजिस्टर जोहती, कि यह आपने जो बारह पंक्तियां लिखी उसके पांच-पांच सौ के तीन नोट काट दूं, काफी होगा, कि कहीं ज़्यादा तो नहीं दे रही? मैं हंसने लगता, या लगभग रोता. या लगभग हंसता लगभग रोता हुआ दीखता बात एक ही होती. लगभग जयहिन्द की तर्ज़ पर बड़े देश की नागरिकता से छिटकता अपनी अदद एक ज़रा सी ज़मीन में मुंह बचाये चला आता, गुस्से में पीछे खाली जगह हाथ का चप्पल फेंकता दिलदारी की बेहयायी गुनगुनाता. हालांकि हैरत होती, देरतक फिर होती ही रहती, कि ऐसे में भी कैसे तो तरंग फूट आता है बिछा दिखने ही लगता है रंग. कैसे तो इत्ते से, बित्ते भर के देश में इतनी बड़ी जिजीविषा कमरतोड़ दुश्वारियों पर भी हाय, बेहया खिलाने ही लगती उमंग.

3 comments:

  1. एक बात कहूँ, आप जैसे लिखते हैं, हम बोलकर वैसे ही पढ़ते है. जैसे माथे की त्योरियां चढ़ा कर पूछा हमने... सिगरेट पीओगे? ज़हर उग्लोगे? बलगम ?

    आप लिखते रहिये यूँ ही धांसू... कमेन्ट नहीं करते इसका मतलब यह नहीं की हम पढ़ते नहीं (वैसे भी आपके जैसे मन के धुनी को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता)

    बहुत दिन हुए पतनशील साहित्य को पढ़े. नहीं ?

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  2. २ बार पढ़ा - फिर सोचा......
    उसके बाद ५ पढ़ा ....फिर सोचा......
    १ बार मनन करके देखा तो अपनी शक्ल का ख्याल आ गया ...

    "मैं हंसने लगता, या लगभग रोता. या लगभग हंसता लगभग रोता हुआ दीखता बात एक ही होती"

    टिप्पणी देने का बेहया तरीका एगो ये भी है.

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  3. जाने कैसी उमंग है .बड़ी हिम्मत है इसमें .......

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