Monday, November 1, 2010

लदर फदर धम्‍म धड़ाम..



बेचैनियों की लदर-फदर रेल उड़ी जाती धम्म–धडाम. कहीं एक औरत चीख़ती किसी के बक्सा छूटता, बच्चा कोई रोये चला जाता एक साहब गालियां बके, पैर के बोझ और माथे के रोश में समझ सकने का सुभीता न होता कि भीड़ में एक मुसाफ़ि‍र क्यों गर्दनियाया जा रहा है, मुंहजोर चुपचाप मार सह लेने की जगह अपनी सफ़ाई में क्या बोले रोये क्यों जा रहा है. कहने का मतलब ऐसी ठेल-पेल उसमें क्या समझदारी छांटी जा सकती. बाहर दिन है कि रात इतना तक पूरे आत्माविश्वारस से आंका नहीं जा सकता. जादे से जादा प्रतीक में बिन सिंखचों की जेल का बिम्ब बांटा जा सकता.

मगर लेनेवाले जेल का बिम्ब नहीं म्युचुअल फंड का डिटेल पूछ रहे हैं. कहते हैं अगले साल कहीं से आने की उम्मीद है, पैसा लगाकर इस साली रोज़ की हाय-हाय से मुंह मोड़ लेना चाहते हैं, मौका बना तो बनेगा कैसे नहीं, अपने को ऊपरी सिरों से कैसे भी तो करके जोड़ लेना चाहते हैं, वर्ना क्या है साहब, इस रेल में बैठे-बैठे मर जाओगे, आपके कुत्ते तक को खबर न होगी! गुड़ाखू रंगे दांत के एक दूसरे सज्जन हैं, हेंहिंयाते चिंहुकारते हैं, अरे हुजूर, अपन लोग तो यहां इतने में ही फ़स्सकिलास हैं, आज़ के ज़माने में ऊपरवाला सबको रेल और घर में जलाने लायक तेल भी कहां देता है? आप पढ़ते होंगे अंग्रेजी अख़बार हम रोज़ नंगी आंखों गरीबी देखते हैं. तो आप लगाइए फंड, हमारा तो फंडा है हाथ में डंडा हो और ऊपर चढ़े आनेवालों के खिलाफ़ बाजू में बंधा गंडा. मां के जने पिल्लों की ऐसी बजायेंगे कि साले कश्मीर क्या गंधार जाके अपनी नानी की बरसी मनायेंगे! उसके बाद हें-हें जिसके ऊपर काफ़ी हो-हो, अच्छी खासी हंसी हो गई, इतनी कि कुछेक गर्दन का पसीना और होंठों का पानी पोंछने लगे.

एक डोलते से शराबी रहे होंगे, शराब की जगह बात से हलक पूरने लगे, सामने बैठे आदमी से बेमतलब यहां का और वहां का पूछने, कहां घर हुआ, कहां जाते हैं किसको बनाते हैं जैसी रवानियां, समय भरता रहे की कहानियां. हाथ पर पट्टी चढी थी चेहरा कुम्हलाया हुआ था, साफ़ दीख रहा आदमी सताया हुआ था, घबराकर उगलने लगा, क्या बनाऊंगा साहब, खुद बना हुआ हूं, आंख तक करजों में डूबा, कहां जाऊंगा, आप बताओ पंजाब निकल जाऊं कि कश्मीर? इस पर चहकते शराबी डोलने लगे, कश्मीर कश्मीर बोलने. किसी ने पीछे से आवाज़ लगाई कौन है कश्मीरी, इसके पहले कि बम निकाले साले को चीर डालो, हा हा हा की हंसी होने लगी, रेल डूबती रही जहालत में लोग लुढ़कते रहे.

एक पहाड़ी फौजी ने उनींदे में मलते आंख खोली, जैसे बहुत देर हो गई जैसे अब कुछ भी करना सम्भव नहीं. किसी ने पूछा नहीं फिर भी कमर का बेल्ट कसता बताता रहा फौजी गांव लौट रहा हूं हालांकि अब कुछ है नहीं गांव में, मगर यही छुट्टी थी फिर ड्यूटी बजाने छत्तीसगढ़ लौटना है. बेचैनियों की रेल उड़ती दौड़ती रही धम्म धड़ाम..

10 comments:

  1. टीप-सब फेसबुकवे पे नहीं अटक जा रहा ?

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  2. क्या लिखूं, आपके लेखन पर कुछ लिखना जैसे सूरज को दिया दिखा रहा हूँ......बस यूँ ही लिखते रहे हम जैसे शागिर्द कुछ न कुछ सीखते रहेंगे...
    मेरे ब्लॉग पर कभी कभी....

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  3. :)........
    अरे ! ''पहाडे पहड़े प्रेम ...'' पढकर वैसे ही धमाका कर दिये .... अब फिर धम्म धड़ाम ...?

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  4. @अफ़लू भाई,
    फेसबुकवा में अटकता होगा, कि अटके नहीं की किसी को परवाह न होती होगी.
    वैसे मुझे लगता है कि अच्‍छा हो फेसबुक से फेस ज़रा हटा ही लिया जाये. एक बार याद दिला देने का आपका शुक्रिया.

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  5. “नन्हें दीपों की माला से स्वर्ण रश्मियों का विस्तार -
    बिना भेद के स्वर्ण रश्मियां आया बांटन ये त्यौहार !
    निश्छल निर्मल पावन मन ,में भाव जगाती दीपशिखाएं ,
    बिना भेद अरु राग-द्वेष के सबके मन करती उजियार !! “

    हैप्पी दीवाली-सुकुमार गीतकार राकेश खण्डेलवाल

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  6. hans mein padhi kahani ne yah sochne par baadhya kiya ki yatharth kise kahte hain aur use kaise likha jaana chahiye.badhayee.
    krishnabihari

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  7. बड़ा धांसू लिखते हैं आप. हंस मे पहाड़े पहाड़े प्रेम पढ़ के जी बाग बाग हो गिया है पिरमोद बाबू,आपके ब्लाग्वो को फ़ॉलो करने लगे हैं अउर फसबूक्वो पर फ्रेंड रेकुएस्ट भेजे हैं. कबूल फ़रमैएगा तो किरपा होगी.कभी हमरो ब्लाग्वा देखने का कस्ट करिए roop62 .blogspot .com आपकी लेखनी को कोटिश: साधुवाद !

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  8. नमस्कार जी
    बहुत खूबसूरती से लिखा है.

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  9. इत्ता दिन हो गया!! कहाँ नुकाए हैं गुरूजी?
    कुच्छो लबका माल लाईये ना..

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