
कौन जानता किसे मालूम धुंधलके की यह दीवार कभी धंसेगी, भटकता किसी दिन जो पहुंच ही गया तब भी क्या ख़बर दीवार के पार तुम हाथ हिलाते, मुस्कराते मिलोगे ही?
छू लोगे गाल पूछोगे हाल, और मैं एकदम से लजाता, घबराता बुदबुदाने लगूंगा कि हाल के बारे में हम किसी और दिन बात नहीं कर सकते, आज सिर्फ़ एक लतीफ़ा सुनाता बनूं?
और फिर जैसाकि ऐसे मौकों पर होता, हमेशा होता है, लतीफ़ा एकदम याद नहीं आयेगा, झेंप छुपाने को मैं हंसने लगूंगा, और मेरी तक़लीफ़ बढ़ाने को तुम मुस्कराने, कि अच्छा है बिना लतीफ़े के भी हम हंस रहे हैं.
मैं हंसता अकुलाया कहूंगा मगर दोस्त, हम फंसे हुए हैं. धुंध का यह कैसा गहरा है साहित्य है समाज है, हमारे समय का कैसा अनसुलझा राज़ है? कैसी है तलवार, काठ की और दीवार मिट्टी की जिस पर पटकता, पीटता हूं कि घायल होता रहता हूं मगर ख़ून के छींटे उड़ते नहीं, धुंध कोई छंटती नहीं, युद्ध किस दिशा गई जैसा सूत्र हाथ कभी चढ़ता नहीं?
दीवार के पार वह जो व्यक्ति मिला होगा जो शायद तुम ही होगे, या तुमसा कोई दोस्त, या मैं ही होऊंगा अपने से मिलने दीवार के पार पहुंच गया होऊंगा, एकदम से सुन्न गुम हो जायेगा. या धुंध में ऐसी ही तस्वीर दीक्खेगी साफ़-साफ़. लिपटे शर्म के लिहाफ़ में मैं प्रार्थना करूंगा हे ईश्वर, मुझे मेरा लतीफ़ा याद दिला दे.
(ऊपर का चित्र सुधीर पटवर्द्धन की पेंटिंग है)