Monday, December 27, 2010

अभागे का भूगोल..

ब्‍लॉग की लिखाई के बहुत दिन हुए. ऐसा नहीं कि पड़ोस की किसी ज़हीन बाला के पीछे भागकर जैसलमेर या जापान गया था, या बीच 'भागे' में धराकर (इंटरसेप्‍टेड) पिटाकर बिछौने पर गिरा हुआ था, नहीं, ऐसा कुछ अतींद्रीय नाटकीय रुमानी भी घटित होने से 'भगा' रहा, जो भागना है वह मैं कहीं दिमाग़ की दुनिया में ही भागता रहा (लिखने से खुद को छुपाता, बचाता रहा) और देखिए, घटनाविहीनता के विपन्‍न इतने दिन निकल गए और 'अभागे' भूगोल में मैं वापस सन्‍न खड़ा हूं कि हाय, कितने दिन निकल गए, बहुत निकले. बहुत हुआ.

कुछ चौंके हितैषियों ने डेढ़ लाईनों के पत्र भी लिखे, कि अज़दक किधर हेराया? बौराने की बीमा-पालिसी के दिन खत्‍म हुए? मैं चुप पटाया अपने पैरों के नाख़ून तकता रहा (उनकी नीली नेल-पालिश करने के अरमानों पर उधारी का गरम पानी गिराता), अनमना कि ऐसे मौलिक प्रश्‍नों का क्‍या 'अभागा' उत्‍तर दूं? दूंगा भी तो वह ठीक से देना न हो सकेगा. ठीक से कुछ भी न हो सकेगा. क्‍योंकि ठीक-ठीक से अपने ठेके पर मैं ही कहां ठीक हुआ हूं. मगर फिर, कहने का क्‍या मतलब, जब लोग हित व लोक की चिन्‍ता करनेवाले हों, समझनेवाले न हों.

ओह, जीवन में कितना सारा समय (और जापान) बीतता चलता है, जबकि आपस की ज़रा समझ बन सकती है मगर बनती चलती नहीं. ज़रा सा धीरज और थोड़ी सी शिक्षा हमें मनुष्‍य बना सकती है, मगर मनुष्‍य होने की जगह हम बिग बॉस और बरखा दत्‍त की थेथरई देखने में अपने मनुष्‍यत्‍व से गुमे रहते हैं. समय बीता जाता है. रोज़. आप न हमसे मिलने आते हैं. न मैं अपने भूगोल से निकलकर आपतक आपको समझने पहुंचता हूं. कहीं पहुंचता भी हूं तो कातरता से आपके पीठ पीछे फुसफुसाकर माफ़ी मांगता कि मित्र, समझ रहे हैं न?

लाचारियों के समयखाये कैसे गिरह हैं ये, और इस निठल्‍ले ठाठ के प्रियवर, काट क्‍या हैं? भागे के अभागे में अटका सोच रहा हूं. आप रहे हैं?

9 comments:

  1. इन सबकी थेथरई न देखें तो इन्फीरियारिटी हो जायेगा।

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  2. मगर मनुष्‍य होने की जगह हम बिग बॉस और बरखा दत्‍त की थेथरई देखने में अपने मनुष्‍यत्‍व से गुमे रहते हैं.>
    यहां हम भी सेम टू सेम सोचते हैं। लगता है नये साल का कोई ढ़ंग का रिजॉल्व कर लें।

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  3. उन डेढ़ लाइन वाले हितैषियों में एक मैं भी था... आप आये, अच्छा लगा

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  4. बीच-बीच में ऐसे ही थोड़ी-थोड़ी खुराक देते रहा कीजिये.. कोइ ज्यादा टेंशन लेके नहीं.. आराम बड़ी चीज है...

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  5. बहुत अच्छा लगा कि चार लाइन लिखने का समय निकाले.

    वैसे थेंथर होने में बड़ी मजा है. और फिर सोचते हैं भूगोल बदलिए लेंगे त का हो जाएगा?

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  6. जब ये "अभागा" सागर अपना क्रेडिट लेने चला आया तो हम काहे नहीं, नहीं? 'आप हेराते हैं, हम बौराते हैं' वाला हाल हमारा काहे करते हैं जी?

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  7. अज़दक पर स्वागत के लिए हम भी खड़े थे....

    स्वागत है.....

    @भागे के अभागे में अटका सोच रहा हूं. आप रहे हैं?

    रहे है...... और अज़दक में घुमते रहते हैं.

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  8. "लाचारियों के समयखाये कैसे गिरह हैं ये, और इस निठल्‍ले ठाठ के प्रियवर, काट क्‍या हैं? भागे के अभागे में अटका सोच रहा हूं. आप रहे हैं?"

    जी, हम भी सोच रहे हैं... ये बीत गए समय की ओर लौटना कितना विस्मित करता है, एक अंतराल के बाद आये होंगे आप, आपका स्वागत कर रहे हैं पाठक गण, हमतो अभी अभी आये हैं इस आलय में, और हर एक पोस्ट का स्वागत कर रहे हैं, मेरे लिए तो नया ही है सबकुछ...

    शब्द व भाव कभी पुराने जो नहीं होते... ये शब्द २०१० में जितना मायने रखते होंगे उतना ही आज भी और आप जब कमेंट मॉडरेट करने को अपने पुराने पोस्ट तक आते होंगे तो आपको भी अपने शब्दों को जगमग करता देख अच्छा लगता होगा न...

    प्रणाम!

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