Oct 26, 2010

खिलेगा तो देखेंगे..

घर लौटकर ताज्‍जुब हुआ. मतलब पत्‍नीजी तो रसोई में ही थीं मगर बाहर अहाते में एक नया खूंटा बंधा था, खूंटे में बकरी बंधी थी. जब गया था तो पत्‍नीजी के पीछे चुनमुन, ढुनमुन, किन्‍नी और दुलारी ही छोड़कर गया था, अब देख रहा हूं घर के बंधे बजट में जुगाली करने एक नया सदस्‍य आया हुआ है (एक पुराने कापी से पन्‍ने फाड़-फाड़कर ढुनमुन बाबू बकरी के मुंह में डाल रहे थे, बकरी बिना देखे कि कैसी कापी के कैसे पन्‍ने हैं प्रेमभाव से उनका भक्षण कर रही थी).

पल भर को मैं भयाक्रांत हुआ कि कहीं ऐसा न हो हरामी बकरी को मेरी कविताएं खिला रहा हो! लपककर ढुनमुन के हाथ से कापी झपटी तो देखा, कविताएं ही थीं!

इस हिंसा के प्रतिकार में ढुनमुन लाल एकदम से छूटकर बरसने लगे. माने पैर पटक-पटककर रोने लगे. किन्‍नी अपने भाई की रक्षा में मेरे हाथ से कापी खींचने लगी, ‘बकली भूकी है पप्‍पा, पिलीच!’

’और मैं नहीं हूं?’ मैंने चीखकर कहा, ‘मुझको कोई खिलाने आता है?’

’वैसा नहीं है जैसा तुम समझ रहे हो,’ पत्‍नीजी रसोई की खिड़की से झांककर बोलीं.

मैं पत्‍नीजी के झांसे में फंसनेवाला नहीं था. अपनी गर्जना बनाये हुए सवाल किया, ‘तो फिर कैसा समझूं, बताओ तुम! ये चार तो पैदा किये हैं इसकी मुझे जानकारी है, फिर ये पांचवां कैसे कहां से आ गया?’

नज़दीक जाकर बकरी के कान छुए, प्‍लास्टिक के नहीं थे, सो ज़ाहिर है बकरी चीन से नहीं यहीं कहीं पड़ोस से आई थी, मगर यहीं मेरे घर क्‍यों आई थी? जहां पहले ही चार छोटे बच्‍चों के दूध का खरचा और कविता की कापी की रक्षा का धुंध भरा था?

‘इसे यहां कौन लेकर आया है?’ मैंने आंखें तरेरे सवाल कि‍या.

‘मैं नहीं लाया हूं.’ आंखें तरेरे जवाब चुनमुन ने दिया, उसी तरह जैसे बंबई के किसी सिविल कोर्ट में जज के आगे राज ठाकरे जवाब देते और जज घबराकर कोई मराठी फिल्‍म का गाना गुनगुनाने लगता. गाने की जगह मैंने चुनमुन के कान उमेंठने का आनन्‍द लिया, ‘मुझी से होशियारी? लाना ही था तो एक गाय नहीं ला सकते थे? भैंस ले आये होते बारह लीटर दूध देती, पावभर दूध पीकर हमें भी रात का सोना नसीब होता? रात में डरावने सपने न आते?’

चुनमुन ने झटका देकर मेरी पकड़ से अपने कान खींच लिए, वैसे ही जैसे आनेवाले दिनों में कलमाडी और शीला दीक्षित न्‍याय की पकड़ में आने से अपने को उबार लेंगे. अलबत्‍ता किन्‍नी दौड़ी आई और मुझसे चिपटकर बोली, ‘मेने बी सपना देखा पप्‍पा! बौत डेलावना, पिलीच?’

अपनी बहन की देखादेखी दुलारी भी भागी-भागी आई, मेरे ऊपर गिरकर बोली, ‘पप्‍पा, पप्‍पा, मैं तुमारे सिर पे चरुंगी, पिलीच?’

दुलारी को सिर और किन्‍नी को गोद में फंसाने की अपनी पहचानी पोज़ि‍शन लेकर मैं अब पत्‍नीजी से मुखा‍तिब हुआ, ‘चैन से मैं इस घर में कभी रहूंगा या नहीं तुम आज मुझे जवाब दो!’

‘नहीं रहोगे,’ पत्‍नी ने हंसते हुए चाय का टूटा कप मेरी ओर बढ़ाया और अच्‍छे कप से खुद एक घूंट चाय का लेकर बोली, ‘थोड़ी देर के लिए बच्‍चे खुश हो रहे हैं, तुम्‍हारी आंखों में गड़ता है? ढुनमुन अपनी रोटी किसी को नहीं देता, कितने प्‍यार से अपनी कापी बकरी को खिला रहा था? तुमने आकर सब खराब कर दिया!’

किन्‍नी मुझे चिकोटी काटने लगी, मानो सब खराब कर देने की सज़ा मुकर्रर कर रही हो. दुलारी पहले ही सिर के बचे बाल खींच रही थी. पत्‍नीजी ने गहरी सांस छोड़कर कहा, ‘असल बात है बच्‍चे बकरी को प्‍यार कर रहे हैं, तुम्‍हें डाह हो रही है..’

मेरे ज़रा से बालों को खींचने से शायद ऊबी हुई दुलारी ने सिर झुकाकर मेरे गाल की पप्‍पी ली, बोली, ‘मैं तुमको बी पियार करती हूं पप्‍पा, बौत करती हूं!’

’अरे मज़ाक हो रहा है यहां? मेरी कविता बकरी को खिला दी, पता नहीं और क्‍या-क्‍या खाया हो इस मरदूद ने, और मैं पूछ रहा हूं कहां से आई है तो कोई जवाब नहीं दे रहा? मेरी अपनी सगी पत्‍नी मुझे टूटे कप में चाय पिला रही है इस सबका मतलब क्‍या है!’ मैंने चिल्‍लाकर कहा जिसके जवाब में ढुनमुन जो अभी तक रो रहा था एकदम से चुप हो गया. किन्‍नी जो सबसे आंख बचाकर मुझे चिकोटी काट रही थी अब मेरे नाक से नाक लड़ाने लगी. चुनमुन की बांहों में लिपटी बकरी हर्षातिरेक से मुंह ऊपर उठाये मिमियाने लगी. मैं पत्‍नीजी की आंख से आंख लड़ाने के लिए अकुलाने लगा, जबकि वह, मुझसे लापरवाह, बच्‍चों और बकरी के नेह में नहायी, विनोदकुमार शुक्‍ल के लिखे वाक्‍य के मीठे से अपनी साड़ी सजा रही थी, ‘प्रेम से कोई दो शब्‍द बात कर ले तो पूरी पृथ्‍वी में कोई दुश्‍मन नहीं ऐसा लगता था.’

(यह ख़ास दरभंगाकुमारी सिन्‍हा के लिए)