Saturday, October 23, 2010

भूल जाओ भाव..

भूल जाओ भाव
बस सामने देखे चलो
दिखी दूर अंधड़
हेराये के लंगड़ अपनी
बिन पालों वाली नाव?

डगराये डोलती अभी डूबी नहीं है
तुम ऊबे हाथ झाड़ रहे हो, या जाने
अंधारे संझा की मोहब्‍बत नहाये
गहीन ज़ि‍रह अपने उतार रहे हो
दिखता है झुराये झोले में तीन ग़लत पहाड़ा
कवनी का मुंहकाटा एक कवनो का छोहाड़ा
या, मन की कठफोड़ी में हाड़काटा जाड़ा?

सारे गुल-गपाड़े उड़े होंगे, मुंह उफनती पानी में पड़े
कोई दूर कहीं गाता होगा दिल के हहलने का गाना
या कि तुम ही होगे, बुनते अपने बहलने का बहाना
रहते-रहते चौंक जाते, टटोले खुद को टोह लेते
कि महज़ ख़याल ही तो नहीं है
कि नाव कहीं खाली तो नहीं जा रही?
कि कहीं ऐसा तो नहीं
कि मैं भाव खाकर नहीं ही डूब रहा?

3 comments:

  1. यह आप ही कर सकते थे, हो... भी.

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  2. हद करते हैं आप भी। अपने कूढ़मगज होने का संदेह होने लगता है आपको पढ़ने के बाद।

    साथ में इसे समझने की एक कुंजी भी ठेल दीजिए।

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  3. हेराय रहे तो ठीक - डुबकी दुबकी नहीं लगती जादा !

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