
ब्लॉग की लिखाई के बहुत दिन हुए. ऐसा नहीं कि पड़ोस की किसी ज़हीन बाला के पीछे भागकर जैसलमेर या जापान गया था, या बीच 'भागे' में धराकर (इंटरसेप्टेड) पिटाकर बिछौने पर गिरा हुआ था, नहीं, ऐसा कुछ अतींद्रीय नाटकीय रुमानी भी घटित होने से 'भगा' रहा, जो भागना है वह मैं कहीं दिमाग़ की दुनिया में ही भागता रहा (लिखने से खुद को छुपाता, बचाता रहा) और देखिए, घटनाविहीनता के विपन्न इतने दिन निकल गए और 'अभागे' भूगोल में मैं वापस सन्न खड़ा हूं कि हाय, कितने दिन निकल गए, बहुत निकले. बहुत हुआ.
कुछ चौंके हितैषियों ने डेढ़ लाईनों के पत्र भी लिखे, कि अज़दक किधर हेराया? बौराने की बीमा-पालिसी के दिन खत्म हुए? मैं चुप पटाया अपने पैरों के नाख़ून तकता रहा (उनकी नीली नेल-पालिश करने के अरमानों पर उधारी का गरम पानी गिराता), अनमना कि ऐसे मौलिक प्रश्नों का क्या 'अभागा' उत्तर दूं? दूंगा भी तो वह ठीक से देना न हो सकेगा. ठीक से कुछ भी न हो सकेगा. क्योंकि ठीक-ठीक से अपने ठेके पर मैं ही कहां ठीक हुआ हूं. मगर फिर, कहने का क्या मतलब, जब लोग हित व लोक की चिन्ता करनेवाले हों, समझनेवाले न हों.
ओह, जीवन में कितना सारा समय (और जापान) बीतता चलता है, जबकि आपस की ज़रा समझ बन सकती है मगर बनती चलती नहीं. ज़रा सा धीरज और थोड़ी सी शिक्षा हमें मनुष्य बना सकती है, मगर मनुष्य होने की जगह हम बिग बॉस और बरखा दत्त की थेथरई देखने में अपने मनुष्यत्व से गुमे रहते हैं. समय बीता जाता है. रोज़. आप न हमसे मिलने आते हैं. न मैं अपने भूगोल से निकलकर आपतक आपको समझने पहुंचता हूं. कहीं पहुंचता भी हूं तो कातरता से आपके पीठ पीछे फुसफुसाकर माफ़ी मांगता कि मित्र, समझ रहे हैं न?
लाचारियों के समयखाये कैसे गिरह हैं ये, और इस निठल्ले ठाठ के प्रियवर, काट क्या हैं? भागे के अभागे में अटका सोच रहा हूं. आप रहे हैं?